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Jammu News: गोबर और प्राकृतिक रंगों से डोगरा विरासत को कैनवास पर उतार रहीं मेघा
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परोला कला को दे रहीं आधुनिक स्वरूप, पारंपरिक तकनीक से तैयार करती है अनूठी कलाकृतियां -राष्ट्रीय स्तर पर किया जम्मू-कश्मीर का प्रतिनिधित्व, एक पेंटिंग की कीमत नौ हजार रुपये तक संवाद न्यूज एजेंसी
जम्मू। डोगरा संस्कृति और परंपराओं को सहेजने के लिए उधमपुर की 40 वर्ष की मेघा खजुरिया ने कला को माध्यम बनाया है। वह पारंपरिक डोगरा परोला कला और गाय के गोबर से अनूठी पेंटिंग तैयार कर रही है। प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल कर वह सदियों पुरानी परंपरा को आधुनिक स्वरूप दे रही है, ताकि डोगरा विरासत की पहचान नई पीढ़ी तक पहुंच सके। मेघा के अनुसार पुराने समय में गांवों में घरों की दीवारों को परोले से रंगने और जमीन पर मिट्टी व गाय के गोबर का लेप लगाने की परंपरा थी। घरों को सजाने के इन पारंपरिक तरीकों से प्रेरित होकर उन्होंने पेंटिंग बनाना शुरू किया। अब वह गोबर और पारंपरिक रंगों से कलाकृतियां तैयार करती हैं। फूलों और अन्य प्राकृतिक चीजों से कपड़ों को रंगने का काम भी करती हैं।
कोविड के दौरान मिली नई राह
मेघा पहले सरकारी स्कूल में अनुबंध पर लेक्चरर थीं। कोविड के दौरान नौकरी के अवसर कम होने लगे तो उन्होंने कुछ नया करने की ठानी। इसी दौरान पारंपरिक कला और प्राकृतिक रंगों के इस्तेमाल को समझने का अवसर मिला। पिछले डेढ़ साल से वह लगातार इस दिशा में काम कर रही हैं। उनकी एक पेंटिंग की कीमत करीब नौ हजार रुपये तक है।
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राष्ट्रीय मंच पर डोगरा संस्कृति का प्रतिनिधित्व
वर्ष 2025 में ऑनलाइन आयोजित सात्विक मूवमेंट में दुनिया के विभिन्न हिस्सों से करीब 500 लोगों ने हिस्सा लिया था। इस आयोजन में जम्मू-कश्मीर से मेघा अकेली प्रतिभागी थीं, जिन्होंने अपनी कला के जरिये डोगरी संस्कृति का प्रतिनिधित्व किया। उनकी कलाकृतियों को प्रशासनिक स्तर पर भी सराहना मिली है। हाल ही में डिवीजनल आयुक्त ने उनसे पेंटिंग खरीद चुके हैं। मेघा का मानना है कि डोगरा कला को केवल इतिहास तक सीमित रखने का बजाय उसे नई पीढ़ी के जीवन का हिस्सा बनाना जरूरी है।
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जम्मू। डोगरा संस्कृति और परंपराओं को सहेजने के लिए उधमपुर की 40 वर्ष की मेघा खजुरिया ने कला को माध्यम बनाया है। वह पारंपरिक डोगरा परोला कला और गाय के गोबर से अनूठी पेंटिंग तैयार कर रही है। प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल कर वह सदियों पुरानी परंपरा को आधुनिक स्वरूप दे रही है, ताकि डोगरा विरासत की पहचान नई पीढ़ी तक पहुंच सके। मेघा के अनुसार पुराने समय में गांवों में घरों की दीवारों को परोले से रंगने और जमीन पर मिट्टी व गाय के गोबर का लेप लगाने की परंपरा थी। घरों को सजाने के इन पारंपरिक तरीकों से प्रेरित होकर उन्होंने पेंटिंग बनाना शुरू किया। अब वह गोबर और पारंपरिक रंगों से कलाकृतियां तैयार करती हैं। फूलों और अन्य प्राकृतिक चीजों से कपड़ों को रंगने का काम भी करती हैं।
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कोविड के दौरान मिली नई राह
मेघा पहले सरकारी स्कूल में अनुबंध पर लेक्चरर थीं। कोविड के दौरान नौकरी के अवसर कम होने लगे तो उन्होंने कुछ नया करने की ठानी। इसी दौरान पारंपरिक कला और प्राकृतिक रंगों के इस्तेमाल को समझने का अवसर मिला। पिछले डेढ़ साल से वह लगातार इस दिशा में काम कर रही हैं। उनकी एक पेंटिंग की कीमत करीब नौ हजार रुपये तक है।
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राष्ट्रीय मंच पर डोगरा संस्कृति का प्रतिनिधित्व
वर्ष 2025 में ऑनलाइन आयोजित सात्विक मूवमेंट में दुनिया के विभिन्न हिस्सों से करीब 500 लोगों ने हिस्सा लिया था। इस आयोजन में जम्मू-कश्मीर से मेघा अकेली प्रतिभागी थीं, जिन्होंने अपनी कला के जरिये डोगरी संस्कृति का प्रतिनिधित्व किया। उनकी कलाकृतियों को प्रशासनिक स्तर पर भी सराहना मिली है। हाल ही में डिवीजनल आयुक्त ने उनसे पेंटिंग खरीद चुके हैं। मेघा का मानना है कि डोगरा कला को केवल इतिहास तक सीमित रखने का बजाय उसे नई पीढ़ी के जीवन का हिस्सा बनाना जरूरी है।