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तीन लाख की मदद नाकाफी : उड़ी के सलामाबाद के लोग घर दोबारा बनाने के लिए कर रहे संघर्ष
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- निर्माण कार्य में दुश्वारियों का करना पड़ रहा है सामना, उन लम्हों को याद कर खड़े होते हैं रोंगटे
साकिब नबी/अमृतपाल सिंह बाली
उड़ी (बारामुला)। ऑपरेशन सिंदूर की वर्षगांठ पर सीमांत जिले बारामुला के उड़ी सेक्टर के गांव सलामाबाद के निवासियों ने अपने क्षतिग्रस्त घरों को लेकर गंभीर चिंता जताई है। उनका कहना है कि पुनर्वास के लिए पर्याप्त मदद न मिलने के कारण उन्हें अभी भी परेशानी झेलनी पड़ रही है। वे लोग दोबारा घर बनाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि कई परिवार अभी भी असुरक्षित और अस्थायी हालात में रह रहे हैं क्योंकि उनके घर अभी भी खराब हालत में हैं। हालांकि सरकार ने दोबारा निर्माण के लिए 3 लाख की सहायता दी है लेकिन निवासियों का कहना है कि यह राशि घर बनाने की असली लागत को पूरा करने के लिए नाकाफी है।
एक स्थानीय निवासी तालिब हुसैन ने कहा कि हम मजदूर हैं और दिन के सिर्फ 500-600 कमाते हैं। खाने और दवाइयों का इंतजाम करना ही पहले से मुश्किल है। इतनी कम रकम से हम घर दोबारा कैसे बना सकते हैं। उन्होंने कहा कि यहां की भौगोलिक स्थिति और बाधाएं कड़ी करती है। निवासियों ने कहा कि सड़कों तक ठीक से पहुंच न होने के कारण उन्हें निर्माण सामग्री खुद ही ढोकर लानी पड़ती है।
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जलाल दीन ने कहा कि हमें निर्माण सामग्री अपने सिर पर ढोकर लानी पड़ती है जिससे यह काम और भी मुश्किल और महंगा हो जाता है। स्थानीय निवासी साइमा ने अधिकारियों की ओर से कोई जवाब न मिलने पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि हमें तुरंत ठीक-ठाक घरों की जरूरत है। सरकार की चुप्पी चिंताजनक है। हमारे परिवारों की कोई पक्की आमदनी नहीं है और हमारे माता-पिता मजदूर हैं। हमारे पास कोई और सहारा नहीं है।
निवासियों ने यह भी बताया कि उन्हें अब तक बैंकों से कोई सहायता या कोई अन्य वित्तीय योजना का लाभ नहीं मिला है। कई परिवार अभी भी ऐसे क्वार्टरों में रह रहे हैं जहां बंकरों की सुविधा नहीं है जिससे वे असुरक्षित हैं।
एक निवासी फारूक अहमद ने कहा कि स्थानीय लोगों के अनुसार 3 लाख में क्या बन सकता है। हमें निर्माण के लिए सिर्फ इतनी ही रकम दी गई है। हमारे पास बंकर भी नहीं हैं और हमें अस्थायी क्वार्टरों में रहने पर मजबूर होना पड़ रहा है। हमारे पास कोई और सहारा नहीं है। सलामाबाद के लोगों ने केंद्र सरकार और जिला प्रशासन से अपील की है कि वे मुआवजा बढ़ाएँ और अतिरिक्त सहायता दें जिसमें उचित बुनियादी ढांचा और बंकर शामिल हों ताकि वे अपने घर दोबारा बना सकें और सम्मान के साथ जी सकें।
बता दें कि आज भी इस इलाके के लोग एक साल पहले की पाकिस्तानी गोलाबारी को याद कर सहम उठते हैं। उनके अनुसार उन्हें जब वो लम्हे याद आते हैं तो उनके रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
अगर पाकिस्तान नापाक हरकत करता है सिर छुपाने के लिए आसरा नहीं
पाकिस्तानी गोलाबारी मेंन घायल हुई जीनत भी उस दौरान घायल हुई थी। मोबाइल में अपनी तब की तस्वीर दिखाते हुए उसने कहा कि अगर आज के दौर में पाकिस्तान फिर से कोई नापाक हरकत करता है तो कई लोगों के पास सिर छुपाने के लिए आसरा नहीं है। यहां अंडरग्राउंड कम्युनिटी बंकरों की शदीद आवश्यकता है जिसपर सरकारों को विचार करना चाहिए।
गौरतलब है कि ऑपरेशन सिंदूर की वर्षगांठ ने एक बार फिर उनके संघर्षों को सबके सामने ला दिया है और निवासी उम्मीद कर रहे हैं कि इस मामले में तुरंत दखल दिया जाएगा और पुनर्वास के लिए सार्थक कदम उठाए जाएंगे। संवाद/ब्यूरो
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साकिब नबी/अमृतपाल सिंह बाली
उड़ी (बारामुला)। ऑपरेशन सिंदूर की वर्षगांठ पर सीमांत जिले बारामुला के उड़ी सेक्टर के गांव सलामाबाद के निवासियों ने अपने क्षतिग्रस्त घरों को लेकर गंभीर चिंता जताई है। उनका कहना है कि पुनर्वास के लिए पर्याप्त मदद न मिलने के कारण उन्हें अभी भी परेशानी झेलनी पड़ रही है। वे लोग दोबारा घर बनाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि कई परिवार अभी भी असुरक्षित और अस्थायी हालात में रह रहे हैं क्योंकि उनके घर अभी भी खराब हालत में हैं। हालांकि सरकार ने दोबारा निर्माण के लिए 3 लाख की सहायता दी है लेकिन निवासियों का कहना है कि यह राशि घर बनाने की असली लागत को पूरा करने के लिए नाकाफी है।
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एक स्थानीय निवासी तालिब हुसैन ने कहा कि हम मजदूर हैं और दिन के सिर्फ 500-600 कमाते हैं। खाने और दवाइयों का इंतजाम करना ही पहले से मुश्किल है। इतनी कम रकम से हम घर दोबारा कैसे बना सकते हैं। उन्होंने कहा कि यहां की भौगोलिक स्थिति और बाधाएं कड़ी करती है। निवासियों ने कहा कि सड़कों तक ठीक से पहुंच न होने के कारण उन्हें निर्माण सामग्री खुद ही ढोकर लानी पड़ती है।
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जलाल दीन ने कहा कि हमें निर्माण सामग्री अपने सिर पर ढोकर लानी पड़ती है जिससे यह काम और भी मुश्किल और महंगा हो जाता है। स्थानीय निवासी साइमा ने अधिकारियों की ओर से कोई जवाब न मिलने पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि हमें तुरंत ठीक-ठाक घरों की जरूरत है। सरकार की चुप्पी चिंताजनक है। हमारे परिवारों की कोई पक्की आमदनी नहीं है और हमारे माता-पिता मजदूर हैं। हमारे पास कोई और सहारा नहीं है।
निवासियों ने यह भी बताया कि उन्हें अब तक बैंकों से कोई सहायता या कोई अन्य वित्तीय योजना का लाभ नहीं मिला है। कई परिवार अभी भी ऐसे क्वार्टरों में रह रहे हैं जहां बंकरों की सुविधा नहीं है जिससे वे असुरक्षित हैं।
एक निवासी फारूक अहमद ने कहा कि स्थानीय लोगों के अनुसार 3 लाख में क्या बन सकता है। हमें निर्माण के लिए सिर्फ इतनी ही रकम दी गई है। हमारे पास बंकर भी नहीं हैं और हमें अस्थायी क्वार्टरों में रहने पर मजबूर होना पड़ रहा है। हमारे पास कोई और सहारा नहीं है। सलामाबाद के लोगों ने केंद्र सरकार और जिला प्रशासन से अपील की है कि वे मुआवजा बढ़ाएँ और अतिरिक्त सहायता दें जिसमें उचित बुनियादी ढांचा और बंकर शामिल हों ताकि वे अपने घर दोबारा बना सकें और सम्मान के साथ जी सकें।
बता दें कि आज भी इस इलाके के लोग एक साल पहले की पाकिस्तानी गोलाबारी को याद कर सहम उठते हैं। उनके अनुसार उन्हें जब वो लम्हे याद आते हैं तो उनके रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
अगर पाकिस्तान नापाक हरकत करता है सिर छुपाने के लिए आसरा नहीं
पाकिस्तानी गोलाबारी मेंन घायल हुई जीनत भी उस दौरान घायल हुई थी। मोबाइल में अपनी तब की तस्वीर दिखाते हुए उसने कहा कि अगर आज के दौर में पाकिस्तान फिर से कोई नापाक हरकत करता है तो कई लोगों के पास सिर छुपाने के लिए आसरा नहीं है। यहां अंडरग्राउंड कम्युनिटी बंकरों की शदीद आवश्यकता है जिसपर सरकारों को विचार करना चाहिए।
गौरतलब है कि ऑपरेशन सिंदूर की वर्षगांठ ने एक बार फिर उनके संघर्षों को सबके सामने ला दिया है और निवासी उम्मीद कर रहे हैं कि इस मामले में तुरंत दखल दिया जाएगा और पुनर्वास के लिए सार्थक कदम उठाए जाएंगे। संवाद/ब्यूरो