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Hindi News ›   Jammu and Kashmir ›   Jammu News ›   Ahead of the Nagrota Assembly by-election, the people of the area are angry over the lack of development works

नाम बड़े-बड़े पर दर्शन छोटे: नेता बदले...वादे बदले, नहीं बदली नगरोटा की हालत, टूटी सड़कों पर विकास की खुली पोल

Sun, 12 Oct 2025 04:03 PM IST
निकिता गुप्ता रोली खन्ना अमर उजाला नेटवर्क, नगरोटा
रोली खन्ना अमर उजाला नेटवर्क, नगरोटा Published by: निकिता गुप्ता Updated Sun, 12 Oct 2025 04:03 PM IST
सार

नगरोटा विधानसभा उपचुनाव से पहले इलाके की जनता विकास कार्यों की कमी, टूटी सड़कों और सुविधाओं के अभाव को लेकर नाराज है।स्थानीय नेताओं से मोहभंग के बावजूद प्रधानमंत्री मोदी के नाम पर भाजपा को अब भी समर्थन मिलने की संभावना जताई जा रही है।

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Ahead of the Nagrota Assembly by-election, the people of the area are angry over the lack of development works
सड़क न होने के वजह से नदी से समान ले जाते नगरोटा के लोग। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

लुढ़कते पारे और घुलती ठंडक के बीच अगर कहीं गर्मी है तो सियासी गलियारों में। बडगाम और नगरोटा में चुनावी चौसर सजने को है। नगरोटा में भाजपा की प्रतिष्ठा दांव पर है। यह सीट भाजपा विधायक देवेंद्र सिंह राणा के निधन से खाली हुई है। बडगाम सीट एनसी के विधायक के रूप में मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के इस्तीफे से रिक्त हुई है।

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कहने को तो ये उपचुनाव है पर जनता इम्तिहान लेने की पूरी तैयारी में है। चुनावी माहौल जानने के लिए मैं जम्मू से नगरोटा के लिए निकली। मन में कई सवाल थे।बाजारों में, गलियों में, टूटे-फूटे रास्तों पर उन सवालों का जवाब तलाशने के लिए इधर से उधर भटकती रही। कहीं ताश के पत्ते फेंटते युवा मिले, तो कहीं काम-धंधे से फुर्सत के बीच दुकानों पर जमी सियासी महफिल मिली। लोग अपने तरीके से और अपनी सियासी समझ के अनुसार भावी प्रत्याशियों की मूरत गढ़ते और उसकी जीत के दावे करते मिले।
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नगरोटा जिसने अपने रहनुमाओं को पलकों पर बिठाया, वह कैसा होगा यह सबसे बड़ा सवाल मेरे जेहन में था। भूगोल की बात करें तो शहर के दोनों छोर के बीच यह शहर चार ब्लॉकों में बंटा है। एक छोर पर नगरोटा व ढंसाल हैं तो दूसरे छोर पर भलवाल का कुछ हिस्सा व मथवार। एक तरफ आस्था का केंद्र कोल कंडोली माता मंदिर है, तो दूसरी तरफ सैन्य शक्ति का प्रतीक बेस कैंप। यहां से हम जैसे-जैसे आगे बढ़ते हैं जर्जर और टूटी सड़कों, बड़े-बड़े गड्ढों को देखकर विकास को लेकर मेरे जेहन में जो तस्वीर उभरी थी, वह हिचकोले खाने लगती है।
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नगरोटा बाजार में हमें एक दुकान पर बच्चों के साथ बैठे अमित मिले। विकास को लेकर सवाल करते ही तपाक से बोले -आप जिस रास्ते से होकर आईं हैं या फिर आगे जिन रास्तों से जाएंगी, खुद ही महसूस कर लीजिएगा।

नगरोटा ने तो अजातशत्रु, जुगल किशोर और दिवंगत देवेंदर सिंह राणा जैसे दिग्गज नेताओं को सिर आंखों पर बिठाया? यह सवाल अभी मुकम्मल भी नहीं हुआ था कि अमित बोल पड़े-अरे! पलकों पर तो हम आगे भी बिठाएंगे, इसमें तो कोई दो राय नहीं है पर यह भी सच है कि हमें एक दुरुस्त सड़क भी मयस्सर नहीं हुई।

थोड़ा सा आगे चलने पर हमें पंगाली के रमेश, गणेश, शिब्बा के बाग के हुसैन मिले। वे भी चुनावी सवालों पर कहते हैं कि नेता तो बहुत आए पर रास्तों पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। दिया होता तो बारिश में यह हाल नहीं हुआ होता।

हर तरफ एक जैसी शिकायतें...मोदी फैक्टर का दिख रहा असर
नगरोटा से जानीपुर होते हुए भलवाल तक पहुंचने तक कई लोग मिले। चेहरे तो बदले पर शिकायतें एक जैसी मिलीं। टूटे जूते बना रहे रतनाल के पास हम पहुंचे। वे कील पर हथौड़ी से ऐसा वार कर रहे थे मानो सारा गुस्सा उसी पर निकल रहा हो।

सुविधाओं को लेकर सवाल पर कहते हैं, तीन दिन में एक बार पानी आता है, इसी से आप जान लीजिए। घरोटा के दर्शन कुमार सवाल करते ही गड्ढों वाली सड़क की ओर इशारा कर देते हैं। हम बर्न पहुंचे तो छोटी-छोटी दुकानें खोलकर बैठे पूरन सिंह, देवराज और प्रताप कहते हैं कि भाजपा के नेताओं से नाराजगी है पर पीएम मोदी के नाम पर लोग भाजपा को ही जिताएंगे। यह सीट भाजपा की है और उसी की रहेगी। पूरन सिंह कहते हैं कि भाजपा के नेता बोलते तक नहीं, जलसा होता है तो आ जाते हैं।

खुद का वजूद तलाशती महिलाएं
कटर बटाल की ओर आगे बढ़ते वक्त बच्चों को स्कूल लेने जा रहीं रीता देवी और ऊषा देवी मिलती हैं। हमने हाल-चाल पूछा तो मुस्कुराने लगीं। सियासी सवाल पर दोनों बिना किसी लाग लपेट के कहती हैं-हमें कहां कुछ बोलने दिया जाता है। हम लोग मैट्रिक पास हैं।

समय के साथ हम भी आगे बढ़ना चाहते थे, कुछ सीखना चाहते थे पर घर छोड़कर जा नहीं सकते। हमने कौशल विकास के बारे में सुना है पर हमारे यहां दूर-दूर तक कोई सेंटर नहीं है। हमें कोई जानकारी नहीं तो कैसे कोई काम शुरू करें? पास में ही बच्चे के बाल पर उस्तरा चला रहे बिहारी बिना कुछ पूछे ही बोल पड़ते हैं, हमें तो जो सुनेगा, उसे ही वोट देंगे।

जयकार नहीं काम का फनकार चाहिए 
बर्न से आगे बढ़े तो हमें डीडीसी का चुनाव लड़ चुके सोमनाथ खजूरिया मिले। वे कहते हैं- देखिए, एक चीज मैं साफ कर देना चाहता हूं कि यहां के लोगों की जयकार की राजनीति पसंद नहीं है। जो यहां की समस्याओं को समझे, लोगों को समझ सके, ऐसा नेता चाहिए। पैराशूट लेकर कोई कूद पड़े और कहे कि हम दावेदार हैं, ऐसा नहीं चलेगा। साथ में मौजूद कौशल बीच में कूद पड़े। वे बोले, हमें ऐसा नेता चाहिए जो सिर्फ वादे न करे, उसे पूरा भी करे।

शिकायतों पर भारी जातीय गोलबंदी इस विधानसभा सीट पर राजपूत, अनुसूचित जाति, गुज्जर, ब्राह्मण और ओबीसी वोटर जीत-हार तय करते हैं। एक वर्ग मानता है कि राजपूत और ब्राह्मण बराबर हैं और जीत के समीकरण साधने में उनकी बड़ी भूमिका होगी, तो दूसरे वर्ग का मानना है कि अनुसूचित जाति के मतदाता बड़ा बदलाव ला सकते हैं। लोगों की बातचीत में भले ही शिकवा-शिकायतें उभरकर आती हों लेकिन एक बात साफ हो जाती है कि जीत की पटकथा जातीय गोलबंदी ही लिखेगी।


पिछले चुनावों की बात

वर्ष विजेता पार्टी मत
1996 अजातशत्रु नेकां 7,849
2002 जुगल किशोर भाजपा 10,653
2008 जुगल किशोर भाजपा 11,141
2014 देवेंद्र सिंह राणा नेकां 23,678
2024 देवेंद्र सिंह राणा भाजपा 48,113

 

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