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छांव तले उम्मीद की उड़ान : जब पेड़ बना क्लासरूम और डालें बनीं डेस्क
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परगवाल में पेड पर बैठकर पढाई करते दीपक और नारायण. संवाद
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जीतेंद्र सिंह
परगवाल। मई की दोपहर। सूरज आग उगल रहा था। लोग घरों, दुकानों और दफ्तरों की ठंडी छांव में दुबके थे। उसी तपती सड़क से यह संवाददाता बाइक से गुजर रहा था कि अचानक एक दृश्य ने ब्रेक लगाने पर मजबूर कर दिया।
सामने सड़क किनारे खड़े घने पीपल के पेड़ की सबसे मजबूत डाल पर दो बच्चे बैठे थे। न झूला झूल रहे थे, न शरारत कर रहे थे। दोनों के हाथों में फटी-पुरानी किताबें थीं और आंखें पन्नों पर टिकी थीं। यह ‘सपनों की पाठशाला’ थी, जहां छत आसमान था और बेंच पेड़ की डाल। उत्सुकता में पास गया। धूप से तपे चेहरों पर पसीना, लेकिन होठों पर मुस्कान। एक ने अपना नाम नारायण और दूसरे ने दीपक बताया। उम्र यही कोई 8-9 साल।
पूछा- स्कूल क्यों नहीं गए। मासूमियत से जवाब आया, दीदी घर पर नहीं हैं किसके साथ जाते। फिर पूछा पेड़ पे बैठकर क्यों पढ़ाई कर रहे हो तो बोले अंदर बहुत गर्मी लगती है। यहां पेड़ के नीचे हवा आती है तो पढ़ लेते हैं। दोनों बिहार से आए प्रवासी मजदूर परिवारों के बच्चे हैं। माता-पिता सुबह मजदूरी करने निकल गए थे। घर पर न टीवी, न मोबाइल, न ट्यूशन। बस एक उम्मीद कि पढ़-लिखकर हालात बदलेंगे।
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दीपक ने बताया कि उसे पुलिस बनना है और नारायण टीचर। किताब के हाशिये पर पेंसिल से बनाए गए तिरंगे और फूल इस बात के गवाह थे कि गरीबी उनकी कल्पनाओं को कैद नहीं कर पाई है। ये बच्चे हमें याद दिलाते हैं कि सुविधाएं न हों तो बहाने हजार हैं, लेकिन अगर हौसला हो तो पेड़ की डाल भी उम्मीदों की पाठशाला बन जाती है। इनकी लगन हर उस शख्स के लिए सबक है जो जरा सी मुश्किल में हार मान लेते हैं।
फोटो कैप्शन : परगवाल में पीपल के पेड़ पर बैठकर पढ़ाई करते नारायण और दीपक। प्रवासी मजदूरों के ये बच्चे गर्मी से बचने के लिए रोज यहीं क्लास लगाते हैं।
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परगवाल। मई की दोपहर। सूरज आग उगल रहा था। लोग घरों, दुकानों और दफ्तरों की ठंडी छांव में दुबके थे। उसी तपती सड़क से यह संवाददाता बाइक से गुजर रहा था कि अचानक एक दृश्य ने ब्रेक लगाने पर मजबूर कर दिया।
सामने सड़क किनारे खड़े घने पीपल के पेड़ की सबसे मजबूत डाल पर दो बच्चे बैठे थे। न झूला झूल रहे थे, न शरारत कर रहे थे। दोनों के हाथों में फटी-पुरानी किताबें थीं और आंखें पन्नों पर टिकी थीं। यह ‘सपनों की पाठशाला’ थी, जहां छत आसमान था और बेंच पेड़ की डाल। उत्सुकता में पास गया। धूप से तपे चेहरों पर पसीना, लेकिन होठों पर मुस्कान। एक ने अपना नाम नारायण और दूसरे ने दीपक बताया। उम्र यही कोई 8-9 साल।
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पूछा- स्कूल क्यों नहीं गए। मासूमियत से जवाब आया, दीदी घर पर नहीं हैं किसके साथ जाते। फिर पूछा पेड़ पे बैठकर क्यों पढ़ाई कर रहे हो तो बोले अंदर बहुत गर्मी लगती है। यहां पेड़ के नीचे हवा आती है तो पढ़ लेते हैं। दोनों बिहार से आए प्रवासी मजदूर परिवारों के बच्चे हैं। माता-पिता सुबह मजदूरी करने निकल गए थे। घर पर न टीवी, न मोबाइल, न ट्यूशन। बस एक उम्मीद कि पढ़-लिखकर हालात बदलेंगे।
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दीपक ने बताया कि उसे पुलिस बनना है और नारायण टीचर। किताब के हाशिये पर पेंसिल से बनाए गए तिरंगे और फूल इस बात के गवाह थे कि गरीबी उनकी कल्पनाओं को कैद नहीं कर पाई है। ये बच्चे हमें याद दिलाते हैं कि सुविधाएं न हों तो बहाने हजार हैं, लेकिन अगर हौसला हो तो पेड़ की डाल भी उम्मीदों की पाठशाला बन जाती है। इनकी लगन हर उस शख्स के लिए सबक है जो जरा सी मुश्किल में हार मान लेते हैं।
फोटो कैप्शन : परगवाल में पीपल के पेड़ पर बैठकर पढ़ाई करते नारायण और दीपक। प्रवासी मजदूरों के ये बच्चे गर्मी से बचने के लिए रोज यहीं क्लास लगाते हैं।

परगवाल में पेड पर बैठकर पढाई करते दीपक और नारायण. संवाद