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हाईकोर्ट में एनआईए: यासीन मलिक जैसे ‘खूंखार आतंकी’ को मृत्युदंड न देना न्याय की हत्या, 29 मई को होगी सुनवाई

Sat, 27 May 2023 02:11 AM IST
विमल शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली Published by: विमल शर्मा Updated Sat, 27 May 2023 02:11 AM IST
सार

एनआईए की याचिका को जस्टिस सिद्धार्थ मृदुल और तलवंत सिंह की पीठ के समक्ष 29 मई को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया है। दरअसल मलिक को विशेष एनआईए अदालत ने पिछले साल आतंकी फंडिंग मामले में दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।

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Denial of death sentence to 'dreaded terrorist' like Yasin Malik is a travesty of justice: NIA
यासीन मलिक - फोटो : एएनआई

विस्तार

राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने कश्मीरी अलगाववादी नेता यासीन मलिक को मौत की सजा दिलाने के लिए दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। हाईकोर्ट में दायर याचिका में एनआईए ने कहा है कि इस तरह के ‘खूंखार आतंकी’ को मृत्युदंड नहीं देना न्याय की हत्या होगी।

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एनआईए की याचिका को जस्टिस सिद्धार्थ मृदुल और तलवंत सिंह की पीठ के समक्ष 29 मई को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया है। दरअसल मलिक को विशेष एनआईए अदालत ने पिछले साल आतंकी फंडिंग मामले में दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।
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मलिक ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया था। राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने तर्क दिया है कि दोषी को सजा सुनाते हुए ट्रायल कोर्ट ने इस तथ्य पर ध्यान नहीं दिया कि उसका अपराध राष्ट्रद्रोह की श्रेणी में आता है। इसके अलावा दोषी के कृत्य दुर्लभ से दुर्लभतम श्रेणी के हैं।
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हाईकोर्ट के समक्ष याचिका में एनआईए ने कहा कि अगर ऐसे ‘’खतरनाक आतंकियों’’ को दोषी होने के बावजूद मौत की सजा नहीं दी जाती है, तो यह सजा की नीति का पूरी तरह से हनन होगा। ऐसे में आतंकियों के मृत्युदंड से बच निकलने का रास्ता साफ हो जाएगा।

एनआईए ने जोर देकर कहा कि ऐसे मामलों में उम्रकैद की सजा आतंकियों के अपराध के अनुरूप नहीं है। इनके अपराध के कारण राष्ट्र और सैनिकों के परिवारों को शहादत देनी पड़ी है।

आतंकवाद रोधी जांच एजेंसी ने याचिका में कहा कि ट्रायल कोर्ट का यह निष्कर्ष कि मलिक के अपराध दुर्लभ से दुर्लभतम की श्रेणी में नहीं आते हैं, कानूनी रूप से त्रुटिपूर्ण और पूरी तरह से अस्थिर है।

आजीवन कारावास की सजा देने वाली विशेष अदालत ने मलिक के अपराध को दुर्लभ से दुर्लभतम न मानते हुए मृत्युदंड देने की दलील को स्वीकार नहीं किया था। हालांकि उम्र कैद की सजा सुनाते हुए अदालत ने मलिक की इस दलील को खारिज कर दिया था। 

उसने अहिंसा के गांधीवादी सिद्धांत का पालन किया था और वह एक शांतिपूर्ण अहिंसक संघर्ष का नेतृत्व कर रहा था। अदालत ने कहा था कि पूरे आंदोलन को एक हिंसक आंदोलन बनाने की योजना बनाई गई थी और बड़े पैमाने पर हिंसा हुई यह तथ्य की बात है।

अदालत ने कहा था कि यहां ध्यान देना चाहिए कि दोषी महात्मा गांधी का आह्वान नहीं कर सकता और उनका अनुयायी होने का दावा नहीं कर सकता, क्योंकि महात्मा गांधी के सिद्धांतों में हिंसा के लिए कोई जगह नहीं थी, चाहे उद्देश्य कितना भी बड़ा क्यों न हो।

राष्ट्र के खिलाफ अपराध युद्ध की कार्रवाई

एनआईए ने अपनी याचिका में कहा कि ऐसे मामलों में सजा-ए-मौत न देना न्याय का हनन होगा, क्योंकि आतंकवाद का कृत्य समाज के खिलाफ ही नहीं है बल्कि यह पूरे राष्ट्र के विरुद्ध अपराध है। यह ‘बाहरी आक्रमण’, ‘युद्ध की कार्रवाई’ और ‘राष्ट्र की संप्रभुता का अपमान’ है।

मलिक के अलावा इन पर भी यूएपीए के तहत तय किए थे आरोप

अदालत ने पिछले साल मार्च में इस मामले में मलिक और अन्य के खिलाफ गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के तहत आरोप तय किए थे। अन्य आरोपियों में हाफिज मुहम्मद सईद, शब्बीर अहमद शाह, हिज्बुल मुजाहिदीन प्रमुख सलाहुद्दीन, राशिद इंजीनियर, जहूर अहमद शाह वटाली, शाहिद-उल-इस्लाम, अल्ताफ अहमद शाह उर्फ फंटूश, नईम खान, फारूक अहमद डार उर्फ बिट्टा कराटे शामिल हैं। हालांकि, अदालत ने कामरान यूसुफ, जावेद अहमद भट्ट और सैयदा आसिया फिरदौस अंद्राबी नाम के तीन लोगों को आरोप मुक्त कर दिया था।

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