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हमेशा संयमित वाणी का करें प्रयोग
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रियासी। मनुष्य अगर संयमित वाणी का प्रयोग करेगा तो दुश्मन भी मित्र बन जाएंगे और कटु बचन बोलने से दुश्मन ही बनेंगे। इसलिए मनुष्य को हमेशा संयमित वाणी का ही प्रयोग करना चाहिए। यह प्रवचन कथावाचक जनक राज शास्त्री ने तहसील सुंदरबनी की सिया बंदराई पंचायत के प्राचीन ठाकुरद्वारा सुला क्षेत्र में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के दौरान दिए।
वीरवार को कथा का समापन हो गया। इस मौके पर कथावाचक ने संगत को प्रवचनों से निहाल किया। उन्होंने बताया कि समाज में कई अपराध गलत बचनों से हो जाते हैं, क्योंकि मनुष्य अपनी वाणी पर संयम नहीं रख पाता है। वाणी तीर जैसे चुभने वाले वचन अपमानजनक शब्द बोल देते हैं। इससे दूसरे के मन में अशांति उत्पन्न होती है। इस प्रकार बिना किसी कारण ही हम एक दूसरे के शत्रु बन जाते हैं। इसलिए सदा संयमित वाणी का उपयोग करें।
भगवान से प्रेम जितना करो कम है। उन्हें कहा कि इसके उपाय ये हैं कि जगत के संकल्पों को छोड़कर भगवान संकल्प करें। उन्होंने कथा के माध्यम से श्रीमद्भागवद कथा के कई प्रसंग सुना कर निहाल किया। उन्होंने श्री रामचरितमानस की कथा सुनाई। भगवान श्रीराम चरित्र और वनवास कथा सुन कर श्रद्धालु भावविभोर हो गए।
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वीरवार को कथा का समापन हो गया। इस मौके पर कथावाचक ने संगत को प्रवचनों से निहाल किया। उन्होंने बताया कि समाज में कई अपराध गलत बचनों से हो जाते हैं, क्योंकि मनुष्य अपनी वाणी पर संयम नहीं रख पाता है। वाणी तीर जैसे चुभने वाले वचन अपमानजनक शब्द बोल देते हैं। इससे दूसरे के मन में अशांति उत्पन्न होती है। इस प्रकार बिना किसी कारण ही हम एक दूसरे के शत्रु बन जाते हैं। इसलिए सदा संयमित वाणी का उपयोग करें।
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भगवान से प्रेम जितना करो कम है। उन्हें कहा कि इसके उपाय ये हैं कि जगत के संकल्पों को छोड़कर भगवान संकल्प करें। उन्होंने कथा के माध्यम से श्रीमद्भागवद कथा के कई प्रसंग सुना कर निहाल किया। उन्होंने श्री रामचरितमानस की कथा सुनाई। भगवान श्रीराम चरित्र और वनवास कथा सुन कर श्रद्धालु भावविभोर हो गए।
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