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जम्मू-कश्मीर के कराहते अस्पताल! तकलीफ आज, ऑपरेशन चार महीने बाद

Mon, 30 Dec 2019 03:12 PM IST
प्रशांत कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जम्मू
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जम्मू Published by: प्रशांत कुमार Updated Mon, 30 Dec 2019 03:12 PM IST
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disorder and irregularities in Government hospitals in Jammu Kashmir
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया

जम्मू संभाग के अखनूर निवासी बशीर अहमद सुपर स्पेशलिटी के यूरोलॉजी विभाग में पहुंचे, उन्हें पत्थरी की शिकायत थी, डॉक्टरों ने ऑपरेशन करने की बात कही, लेकिन जब पर्ची पर डेट पड़ी तो उसे देखकर होश उड़ गए। उन्हें अगले चार माह बाद ऑपरेशन करवाने के लिए अस्पताल में आने को कहा गया था।

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यह हालत सिर्फ बशीर की ही नहीं बल्कि उन सभी रूटीन मरीजों की है, जिन्हें ऑपरेशन के लिए कई महीनों की डेट (तिथि) मिल रही है। इनमें उन मरीजों की हालत और ज्यादा तब पतली हो जाती है जब निर्धारित डेट पर किन्हीं कारणों से ऑपरेशन टल जाता है। महीनों के इंतजार को देखते हुए पीड़ा बढ़ने पर ऑपरेशन के लिए अधिकतर मरीज निजी क्लीनिकों का रुख कर जाते हैं, जिससे उन्हें दोगुना आर्थिक बोझ झेलना पड़ता है।  
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जीएमसी और एसएमजीएस अस्पताल में ही रोजाना 70 से अधिक रूटीन ऑपरेशन किए जाते हैं। जीएमसी जम्मू में रोजाना ऑर्थो यूनिट के थियेटरों में 10-12 रूटीन ऑपरेशन किए जाते हैं। इसी तरह सर्जरी के चार ऑपरेशन थियेटर में 12-14 और आई के दो यूनिट में करीब 15 रूटीन ऑपरेशन होते हैं।

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निजी अस्पताल में इलाज कराने के लिए मजबूर हैं लोग

शहर के प्रमुख जच्चा-बच्चा अस्पताल एसएमजीएस में ईएनटी में करीब 15 और गायनी में इससे अधिक ऑपरेशन किए जाते हैं। इसके अलावा सुपर स्पेशलिटी अस्पताल जम्मू में कार्डियोल\जी, सीटीवीएस और यूरोल\जी यूनिटों में दर्जनों ऑपरेशन किए जाते हैं।

मौजूदा सर्दियों की छुट्टियों के कारण कई वरिष्ठ फैकल्टी के अवकाश पर रहने से ऑपरेशन की संख्या कम हुई है। उधमपुर से जीएमसी में सर्जरी करवाने आए राहुल शर्मा ने कहा कि उन्हें तीन माह बाद की डेट मिली है। लेकिन उनकी बाजू में दर्द बढ़ता जा रहा है, जिससे उन्हें मजबूरन निजी अस्पताल में जाना पड़ेगा।

 

मरीजों में बढ़ रहा मानसिक तनाव

किसी भी मरीज के लिए ऑपरेशन जिंदगी का दूसरा नाम होता है, चाहे वह बड़ा हो या छोटा। मनोचिकित्सक डॉ. जगदीश थापा के अनुसार ऑपरेशन के बाद मरीज का मानसिक तनाव कम हो जाता है। यह विकास उसे जल्दी ठीक होने में मदद देता है। लेकिन इसके विपरीत किन्हीं कारणों से ऑपरेशन देरी से होने से उसका मानसिक तनाव बढ़ जाता है। इससे उसे शारीरिक और मानसिक तौर पर परेशान होना पड़ता है।

रूटीन ऑपरेशन में महीनों की डेट मिलने पर तीमारदारों को मजबूरन अपने मरीजों को निजी अस्पतालों का सहारा लेना पड़ता है। लेकिन इसमें उन्हें समय की बर्बादी के साथ आर्थिक परेशानी झेलनी पड़ती है। अगर सामान्य ऑपरेशन पर किसी निजी क्लीनिक पर तीस हजार रुपये खर्चा हो रहा है तो वह सरकारी अस्पताल में 15 से 20 हजार रुपये में हो जाता है। इसी तरह ऑर्थो, सर्जरी, आई, गायनी, ईएनटी ऑपरेशन के लिए निजी अस्पताल में लागत सरकारी अस्पताल के मुकाबले दोगुने-तिगने स्तर तक पहुंच जाती है।

मरीजों को सभी सुविधाएं मुहैया करवाई जा रहीं : प्रिंसिपल
जीएमसी की प्रिंसिपल डॉ. सुनंदा रैना का कहना है कि रूटीन ऑपरेशन में मरीजों को उचित चिकित्सा सुविधाएं मुहैया करवाने के सभी प्रयास किए जाते हैं। मरीजों को लोड को देखते हुए उन्हें डेट दी जाती है।

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