अमर उजाला संवाद: मौकों में दिक्कतें नहीं, दिक्कतों में मौका तलाश करें, सफलता और विकास की यही कुंजी- गोपाल दास
अस्पतालों में ऊर्जा अलग होती है। स्कूलों में ऊर्जा अलग तरह की होती है। अस्पताल ईंट से, स्टील से, सीमेंट से बना है। डिस्को थेक, स्कूल भी इसी से बने हैं। अगर जगह की ऊर्जा अलग है क्योंकि ईंट, पत्थर, सीमेंट, स्टील से ऊर्जा नहीं आती। इंसान ऊर्जा बनाते हैं। अगर आपको कुछ करना है तो आपके अंदर ऊर्जा अच्छी होनी चाहिए।
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सफलता और विकास के चार सूत्र हैं। पहला इफ इट इज टू बी, इट इज अप टू मी। यानी आप जो बनना चाहते हैं, उसके लिए मेहनत आपके टीचर, माता-पिता, आपके बॉस या दोस्तों को नहीं, बल्कि आपको ही करनी होगी। दूसरा पाजिटिव सेल्फ टाक, नेगेटिव सेल्फ टाक को बदलें। इसे नहीं बदला तो कुछ नहीं बदल पाएंगे। तीसरा मौकों में दिक्कतें मत तलाशें, दिक्कतों में मौका तलाशे। चौथा वर्तमान में भविष्य सोचें। बीते कल और आने वाले कल का नहीं। सफलता और विकास के इन चार मूल मंत्रों को मोटिवेशनल स्पीकर एवं लाइफ स्टाइल कोच गौर गोपाल दास ने वीरवार को अमर उजाला के संवाद कार्यक्रम में सांझा किया। प्रदेश के नामी लोगों और विद्यार्थियों से खचाखच भरे जम्मू कन्वेंशन सेंटर में गोपाल दास मोटिवेट करने पहुंचे थे।
उन्होंने कहा कि सक्सेस की स्पेलिंग में से आप यू निकाल दें तो कुछ नहीं बचेगा। अगर राष्ट्र, राज्य, शहर या संस्था का विकास करना है तो उसकी कामयाबी की परिभाषा आपके बिना पूरी नहीं हो सकती। उदाहरण देते कहा कि बच्चे मजाकिया बात करते हैं। कई बार शिक्षक और विद्यार्थियों के बीच जो बातचीत होती है, उससे हमें सफलता की कुंजी मिल जाती है। एक कहानी सुनाते हुए उन्होंने कहा, एक बार एक क्लास में टीचर ने बच्चों से कहा कि आप सभी एक वाक्य लिखें, लेकिन उसमें 10 शब्द होने चाहिए, जिसमें हर शब्द दो ही अक्षर का हो और सारे शब्द सार्थक भी हों।
जब बच्चों को जवाब नहीं मिला तो टीचर ने बोर्ड पर पहले पांच शब्द लिखे- इफ इट इज टू बी... यानी अगर जिंदगी में कुछ होना है, कुछ हासिल होना है, ऊंचाइयों पर पहुंचना है...। अब बच्चों ने सोचा कि अगले पांच शब्द कौन से होंगे। टीचर ने आगे लिखा- इट इज अप टू मी। यानी इफ इट इज टू बी, इट इज अप टू मी। यानी आप जो बनना चाहते हैं, उसके लिए मेहनत आपके टीचर, माता-पिता, आपके बास या दोस्तों को नहीं, बल्कि आपको ही करनी होगी।
गोपाल दास ने एक अन्य उदाहरण देते हुए कहा कि लोग कहते हैं कि वजन कम करके क्या करेंगे, सबको एक दिन मरना है। अगले जनम में तीन किलोग्राम से ही जिंदगी शुरू होगी। वजन घटाना वो जिम ट्रेनर या न्यूट्रिशनिस्ट की जिम्मेदारी बना देते हैं, उन्हें याद रखना चाहिए कि इफ इट इज टू बी, इट इज अप टू मी। अच्छे टीचर श्रेष्ठ कहानियों का निर्माण नहीं करते, जब सीख लेने वाले जिम्मेदारी उठाते हैं, तब बदलाव आता है। तब तक विकास संभव नहीं, जब तक हर इंसान जिम्मेदार नहीं। विकास के लिए जिम्मेदारी, उत्तरदायित्व बहुत जरूरी है।
सफलता का यही पहला सूत्र है
जापान में लोग कहते हैं कि अगर हर कोई कर सकता है तो मैं भी कर सकता हूं। अगर कोई नहीं कर सकता, तब तो मुझे निश्चित ही वह करना चाहिए। भारत में लोग कहते हैं कि हर कोई कर सकता है तो उन्हें करने दो। अगर कोई नहीं कर सकता तो हम कैसे कर लेंगे? जब तक यह नहीं बदलेगा, बदलाव नहीं आएगा। सफलता और विकास का पहला सूत्र यही है- इफ इट इज टू बी, इट इज अप टू मी।
पहले अपने आप से जीतें...
अस्पतालों में ऊर्जा अलग होती है। स्कूलों में ऊर्जा अलग तरह की होती है। अस्पताल ईंट से, स्टील से, सीमेंट से बना है। डिस्को थेक, स्कूल भी इसी से बने हैं। अगर जगह की ऊर्जा अलग है क्योंकि ईंट, पत्थर, सीमेंट, स्टील से ऊर्जा नहीं आती। इंसान ऊर्जा बनाते हैं। अगर आपको कुछ करना है तो आपके अंदर ऊर्जा अच्छी होनी चाहिए। हमारी सारी कामयाबी, सारी जीत की रचना पहले अपने मस्तिष्क में होती है। हर लड़ाई, हर बहस, हर समस्या पहले दो कानों के बीच की जगह पर सुलझाई जाती है। अगर दिमाग में जीत गए तो बाहर हार गए तो भी जीत आपकी ही होगी। महाभारत जैसे ग्रंथ को सिर्फ धार्मिक ग्रंथ मानना सही नहीं है। धर्म के नाम पर उसे बिकाऊ नहीं बनाना चाहिए। अर्जुन के दिमाग में सबसे बड़ा संघर्ष चल रहा था। वह मन-मस्तिष्क से हार गए थे। श्रीमद्भागवत गीता का उद्देश्य था कि मन-मस्तिष्क की लड़ाई पहले जीती जाए। अर्जुन की जैसी दुविधाएं थीं, वैसे ही हमारी भी हैं। रोज की लड़ाइयां लड़नी पड़ती हैं। या तो भाग (हिस्सा) लो, या भाग लो। डरपोक दुमदबाकर भागते हैं। वीर भाग लेते हैं यानी हिस्सा लेते हैं। दुनिया जो आपसे कहे, उससे ज्यादा महत्वपूर्ण है कि आप खुद से क्या कह रहे हैं। कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना। जब तक हम भीतर का संवाद नहीं बदलेंगे, तब तक कोई बाहरी संवाद मायने नहीं रखता। आधुनिक दुनिया में इसे ''पॉजिटिव सेल्फ टॉक'' कहते हैं। ''नेगेटिव सेल्फ टॉक'' को बदलें। इसे नहीं बदला तो कुछ नहीं बदल पाएंगे।
सफलता का तीसरा सूत्र
जो सिर पर आन पड़ी है, उससे जूझना पड़ता है। सिर्फ सकारात्मकता से दिक्कतें दूर नहीं होतीं। सफलता का तीसरा सूत्र है- अवसरों को देखना और उसके हिसाब से अपना नजरिया बदलना। सृष्टि बदलनी है तो दृष्टि बदलो। कुछ लोग अवसरों में दिक्कतें देखते हैं, कुछ लोग दिक्कतों में अवसर देखते हैं। विकास की तीसरी कुंजी यही है। जब समस्या आए, तो उसमें मौका देखिए।
वर्तमान में जीएं
इंसान को आज में जीना चाहिए। आज में जीकर हम भविष्य बना सकते हैं। बीता कल एक इतिहास है। आने वाला कल एक कल्पना है। लेकिन वर्तमान हमें भविष्य बनाने का अवसर देता है।
सोशल मीडिया, मोबाइल फोन और उपवास
गौर गोपाल दास ने लोगों से पूछा कि कौन- कौन आज के समय उपवास रखता है। कई लोगों के हाथ उठाने पर उन्होंने कहा कि आज का उपवास बिना खाए पीए का नहीं है। उपवास करना है कि तो एक दिन अपने आप को मोबाइल फोन और सोशल मीडिया से दूर रखिए। समझ लीजिए की आपका उपवास हो गया।
गुरू भी इंसान हैं, वह भी थकते हैं
अपने टूर का जिक्र करते हुए कहा कि वह पिछले एक हफ्ते से दुबई, दिल्ली, मुंबई में भागमभाग कर रहे हैं। एक समय वह भी थक जाते हैं। क्योंकि वह भी इंसान हैं। गुरू भी इंसान होते हैं। कभी कभी रात के 12 बजे कोई सेल्फी लेने लगता है। लेकिन वो नहीं समझता कि 12 बजे हैं। उदाहरण दिया कि यदि वह एक हफ्ते लंबे समय बाद टूर से आएं और अपने व्यस्त कार्यक्रम की वजह से किसी से कुछ गुस्से से बोल दें। तो कहा जाएगा कि मैंने गुस्सा किया। मुझे गुस्सा आ गया। लेकिन कोई गुस्से की वजह नहीं समझेगा। किसी के बारे बिना जानकारी के उसे जज नहीं किया जाना चाहिए।
मंच छोड़, बच्चें के बीच चले गए
कार्यक्रम में पहुंचे गौर गोपास दास मंच छोड़कर बच्चों और आम लोगों के बीच चले गए। सबके बीच जाकर उन्हें मोटिवेट किया। कहा कि मंच पर उन्हें अकेला महसूस होता है। वह जैसे ही सबके बीच गए तो पूरा हाल तालियों से गूंज उठा। मजाकिया अंदाज में भी उनकी हर एक बात लोगों के दिलाें को छू गई। खासकर स्कूली बच्चों में इसे लेकर खासा जोश रहा।