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चोर ने बताई न्याय व्यवस्था की वास्तविकता
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जम्मू में संडे थियेटर में नाटक का मंचन करते कलाकार।
जम्मू। नटरंग की संडे थियेटर सीरीज के तहत डॉ. शंकर शेष के हास्य एवं व्यंग्य पर आधारित सुप्रसिद्घ नाटक ‘आधी रात के बाद’ का मंचन किया। युवा अभिनेता और निदेशक मोहम्मद यासीन ने नाटक का निर्देशन किया। नाटक में जज और चोर की बातचीत के दौरान मानवीय संबंधों, सामाजिक, सांस्कृतिक अथवा राजनीतिक अंर्तद्वद्व को बखूबी दिखाया गया।
नाटक में एक दिलचस्प चोर की दिलचस्प कहानी है। एक चोर जो कई मामलों में जेल मे रहने का आदि है अभी फिलहाल बाहर है। फिर भी जल्दी से जल्दी जेल जाना चाहता है इसलिए वो एक जज के घर में बलपूर्वक घुस जाता है और जज के माध्यम से पुलिस को फोन कर बुलाने का आग्रह करता है। दरअसल में एक पत्रकार की हत्या के मामले में पुलिस को सूचित करना चाहता है, लेकिन सीधा पुलिस के पास नहीं जाना चाहता है। जज काफी धैर्य से उससे पूछते हैं कि आखिर उसे जेल जाने की इतनी जल्दी क्यों है। चोर काफी देर तक जज को इधर-उधर की बातों में उलझाता रहता है और बार बार पुलिस को फोन पर बुलाने का अनुरोध करता रहता है। इस बीच चोर अपने चोरी एवं सजा के दौरान के किस्से एवं अनुभव जो उसे न्यायालय एवं बाकि दुनिया से मिले थे जज को सुनाता है। किस्से और अनुभव इतने रोचक हैं कि जज चोर के व्यक्तित्व से काफी प्रभावित हो जाता है।
नाटक में जहां चोर अपने अपराधों को स्वीकार करता है वहीं, दूसरी ओर समाज के तथाकथित उच्चवर्ग के चेहरे से एक-एक कर गुनाहों का पर्दा उतारता हुआ मानो पूछ रहा हो कि बताओ वास्तव में चोर कौन है? नाटक देश की न्याय व्यवस्था पर भी प्रश्न चिन्ह खड़ा करता है कि क्यों छोटे-मोटे अपराधियों को सजा देने को वो तत्पर दिखती है, वहीं जो बड़े अपराधी हैं। जो लाखों करोड़ों लोगों के स्वास्थ्य से, उनकी जिंदगी से खिलवाड़ करते हैं उनतक कानून का लंबा हाथ क्यों नहीं पहुंचता? क्यों ऐसे चेहरों को कोई नहीं पहचानता ? क्यों उन्हें सजा नहीं होती ?
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नाटक में जज और चोर के बीच का संवाद न्याय व्यवस्था की कई खामियों को उजागर करता है। इससे जज बहुत प्रभावित होता है। चोर जज के सामने हत्या से जुड़े सबूत रखता है, जिसके आधार पर पुलिस कार्रवाई करती है। नाटक में जज के रूप में बृजेश अवतार शर्मा और चोर की भूमिका में सुशांत सिंह चाढ़क ने निभाई।
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नाटक में एक दिलचस्प चोर की दिलचस्प कहानी है। एक चोर जो कई मामलों में जेल मे रहने का आदि है अभी फिलहाल बाहर है। फिर भी जल्दी से जल्दी जेल जाना चाहता है इसलिए वो एक जज के घर में बलपूर्वक घुस जाता है और जज के माध्यम से पुलिस को फोन कर बुलाने का आग्रह करता है। दरअसल में एक पत्रकार की हत्या के मामले में पुलिस को सूचित करना चाहता है, लेकिन सीधा पुलिस के पास नहीं जाना चाहता है। जज काफी धैर्य से उससे पूछते हैं कि आखिर उसे जेल जाने की इतनी जल्दी क्यों है। चोर काफी देर तक जज को इधर-उधर की बातों में उलझाता रहता है और बार बार पुलिस को फोन पर बुलाने का अनुरोध करता रहता है। इस बीच चोर अपने चोरी एवं सजा के दौरान के किस्से एवं अनुभव जो उसे न्यायालय एवं बाकि दुनिया से मिले थे जज को सुनाता है। किस्से और अनुभव इतने रोचक हैं कि जज चोर के व्यक्तित्व से काफी प्रभावित हो जाता है।
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नाटक में जहां चोर अपने अपराधों को स्वीकार करता है वहीं, दूसरी ओर समाज के तथाकथित उच्चवर्ग के चेहरे से एक-एक कर गुनाहों का पर्दा उतारता हुआ मानो पूछ रहा हो कि बताओ वास्तव में चोर कौन है? नाटक देश की न्याय व्यवस्था पर भी प्रश्न चिन्ह खड़ा करता है कि क्यों छोटे-मोटे अपराधियों को सजा देने को वो तत्पर दिखती है, वहीं जो बड़े अपराधी हैं। जो लाखों करोड़ों लोगों के स्वास्थ्य से, उनकी जिंदगी से खिलवाड़ करते हैं उनतक कानून का लंबा हाथ क्यों नहीं पहुंचता? क्यों ऐसे चेहरों को कोई नहीं पहचानता ? क्यों उन्हें सजा नहीं होती ?
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नाटक में जज और चोर के बीच का संवाद न्याय व्यवस्था की कई खामियों को उजागर करता है। इससे जज बहुत प्रभावित होता है। चोर जज के सामने हत्या से जुड़े सबूत रखता है, जिसके आधार पर पुलिस कार्रवाई करती है। नाटक में जज के रूप में बृजेश अवतार शर्मा और चोर की भूमिका में सुशांत सिंह चाढ़क ने निभाई।