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अपराध से कमाई के निवेश पर पूरी परियोजना को नहीं माना जा सकता अवैध : हाईकोर्ट
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- केवल गैरकानूनी निवेश की रकम तक ही सीमित रहेगी कार्रवाई
- जम्मू की कंपनी की याचिका पर जयपुर के रियल स्टेट प्रोजेक्ट पर हुई सुनवाई
अमर उजाला ब्यूरो
जम्मू। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय ने एक आदेश में स्पष्ट किया है कि अगर किसी रियल एस्टेट परियोजना में अपराध की कमाई का निवेश हुआ है तो इसका यह मतलब नहीं कि पूरी परियोजना को ही गैरकानूनी मान लिया जाए। अदालत ने कहा कि प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) केवल उतनी ही राशि या उससे बनी संपत्ति को जब्त कर सकता है जो वास्तव में अपराध से अर्जित धन है।
न्यायमूर्ति राहुल भारती की पीठ ने जयपुर स्थित गोल्डन पाम्स प्रोजेक्ट से जुड़े मामले की सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। 2013 में जम्मू की एक कंपनी पीबी एसोसिएट्स ने और जयपुर की एक फर्म ने मिलकर परियोजना शुरू की थी। 2018 में ईडी ने आरोप लगाया कि इस प्रोजेक्ट में 47.16 करोड़ रुपये की अपराध से अर्जित धनराशि लगाई और इसी आधार पर परियोजना का एक हिस्सा अटैच कर दिया।
अदालत ने कहा कि जब ईडी ने खुद ही 47.16 करोड़ रुपये की गैरकानूनी रकम चिन्हित कर ली, तो इसका यह मतलब है कि पूरी परियोजना अपराध की कमाई से नहीं बनी। अदालत ने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि यही रकम किसी बैंक खाते में जमा होती तो ईडी खाते या रकम को अटैच करता, बैंक की पूरी इमारत को नहीं। महत्वपूर्ण बात यह रही कि याचिकाकर्ता कंपनी ने खुद ही 47.16 करोड़ रुपये डिमांड ड्राफ्ट के जरिये ईडी को सौंप दिए। अदालत ने इसे परियोजना से अपराध की कमाई का दाग मिटाना माना और आदेश दिया कि ईडी इस रकम को जयपुर की विशेष अदालत के समक्ष जब्त संपत्ति के तौर पर पेश करे।
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अदालत ने साफ कर दिया कि गोल्डन पाम्स परियोजना अब मनी लॉन्ड्रिंग कानून के प्रभाव से मुक्त रहेगी और खरीदारों को किसी तरह की कानूनी उलझन का सामना नहीं करना पड़ेगा।
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- जम्मू की कंपनी की याचिका पर जयपुर के रियल स्टेट प्रोजेक्ट पर हुई सुनवाई
अमर उजाला ब्यूरो
जम्मू। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय ने एक आदेश में स्पष्ट किया है कि अगर किसी रियल एस्टेट परियोजना में अपराध की कमाई का निवेश हुआ है तो इसका यह मतलब नहीं कि पूरी परियोजना को ही गैरकानूनी मान लिया जाए। अदालत ने कहा कि प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) केवल उतनी ही राशि या उससे बनी संपत्ति को जब्त कर सकता है जो वास्तव में अपराध से अर्जित धन है।
न्यायमूर्ति राहुल भारती की पीठ ने जयपुर स्थित गोल्डन पाम्स प्रोजेक्ट से जुड़े मामले की सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। 2013 में जम्मू की एक कंपनी पीबी एसोसिएट्स ने और जयपुर की एक फर्म ने मिलकर परियोजना शुरू की थी। 2018 में ईडी ने आरोप लगाया कि इस प्रोजेक्ट में 47.16 करोड़ रुपये की अपराध से अर्जित धनराशि लगाई और इसी आधार पर परियोजना का एक हिस्सा अटैच कर दिया।
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अदालत ने कहा कि जब ईडी ने खुद ही 47.16 करोड़ रुपये की गैरकानूनी रकम चिन्हित कर ली, तो इसका यह मतलब है कि पूरी परियोजना अपराध की कमाई से नहीं बनी। अदालत ने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि यही रकम किसी बैंक खाते में जमा होती तो ईडी खाते या रकम को अटैच करता, बैंक की पूरी इमारत को नहीं। महत्वपूर्ण बात यह रही कि याचिकाकर्ता कंपनी ने खुद ही 47.16 करोड़ रुपये डिमांड ड्राफ्ट के जरिये ईडी को सौंप दिए। अदालत ने इसे परियोजना से अपराध की कमाई का दाग मिटाना माना और आदेश दिया कि ईडी इस रकम को जयपुर की विशेष अदालत के समक्ष जब्त संपत्ति के तौर पर पेश करे।
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अदालत ने साफ कर दिया कि गोल्डन पाम्स परियोजना अब मनी लॉन्ड्रिंग कानून के प्रभाव से मुक्त रहेगी और खरीदारों को किसी तरह की कानूनी उलझन का सामना नहीं करना पड़ेगा।