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आतंकियों से जुड़ने वाले सरकारी मुलाजिमों पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

Mon, 21 Dec 2015 10:02 PM IST
Updated Mon, 21 Dec 2015 10:02 PM IST
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after connect with terrorists government employee never get his job again

आतंकी संगठनों से जुड़ने वाले सरकारी मुलाजिमों को पुनर्वास योजना के तहत घर वापसी के बाद फिर से सरकारी नौकरी नहीं मिलेगी। जूनियर इंजीनियर के रूप में सरकारी नौकरी पाने वाले इरशाद अहमद भट की याचिका पर हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस एन पाल वसंथाकुमार ने उक्त फैसला दिया।

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कोर्ट ने कहा कि आतंकी संगठन से जुड़ने वाले सरकारी मुलाजिमों को पुनर्वास योजना के तहत फिर सरकारी नौकरी पर बहाल न किया जाए। इरशाद भट ने आतंकी संगठन से जुड़ने के बाद आत्मसमर्पण किया था और पुनर्वास योजना के तहत फिर से सरकारी नौकरी के लिए हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी।
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याचिकाकर्ता के अनुसार जम्मू कश्मीर सरकार ने आत्मसमर्पण करने वाले आतंकियों के पुनर्वास का वादा किया गया था। उसी आधार पर इरशाद भट ने एक सितंबर 2004 को पुलवामा के एसएसपी के समक्ष हथियारों के साथ आत्मसमर्पण किया था। उसने जूनियर इंजीनियर के रूप में नौकरी हासिल की थी।
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सब डिवीजन किश्तवाड़ में तैनाती के दौरान वह मई 1999 से अचानक बिना सूचना के अनुपस्थित रहा। इस दौरान वह आतंकी संगठन से जुड़ गया। अक्तूबर 2004 में उसने पीएचई डिवीजन किश्तवाड़ में एग्जीक्यूटिव इंजीनियर को ज्वाइनिंग रिपोर्ट दी। उसे ज्वाइनिंग की भी अनुमति दे दी गई।

पुनर्वास योजना में जिक्र नहीं

after connect with terrorists government employee never get his job again

हालांकि चीफ इंजीनियर ने याची को नोटिस जारी करते हुए कहा कि क्यों न उसकी ज्वाइनिंग को अवैध करार दिया जाए। नोटिस पर उसने स्वीकार किया कि वह संबंधित अथारिटी की इजाजत के बिना 4 साल से ज्यादा ड्यूटी से नदारद रहा।

जवाब के आधार पर 25 फरवरी 2005 को सरकार ने उसकी ज्वाइनिंग को अवैध करार दिया। इसी आदेश को उसने चुनौती दी थी। उसका तर्क था कि बिना जांच के ही उसकी ज्वाइनिंग को अवैध करार दिया।

हालांकि सरकार ने 29 मार्च 2006 को मामले की जांच करवाने के आदेश दिए। इसी दौरान सरकार ने जेएंडके के संविधान की धारा 126 (सब सेक्शन 2) के तहत जांच को गैरजरूरी बताते हुए उसे तत्काल प्रभाव से बर्खास्त कर दिया।

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद चीफ जस्टिस ने कहा कि सरकार द्वारा घोषित पुनर्वास योजना में कहीं जिक्र नहीं है कि सरकारी मुलाजिमों को वापस नौकरी पर रखा जाएगा।

हालांकि वकील का कहना था कि सरकार ने आत्मसमर्पण करने वाले कई आतंकियों को नौकरी दी है और याची के साथ भेदभाव किया जा रहा है।

उनका तर्क था कि या तो याची के आवेदन को स्वीकार किया जाए या फिर किसी भी आतंकी को सरकारी नौकरी न दी जाए। सरकारी वकील का कहना था कि नियमानुसार यदि कोई सरकारी मुलाजिम पांच साल तक बिना सूचना अनुपस्थित रहता है तो उसकी नौकरी समाप्त मानी जाती है।

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