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ग्राउंड जीरो से... लद्दाखी चरवाहों पर खतरनाक प्रशिक्षित कुत्ते छोड़ देती है चीनी सेना

Mon, 29 Jun 2020 08:11 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, लेह/जम्मू
अमर उजाला नेटवर्क, लेह/जम्मू Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Mon, 29 Jun 2020 08:11 AM IST
सार

  • डेमचोक के सामने सड़क बना चुका है चीन
  • इधर अपनी जमीन से भी हटाए जा रहे सरहदी बाशिंदे  

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chinese army is having trained dogs for ladakh shepherds
कुत्तों के साथ चीनी सेना... - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

गलवां घाटी और पैंगोंग त्सो झील के पास तनाव के बाद लद्दाख की डेमचोक सरहद पर भी चीनी सेना अपनी दादागीरी दिखा रही है। स्थानीय ग्रामीण कई वर्षों से ड्रैगन के इरादों और हरकतों को करीब से भांपते-देखते आ रहे हैं। लद्दाख में डेमचोक गांव एलएसी की जीरो लाइन पर है। 

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गांव में 37 घर हैं। पशुपालन पर निर्भर गांव के बाशिंदे तकरीबन हर साल चीन की सेना की दादागीरी झेलने को मजबूर हैं। बीते वर्ष मई माह में यहां के ग्रामीणों को चारागाह से 50 कदम पीछे कर दिया गया। चीनी सेना ग्रामीणों पर प्रशिक्षित कुत्तों को खुला छोड़ देती है।
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लद्दाख की न्योमा ब्लॉक विकास परिषद की अध्यक्ष उरगेन छोडोन डेमचोक गांव की रहने वाली हैं। वह कई बार सोशल मीडिया के माध्यम से चीन की दादागीरी को तस्वीरों के साथ उजागर कर चुकी हैं। 

उरगेन ने अमर उजाला को बताया कि लेह से ठीक 310 किलोमीटर दूर उनका गांव डेमचोक चीन की दादागीरी का शिकार है। वे कहती हैं कि उस पार सरहद तक सड़क है। सरहदी ग्रामीणों के लिए कॉलोनी है। यहां तक सुना है कि चीन ने उन्हें स्कूटर लेकर दिए हैं। 


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इस तरफ चरवाहे असहाय हैं। उन पर चीनी सेना प्रशिक्षित कुत्ते छोड़ देती है। चीन ने पक्की सड़क तैयार कर ली है। इधर ग्रामीणों को छिटपुट निर्माण के लिए जेसीबी मशीन की लेह जिला प्रशासन से अनुमति लेनी पड़ती है। मई 2019 में ग्रामीणों को अपनी जमीन से 50 कदम पीछे कर दिया गया।

तनाव में उम्मीद भी

इस समय लेह में रह रहीं उरगेन कहती हैं कि वर्तमान में सरहद पर सुरक्षा कड़ी है, लेकिन सरहद के असली रखवाले स्थानीय बाशिंदे हैं जो चप्पे-चप्पे की निगरानी करते हैं। यह लोग मजबूरी में अपने माल मवेशी बेचकर पलायन करने लगे हैं। इस समय जो माहौल है, उसमें उम्मीद है कि सरहदी ग्रामीणों के लिए सरकार ठोस नीति बनाएगी। हालांकि वे आशंकित होकर कहती हैं कि 1962 युद्ध के बाद भी सरहदी ग्रामीणों के लिए कुछ नहीं किया गया।


 

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