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हिंदी को रोजगर सृजन करने वाली भाषा बनाना होगा

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जम्मू। हिंदी जन-जन की भावनाओं की संवाहक भाषा है। इसे रोजगार से जोड़ने की जरूरत है। दशकाें शिक्षा के क्षेत्र में सेवाएं दे चुके बुद्धिजीवियों का कहना है कि नई पीढ़ी के सामने रोजगार सबसे बड़ा लक्ष्य है और हिंदी को इस लक्ष्य को साधने का माध्यम बनाना होगा। अंग्रेजी के मिथक टूट रहे हैं, लेकिन इस प्रक्रिया को और गति देनी होगी। साथ ही ही हिंदी को लेकर हमें अपनी सोच भी बदलनी होगी। हिंदी के व्यावसायिक पाठ्यक्रम शुरू करने होंगे। सरकारी कामकाज में हिंदी का इस्तेमाल करना होगा, तभी हिंदी को प्रोत्साहन मिलेगा।
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हिंदी को लेकर हमें अपनी सोच बदलनी होगी। अंग्रेजी के मुकाबले हिंदी को लेकर बच्चों का नजरिया ही अलग है। स्कूली शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा में आज युवा रोजगार सृजन वाले विषयों पर अधिक ध्यान देता है। पहले हिंदी को रोजगार सृजन वाली भाषा बनाना होगा। अधिकांश अभिभावक अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में पढ़ाना चाहते हैं। हिंदी को रोजगारपरक भाषा बनाकर ही बदलाव लाया जा सकता है। हिंदी के व्यावसायिक पाठ्यक्रम शुरू करने होंगे। सरकारी कामकाज में हिंदी का उपयोग करना होगा। युवाओं को ज्यादा से ज्यादा हिंदी साहित्य पढ़ना चाहिए।
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चंचल डोगरा, सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापक एमएम कॉलेज एवं अध्यक्ष हिंदी साहित्य मंडल
हिंदी भाषा का राष्ट्रगान, राष्ट्रध्वज की तरह ही सम्मान करना चाहिए। हिंदी ही एक मात्र भाषा है जो देश को एक सूत्र में बांध सकती है। हिंदी भाषा क्षेत्रीय भाषाओं के प्रचार-प्रसार में अहम कड़ी है। क्षेत्रीय भाषा का हिंदी में अनुवाद होगा तो क्षेत्रीय भाषा से भी अधिक लोग जुड़ेंगे। एक भाषा को मुख्यधारा में लाना होगा जिसका एकमात्र विकल्प हिंदी है। मन में अंग्रेजी भाषा के वर्चस्व को बाहर निकालना होगा। यह समझा जाता है हिंदी में बौद्धिकता का स्तर नहीं है जो एक मिथक है। लोगों को अब यह समझ भी आ रहा है।
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किरण बख्शी- पूर्व प्रधानाध्यापक परेड कॉलेज
हिंदी भाषा का उपयोग सरकारी और गैर सरकारी कार्यालयों में होना चाहिए। हिंदी को तब तक बढ़ावा नहीं मिल सकता, जब तक अंग्रेजी भाषा को लेकर मिथक दूर नहीं होते। सभी भाषाएं एक दूसरे के लिए सेतु का काम करती हैं। बच्चों को मातृ भाषा का ज्ञान देना होगा। मातृभाषा भावों की वाहक बनती है। इसे लेकर हमें अपने घर से ही शुरूआत करनी होगी। हिंदी को लेेकर सोच बदलने की जरूरत है।
डॉ. पवन खजूरिया, साहित्य सचिव, हिंदी साहित्य मंडल जम्मू
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