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Jammu News: श्रीनगर में महिला हत्याकांड के 3 आरोपी बरी
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श्रीनगर की एक अदालत ने 2017 में एक महिला की हत्या के मामले में तीन लोगों को बरी कर दिया है। इनमें से एक पर हत्या का आरोप था, जबकि दो अन्य पर चोरी किए गए सोने के आभूषण खरीदने का आरोप था। अदालत ने जांच अधिकारी (आईओ) की दोषपूर्ण जांच के लिए उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई की सिफारिश भी की है। प्रथम अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश श्रीनगर, अंजुम आरा की अदालत ने इस मामले में जांच को दोषपूर्ण करार देते हुए कहा कि यह मामला पुखरीबल, बोता कदल, लाल बाजार क्षेत्र में एक महिला की गला दबाकर हत्या से संबंधित था, जिसका शव तीन दिन बाद बरामद हुआ था। महिला का ढाई महीने का दूध पीने वाला शिशु घर में जीवित पाया गया था।
अदालत ने अभियोजन पक्ष के मामले को 20 बिंदुओं पर कमजोर पाया, जिसमें जांच अधिकारी की यह विफलता शामिल थी कि उन्होंने यह नहीं बताया कि कठोर सर्दी में ढाई महीने का बच्चा तीन दिन तक बिना दूध और मानवीय उपस्थिति के कैसे जीवित रह सकता है।अदालत ने कहा, अभियोजन पक्ष के सबूत कमजोर, भंगुर, असंगत और विरोधाभासी हैं, जो अदालत में विश्वास पैदा नहीं करते, बल्कि मामले में गंभीर संदेह पैदा करते हैं। इसके आधार पर मुख्य आरोपी शिराज अहमद इलाही (माचवू छदूरा) को आईपीसी की धारा 302 (हत्या), 380 (घर में चोरी), 454 (घर में घुसपैठ) और 201 (अपराध के सबूत मिटाने) के तहत और दो अन्य आरोपियों, आशिक हुसैन गनई (छदूरा) और मोहम्मद अमीन जरगर (द्रैगम, बडगाम) को धारा 411 (चोरी की संपत्ति बेईमानी से रखने) के तहत बरी कर दिया गया।
अदालत ने अभियोजन पक्ष के मामले को संदिग्ध बनाने वाले कई कारकों का उल्लेख किया, जिसमें सबूतों की अपूर्ण श्रृंखला और यह संदेह शामिल है कि क्या कथित अपराध आरोपियों द्वारा किए गए थे। अदालत ने कहा, आरोपी शिराज (ए-1) को अपराध से जोड़ने वाला एकमात्र सबूत सीडीआर (कॉल रिकॉर्ड विवरण) है, लेकिन घटना स्थल पर उनकी उपस्थिति सिद्ध नहीं हुई। इसके अलावा, चार्जशीट के साथ संलग्न सीडीआर को भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65-बी के तहत सिद्ध नहीं किया गया, जिसके कारण इसे कानूनी रूप से स्वीकार्य नहीं माना गया।
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अदालत ने यह भी बताया कि पड़ोसी, जो सबसे महत्वपूर्ण गवाह थे, को मामले में गवाह के रूप में शामिल नहीं किया गया। जांच अधिकारी ने केवल एक आरोपी पर ध्यान केंद्रित किया और जांच के अन्य पहलुओं को नजरअंदाज किया। वैज्ञानिक साक्ष्य, जैसे सभी संदिग्धों की घटना के समय लोकेशन, एकत्र करने में भी विफलता रही। चोरी किए गए आभूषणों की उचित पहचान नहीं की गई। जांच अधिकारी के बारे में अदालत ने टिप्पणी की कि उन्होंने मामले की जांच उचित तरीके से और आवश्यक मापदंडों के अनुसार नहीं की। अदालत ने कहा, ऐसा प्रतीत होता है कि उन्होंने जानबूझकर और इरादतन अपनी दोषपूर्ण जांच के जरिए आरोपियों को सुरक्षित रास्ता देने का मार्ग प्रशस्त किया। इसके लिए अदालत ने फैसले की प्रति कश्मीर के पुलिस महानिरीक्षक (आईजी) को भेजने का निर्देश दिया ताकि जांच अधिकारी के खिलाफ विभागीय जांच शुरू की जाए।
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अदालत ने अभियोजन पक्ष के मामले को 20 बिंदुओं पर कमजोर पाया, जिसमें जांच अधिकारी की यह विफलता शामिल थी कि उन्होंने यह नहीं बताया कि कठोर सर्दी में ढाई महीने का बच्चा तीन दिन तक बिना दूध और मानवीय उपस्थिति के कैसे जीवित रह सकता है।अदालत ने कहा, अभियोजन पक्ष के सबूत कमजोर, भंगुर, असंगत और विरोधाभासी हैं, जो अदालत में विश्वास पैदा नहीं करते, बल्कि मामले में गंभीर संदेह पैदा करते हैं। इसके आधार पर मुख्य आरोपी शिराज अहमद इलाही (माचवू छदूरा) को आईपीसी की धारा 302 (हत्या), 380 (घर में चोरी), 454 (घर में घुसपैठ) और 201 (अपराध के सबूत मिटाने) के तहत और दो अन्य आरोपियों, आशिक हुसैन गनई (छदूरा) और मोहम्मद अमीन जरगर (द्रैगम, बडगाम) को धारा 411 (चोरी की संपत्ति बेईमानी से रखने) के तहत बरी कर दिया गया।
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अदालत ने अभियोजन पक्ष के मामले को संदिग्ध बनाने वाले कई कारकों का उल्लेख किया, जिसमें सबूतों की अपूर्ण श्रृंखला और यह संदेह शामिल है कि क्या कथित अपराध आरोपियों द्वारा किए गए थे। अदालत ने कहा, आरोपी शिराज (ए-1) को अपराध से जोड़ने वाला एकमात्र सबूत सीडीआर (कॉल रिकॉर्ड विवरण) है, लेकिन घटना स्थल पर उनकी उपस्थिति सिद्ध नहीं हुई। इसके अलावा, चार्जशीट के साथ संलग्न सीडीआर को भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65-बी के तहत सिद्ध नहीं किया गया, जिसके कारण इसे कानूनी रूप से स्वीकार्य नहीं माना गया।
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अदालत ने यह भी बताया कि पड़ोसी, जो सबसे महत्वपूर्ण गवाह थे, को मामले में गवाह के रूप में शामिल नहीं किया गया। जांच अधिकारी ने केवल एक आरोपी पर ध्यान केंद्रित किया और जांच के अन्य पहलुओं को नजरअंदाज किया। वैज्ञानिक साक्ष्य, जैसे सभी संदिग्धों की घटना के समय लोकेशन, एकत्र करने में भी विफलता रही। चोरी किए गए आभूषणों की उचित पहचान नहीं की गई। जांच अधिकारी के बारे में अदालत ने टिप्पणी की कि उन्होंने मामले की जांच उचित तरीके से और आवश्यक मापदंडों के अनुसार नहीं की। अदालत ने कहा, ऐसा प्रतीत होता है कि उन्होंने जानबूझकर और इरादतन अपनी दोषपूर्ण जांच के जरिए आरोपियों को सुरक्षित रास्ता देने का मार्ग प्रशस्त किया। इसके लिए अदालत ने फैसले की प्रति कश्मीर के पुलिस महानिरीक्षक (आईजी) को भेजने का निर्देश दिया ताकि जांच अधिकारी के खिलाफ विभागीय जांच शुरू की जाए।