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Jammu News: नशे के आरोप में जारी हिरासत का आदेश 45 दिन की देरी के कारण रद्द
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- कोर्ट ने कहा, बिना ठोस कारण की देरी से आदेश असांविधानिक, आरोपी को तुरंत रिहा करें
अमर उजाला ब्यूरो
जम्मू। जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख हाईकोर्ट ने नशे के आरोप में जारी एक व्यक्ति को हिरासत में लेने के आदेश को रद्द करते हुए कहा कि आदेश को लागू करने में 45 दिन की देरी हुई। इससे गिरफ्तारी और आदेश के बीच सीधा संबंध टूट गया। अदालत ने कहा कि जब किसी व्यक्ति को रोकथाम के तहत हिरासत में लेने का फैसला किया जाता है, तो उसे तुरंत लागू किया जाना चाहिए, क्योंकि देरी आदेश की मंशा और प्रशासन की गंभीरता दोनों पर सवाल खड़े करती है।
यह मामला शोपियां जिले के रहने वाले एक व्यक्ति से जुड़ा है। उसके खिलाफ पुलिस ने नशे का कारोबार करने और युवाओं को इसकी लत में फंसाने के आरोप में मामला दर्ज किया था। इसके बाद डिविजनल कमिश्नर कश्मीर ने उसके खिलाफ हिरासत (डिटेंशन) का आदेश जारी किया था। हालांकि, यह आदेश जारी होने के 45 दिन बाद जाकर लागू किया गया। आरोपी के पिता ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर कहा कि आदेश मनमाना है और संविधान के अनुच्छेद 22 के तहत तय प्रक्रिया का उल्लंघन करता है। उन्होंने कहा कि अगर प्रशासन को उनके बेटे से समाज को खतरा था, तो आदेश के बाद इतनी लंबी देरी क्यों हुई। यह दिखाता है कि प्रशासन खुद अपने आदेश को लेकर गंभीर नहीं था। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद न्यायमूर्ति मोक्षा खजूरिया काजमी ने कहा कि आदेश को लागू करने में हुई 45 दिन की देरी ने गिरफ्तारी और आदेश के बीच सीधा संबंध तोड़ दिया। अदालत ने आदेश को रद्द करते हुए आरोपी की तुरंत रिहाई के निर्देश दिए। यह शर्त रखते हुए कि यदि वह किसी अन्य आपराधिक मामले में जेल में नहीं है तो उसे तुरंत छोड़ा जाए।
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जम्मू। जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख हाईकोर्ट ने नशे के आरोप में जारी एक व्यक्ति को हिरासत में लेने के आदेश को रद्द करते हुए कहा कि आदेश को लागू करने में 45 दिन की देरी हुई। इससे गिरफ्तारी और आदेश के बीच सीधा संबंध टूट गया। अदालत ने कहा कि जब किसी व्यक्ति को रोकथाम के तहत हिरासत में लेने का फैसला किया जाता है, तो उसे तुरंत लागू किया जाना चाहिए, क्योंकि देरी आदेश की मंशा और प्रशासन की गंभीरता दोनों पर सवाल खड़े करती है।
यह मामला शोपियां जिले के रहने वाले एक व्यक्ति से जुड़ा है। उसके खिलाफ पुलिस ने नशे का कारोबार करने और युवाओं को इसकी लत में फंसाने के आरोप में मामला दर्ज किया था। इसके बाद डिविजनल कमिश्नर कश्मीर ने उसके खिलाफ हिरासत (डिटेंशन) का आदेश जारी किया था। हालांकि, यह आदेश जारी होने के 45 दिन बाद जाकर लागू किया गया। आरोपी के पिता ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर कहा कि आदेश मनमाना है और संविधान के अनुच्छेद 22 के तहत तय प्रक्रिया का उल्लंघन करता है। उन्होंने कहा कि अगर प्रशासन को उनके बेटे से समाज को खतरा था, तो आदेश के बाद इतनी लंबी देरी क्यों हुई। यह दिखाता है कि प्रशासन खुद अपने आदेश को लेकर गंभीर नहीं था। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद न्यायमूर्ति मोक्षा खजूरिया काजमी ने कहा कि आदेश को लागू करने में हुई 45 दिन की देरी ने गिरफ्तारी और आदेश के बीच सीधा संबंध तोड़ दिया। अदालत ने आदेश को रद्द करते हुए आरोपी की तुरंत रिहाई के निर्देश दिए। यह शर्त रखते हुए कि यदि वह किसी अन्य आपराधिक मामले में जेल में नहीं है तो उसे तुरंत छोड़ा जाए।
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