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Jammu Kashmir: एलओसी पर सैनिकों की आंखें और कान हैं गद्दी नस्ल के कुत्ते, घुसपैठ पर करते हैं सतर्क
Fri, 09 Sep 2022 03:18 PM IST
kumar गुलशन कुमार
अमर उजाला नेटवर्क, जम्मू
अमर उजाला नेटवर्क, जम्मू
Published by: kumar गुलशन कुमार
Updated Fri, 09 Sep 2022 03:18 PM IST
सार
यह कुत्ते नस्ल में हिमालयी शीपडॉग है, जिसे भोटिया या बांगरा सहित कई अन्य नामों से भी जाना जाता है और कभी-कभी इसे हिमालयी मिस्टिफ भी कहा जाता है।
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- फोटो : File Photo
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विस्तार
aअकुशल और अप्रशिक्षित लेकिन किसी अन्य ब्रीड की तरह तेज गद्दी कुत्ते सैनिकों के सबसे अच्छे दोस्त हैं। कश्मीर में नियंत्रण रेखा (एलओसी) पर किसी भी संदिग्ध गतिविधि का पता लगाने और संभावित घुसपैठ के प्रयासों के बारे में सैनिकों को सतर्क करते हैं। ये सैनिकों की आंखें और कान हैं।
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खानाबदोश (गद्दी) चरवाहों के नाम पर इनका नाम रखा गया। ये लोग इन कुत्तों को भेड़ और बकरियों के झुंड की रक्षा के लिए पालते हैं। यह कुत्ते नस्ल में हिमालयी शीपडॉग है, जिसे भोटिया या बांगरा सहित कई अन्य नामों से भी जाना जाता है और कभी-कभी इसे हिमालयी मिस्टिफ भी कहा जाता है। यह स्थानीय कुत्ता पूर्वी नेपाल और कश्मीर में हिमालय की तलहटी में पाया जाता है। नस्ल को मुख्य रूप से एक पशुधन संरक्षक के रूप में उपयोग किया जाता है।, इनका उपयोग शिकार के दौरान सहायता के लिए भी किया जाता है।
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उत्तरी कश्मीर के सीमांत जिले कुपवाड़ा के केरन सेक्टर में शमसाबाड़ी रेंज पर अग्रिम चौकी पर तैनात सेना के एक अधिकारी ने कहा कि ये कुत्ते स्थानीय हैं, लेकिन आवारा नहीं हैं। सेना जहां जवानों और मशीनरी के संयोजन के साथ सीमा पर लगी बाड़ की चौबीसों घंटे निगरानी के लिए उच्च तकनीक वाले उपकरणों का उपयोग करती है, वहीं घुसपैठ के खिलाफ घुसपैठ रोधी बाधा प्रणाली (एआईओएस) के साथ साथ लड़ाई में सैनिकों के लिए गद्दी कुत्ते अमूल्य हैं। वे छोटी-छोटी हरकतों को भी सुन लेते हैं। कोई हलचल होने पर वे सूंघ सकते हैं या सुन सकते हैं। उन्होंने कहा कि वे तुरंत अलार्म देते हैं और सैनिकों को सतर्क करते हैं।
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20 फुट बर्फ में चौकियों पर रहते हैं
अधिकारी ने कहा कि इस कुत्ते की नस्ल सैनिकों की आंखें और कान हैं और एक परिवार की तरह उनके साथ रहते हैं। वे सैनिकों के साथ काम करते हैं और व्यावहारिक रूप से परिवार का हिस्सा हैं। उन्होंने कहा कि वे उनके सबसे अच्छे दोस्त हैं। कुत्ते सर्दियों के दौरान भी चौकियों पर सैनिकों के साथ रहते हैं, जब ज्यादातर जगहों पर लगभग 20 फीट बर्फ के साथ मौसम कठोर होता है। एक अन्य अधिकारी ने कहा कि यह कुत्ते बिना किसी औपचारिक प्रशिक्षण के हैं, लेकिन उनकी क्षमताएं बेजोड़ हैं।
वे ठीक से प्रशिक्षित नहीं हैं, लेकिन वे पोस्ट पर सैनिकों के साथ रहते हैं और इस तरह वे आसपास के लोगों और होने वाली गतिविधियों से पूरी तरह वाकिफ हैं। वे किसी ऐसे व्यक्ति को महसूस कर सकते हैं जिसे वहां नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि वे सैनिकों और स्थानीय नागरिकों को पहचानते हैं और जब भी अजनबियों की आवाजाही होती है तो भौंकना शुरू कर देते हैं।
अधिकारी ने कहा कि चाहे सुरक्षाबल आराम कर रहे होते हैं या गश्त पर या ऐसे ट्रैक पर होते हैं जहां आतंकवादियों द्वारा माइन लगाई गई हो तो यह कुत्ते सैनिकों के साथ चलते हैं। घुसपैठ विरोधी अभियानों में बलों की सहायता करने के अलावा वे उन सैनिकों के लिए स्ट्रेस-बस्टर के रूप में भी काम करते हैं जो उनके साथ खेलना पसंद करते हैं। वे हमारे मनोरंजन के रूप में भी काम करते हैं, खासकर उन जगहों पर जहां नेटवर्क कनेक्टिविटी उपलब्ध नहीं है या दुर्लभ है।
गद्दी कुत्तों को प्रशिक्षित करना आसान
एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि गद्दी कुत्तों को प्रशिक्षित करना और देखभाल करना आसान है। इन्हें खरीदने के लिए ज्यादा पैसे भी नहीं लगते। वे शानदार काम करते हैं। उन्होंने कहा कि वे सतर्क हैं, उनमें शानदार क्षमताएं हैं और वे सबसे अच्छे प्रहरी के रूप में काम करते हैं। उन्होंने कहा कि इन कुत्तों के अलावा, सेना के अन्य कुत्ते भी हैं जो विभिन्न कर्तव्यों का पालन करते हैं।
अधिकारी ने कहा कि अन्य कुत्तों को विशिष्ट मिशनों के लिए प्रशिक्षित किया जाता है, जिनमें आईईडी या माइन-डिटेक्शन डॉग, एक्सक्लूसिव-डिटेक्शन डॉग, ट्रैकिंग डॉग, असॉल्ट डॉग, हिमस्खलन बचाव कुत्ते और नशीले पदार्थों का पता लगाने वाले कुत्ते शामिल हैं। उन्होंने कहा कि उनके कर्तव्यों में गार्ड ड्यूटी, गश्त करना, विस्फोटकों को सूंघना, खदान का पता लगाना, संभावित लक्ष्यों पर हमला करना, हिमस्खलन मलबे का पता लगाना और साथ ही खोज अभियान में भाग लेना शामिल है।