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सरकारी प्रक्रियाएं धीमी, देरी को नहीं मान सकते अपराध : हाईकोर्ट
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- सरकारी अपीलों में देरी पर हाईकोर्ट नरम, कहा - देरी को हकीकत के नजरिए से देखना होगा
- तकनीकी बातों से न्याय का रास्ता नहीं रुकना चाहिए, हर मामला अपनी परिस्थितियों में देखा जाए
अमर उजाला ब्यूरो
जम्मू। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने एक अहम आदेश में सरकार की उस अपील को मंजूरी दे दी जो तय समयसीमा से 146 दिन देरी से दाखिल की गई थी। अदालत ने माना कि सरकारी फाइलें कई विभागों से होकर गुजरती हैं और इसमें समय लगना स्वाभाविक है, इसलिए देरी को वास्तविक दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए।
यह मामला उस आदेश से जुड़ा है जिसमें पुलवामा की एनआईए अदालत ने कई आरोपियों को जमानत दी थी। जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने इस आदेश को चुनौती देते हुए अपील दाखिल की लेकिन यह अपील एनआईए कानून के तहत तय 90 दिन की समयसीमा से काफी देर से दायर हुई।
सरकार की ओर से अदालत में बताया गया कि फाइल कई दफ्तरों में घूमती रही। कानूनी राय ली गई और मंजूरी प्रक्रिया में वक्त लगा। इस पूरी प्रक्रिया की जानकारी अदालत को हलफनामे के साथ दी गई। वहीं, आरोपियों की ओर से कहा गया कि एनआईए कानून के तहत 90 दिन से ज्यादा की देरी माफ करने का कोई प्रावधान नहीं है और सरकार की दलीलें कमजोर हैं क्योंकि मुकदमे की सुनवाई पहले ही काफी आगे बढ़ चुकी है।
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मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति शाहजाद अजीम और न्यायमूर्ति सिंधु शर्मा की खंडपीठ ने की। अदालत ने कहा कि जब सरकार अपील करती है तो उसे सामान्य व्यक्ति की तरह नहीं देखा जा सकता, क्योंकि सरकारी फाइलें कई स्तरों से गुजरती हैं और मंजूरी में समय लगना स्वाभाविक है।
हाईकोर्ट ने अपने पुराने फैसले एनआईए बनाम तीसरे अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, जम्मू का हवाला देते हुए कहा कि कानून में लिखा ‘शैल’ शब्द ‘मे’ के रूप में समझा जा सकता है, यानी अदालत के पास यह अधिकार है कि यदि कारण पर्याप्त हों तो देरी माफ की जा सकती है।
अदालत ने स्टेट ऑफ मणिपुर बनाम कोटिंग लामकांग केस का भी उल्लेख किया जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी निर्णय प्रक्रिया में लगने वाले समय को ध्यान में रखकर देरी माफ की थी। हाईकोर्ट ने माना कि सरकार ने जो कारण बताए, वे ईमानदार और दस्तावेजों से समर्थित हैं। देरी जानबूझकर नहीं की गई, बल्कि यह प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा थी। आखिर में अदालत ने कहा कि तकनीकी बातों के कारण न्याय का रास्ता नहीं रुकना चाहिए। अदालत ने अपील को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का आदेश देते हुए कहा कि हर मामला अपनी परिस्थितियों के हिसाब से देखा जाना चाहिए।
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- तकनीकी बातों से न्याय का रास्ता नहीं रुकना चाहिए, हर मामला अपनी परिस्थितियों में देखा जाए
अमर उजाला ब्यूरो
जम्मू। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने एक अहम आदेश में सरकार की उस अपील को मंजूरी दे दी जो तय समयसीमा से 146 दिन देरी से दाखिल की गई थी। अदालत ने माना कि सरकारी फाइलें कई विभागों से होकर गुजरती हैं और इसमें समय लगना स्वाभाविक है, इसलिए देरी को वास्तविक दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए।
यह मामला उस आदेश से जुड़ा है जिसमें पुलवामा की एनआईए अदालत ने कई आरोपियों को जमानत दी थी। जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने इस आदेश को चुनौती देते हुए अपील दाखिल की लेकिन यह अपील एनआईए कानून के तहत तय 90 दिन की समयसीमा से काफी देर से दायर हुई।
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सरकार की ओर से अदालत में बताया गया कि फाइल कई दफ्तरों में घूमती रही। कानूनी राय ली गई और मंजूरी प्रक्रिया में वक्त लगा। इस पूरी प्रक्रिया की जानकारी अदालत को हलफनामे के साथ दी गई। वहीं, आरोपियों की ओर से कहा गया कि एनआईए कानून के तहत 90 दिन से ज्यादा की देरी माफ करने का कोई प्रावधान नहीं है और सरकार की दलीलें कमजोर हैं क्योंकि मुकदमे की सुनवाई पहले ही काफी आगे बढ़ चुकी है।
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मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति शाहजाद अजीम और न्यायमूर्ति सिंधु शर्मा की खंडपीठ ने की। अदालत ने कहा कि जब सरकार अपील करती है तो उसे सामान्य व्यक्ति की तरह नहीं देखा जा सकता, क्योंकि सरकारी फाइलें कई स्तरों से गुजरती हैं और मंजूरी में समय लगना स्वाभाविक है।
हाईकोर्ट ने अपने पुराने फैसले एनआईए बनाम तीसरे अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, जम्मू का हवाला देते हुए कहा कि कानून में लिखा ‘शैल’ शब्द ‘मे’ के रूप में समझा जा सकता है, यानी अदालत के पास यह अधिकार है कि यदि कारण पर्याप्त हों तो देरी माफ की जा सकती है।
अदालत ने स्टेट ऑफ मणिपुर बनाम कोटिंग लामकांग केस का भी उल्लेख किया जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी निर्णय प्रक्रिया में लगने वाले समय को ध्यान में रखकर देरी माफ की थी। हाईकोर्ट ने माना कि सरकार ने जो कारण बताए, वे ईमानदार और दस्तावेजों से समर्थित हैं। देरी जानबूझकर नहीं की गई, बल्कि यह प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा थी। आखिर में अदालत ने कहा कि तकनीकी बातों के कारण न्याय का रास्ता नहीं रुकना चाहिए। अदालत ने अपील को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का आदेश देते हुए कहा कि हर मामला अपनी परिस्थितियों के हिसाब से देखा जाना चाहिए।