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27 साल पुरानी एफआईआर के आधार पर एहतियाती हिरासत नहीं : हाईकोर्ट
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कोर्ट ने सिंगल जज का फैसला पलटा, हिरासत आदेश को किया रद्द
जम्मू। 27 साल पुरानी एफआईआर के आधार पर एहतियाती हिरासत नहीं हो सकती। इस टिप्पणी के साथ जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने उधमपुर के कडवाह निवासी अब्दुल कय्यूम उर्फ बिट्टू के एहतियाती हिरासत के मामले में सिंगल जज के फैसले को पलटते हुए हिरासत आदेश को रद्द कर दिया।
जस्टिस सिंधु शर्मा और जस्टिस राजेश सेखरी की डिवीजन बेंच ने कय्यूम की अपील को मंजूरी दी थी। बेंच ने सिंगल जज के बीते साल नौ अक्तूबर के उस फैसले को पलट दिया, जिसमें उनकी बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका खारिज कर दी गई थी। मामले में उधमपुर के जिला मजिस्ट्रेट की ओर से 24 दिसंबर, 2024 को हिरासत का आदेश उधमपुर के एसएसपी की ओर से सौंपी गई रिपोर्ट (डोजियर) और अन्य सामग्री के आधार पर जारी किया गया था।
अपीलकर्ता ने हिरासत को चुनौती देते हुए कई तर्क दिए। इनमें से एक यह था कि जिन चार एफआईआर का इस्तेमाल अधिकारियों ने किया था, वे 1997 और 1998 की थीं, जबकि हिरासत आदेश लगभग 27 साल बाद जारी किया गया। बताया कि वे उन चारों मामलों में पहले ही बरी हो चुके थे। हाईकोर्ट ने कहा कि हालांकि एहतियाती के मामलों में पुराना व्यवहार अहम जानकारी हो सकता है, लेकिन नुकसानदेह गतिविधियों और हिरासत की आवश्यकता के बीच एक ताजा और सीधा संबंध होना चाहिए।
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कोर्ट ने अधिकारियों की ओर से इस्तेमाल हालिया जानकारी की भी जांच की। इनमें तीन नवंबर, 2024 की डेली डायरी रिपोर्ट, चौकीदार और नंबरदार की रिपोर्ट और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता यानी बीएनएसएस की धारा 126 के तहत कार्यवाही शामिल थी। कहा कि हिरासत में लेने वाले अधिकारी को यह साबित करना था कि इतनी पुरानी घटनाओं का हिरासत की आवश्यकता पर सीधा असर क्यों बना है। हाईकोर्ट ने उनकी रिहाई के आदेश दिए, बशर्ते किसी अन्य मामले में उनकी जरूरत न हो। जेएनएफ
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जम्मू। 27 साल पुरानी एफआईआर के आधार पर एहतियाती हिरासत नहीं हो सकती। इस टिप्पणी के साथ जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने उधमपुर के कडवाह निवासी अब्दुल कय्यूम उर्फ बिट्टू के एहतियाती हिरासत के मामले में सिंगल जज के फैसले को पलटते हुए हिरासत आदेश को रद्द कर दिया।
जस्टिस सिंधु शर्मा और जस्टिस राजेश सेखरी की डिवीजन बेंच ने कय्यूम की अपील को मंजूरी दी थी। बेंच ने सिंगल जज के बीते साल नौ अक्तूबर के उस फैसले को पलट दिया, जिसमें उनकी बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका खारिज कर दी गई थी। मामले में उधमपुर के जिला मजिस्ट्रेट की ओर से 24 दिसंबर, 2024 को हिरासत का आदेश उधमपुर के एसएसपी की ओर से सौंपी गई रिपोर्ट (डोजियर) और अन्य सामग्री के आधार पर जारी किया गया था।
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अपीलकर्ता ने हिरासत को चुनौती देते हुए कई तर्क दिए। इनमें से एक यह था कि जिन चार एफआईआर का इस्तेमाल अधिकारियों ने किया था, वे 1997 और 1998 की थीं, जबकि हिरासत आदेश लगभग 27 साल बाद जारी किया गया। बताया कि वे उन चारों मामलों में पहले ही बरी हो चुके थे। हाईकोर्ट ने कहा कि हालांकि एहतियाती के मामलों में पुराना व्यवहार अहम जानकारी हो सकता है, लेकिन नुकसानदेह गतिविधियों और हिरासत की आवश्यकता के बीच एक ताजा और सीधा संबंध होना चाहिए।
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कोर्ट ने अधिकारियों की ओर से इस्तेमाल हालिया जानकारी की भी जांच की। इनमें तीन नवंबर, 2024 की डेली डायरी रिपोर्ट, चौकीदार और नंबरदार की रिपोर्ट और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता यानी बीएनएसएस की धारा 126 के तहत कार्यवाही शामिल थी। कहा कि हिरासत में लेने वाले अधिकारी को यह साबित करना था कि इतनी पुरानी घटनाओं का हिरासत की आवश्यकता पर सीधा असर क्यों बना है। हाईकोर्ट ने उनकी रिहाई के आदेश दिए, बशर्ते किसी अन्य मामले में उनकी जरूरत न हो। जेएनएफ