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Srinagar News: बेटियों के पंखों को उड़ान दें परिवार, कश्मीर की सादिया ने कैब सेवा से लिखी कामयाबी की नई इबारत
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बुराक कैब्स की मालिक सादिया भट। संवाद
- इस मुहिम से 1000 से अधिक ड्राइवर जुड़ चुके हैं और 20,000 से ज्यादा ग्राहक उनकी सेवाओं का लाभ उठा रहे हैं
अमृतपाल सिंह बाली
श्रीनगर। कश्मीर घाटी के पुरुष प्रधान परिवहन क्षेत्र में कुपवाड़ा की सादिया ने अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति से एक ऐसी मिसाल पेश की है, जो न केवल महिला सशक्तीकरण का प्रतीक है बल्कि बेरोजगारी के विरुद्ध एक ठोस प्रहार भी है। सीमांत जिले लोलाब से निकलकर श्रीनगर में शिक्षा प्राप्त करने वाली सादिया ने ''बुराक कैब्स'' के माध्यम से ऑनलाइन परिवहन सेवा शुरू की है जिसका उद्देश्य दूर-दराज के इलाकों में आवाजाही को सुलभ बनाना और युवाओं के लिए रोजगार के अवसर पैदा करना है।
सादिया के इस सफर की नींव उनके पिता द्वारा दिए गए सेवा और परोपकार के संस्कारों पर टिकी है जिन्होंने बचपन में ही उन्हें सिखाया था कि वह जिंदगी ही क्या जो केवल अपने लिए जी जाए। इसी प्रेरणा को ध्येय बनाकर उन्होंने एक ऐसा बिजनेस मॉडल तैयार किया जो समाज की बुनियादी समस्या का समाधान कर सके। घाटी की भौगोलिक चुनौतियों और परिवहन की कमी को देखते हुए उन्होंने परिवार के सामने ऑनलाइन कैब सर्विस का प्रस्ताव रखा जिसे उनके अपनों का भरपूर समर्थन मिला।
वर्तमान में सादिया की इस मुहिम से 1000 से अधिक ड्राइवर जुड़ चुके हैं और 20,000 से ज्यादा ग्राहक उनकी सेवाओं का लाभ उठा रहे हैं। एंड्राइड और एप्पल स्टोर पर उपलब्ध उनके ऐप के जरिए कश्मीर के उत्तरी से लेकर दक्षिणी छोर तक परिवहन सुविधाएं मुहैया कराई जा रही हैं। यह पहल उन क्षेत्रों के लिए वरदान साबित हो रही है जहां शाम ढलते ही सार्वजनिक परिवहन के साधन सिमट जाते थे।
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सादिया अपनी इस सफलता का श्रेय अपने पति को देती हैं और उस धारणा को चुनौती देती हैं जिसमें शादी के बाद महिलाओं के सपनों को घर की चहारदीवारी तक सीमित कर दिया जाता है। उनके अनुसार अक्सर एक सफल पुरुष के पीछे महिला का हाथ बताया जाता है लेकिन उनके मामले में पति उनके सबसे बड़े मार्गदर्शक और स्तंभ रहे हैं। विषम परिस्थितियों और देर रात की इमरजेंसी कॉल्स के दौरान ग्राहकों से मिलने वाला सकारात्मक फीडबैक उनके परिवार के गर्व को और बढ़ा देता है।
अटूट इच्छाशक्ति ने हर बाधा को पार किया
संघर्ष के दिनों को याद करते हुए सादिया बताती हैं कि एक महिला के तौर पर इस क्षेत्र में नेतृत्व करना चुनौतीपूर्ण था लेकिन उनकी अटूट इच्छाशक्ति ने हर बाधा को पार कर लिया। उनका मानना है कि कोई भी काम छोटा नहीं होता और कर्म ही पूजा है। वह अन्य महिलाओं को संदेश देती हैं कि समय की कीमत पहचानें और झिझक त्याग कर आत्मनिर्भर बनने की दिशा में कदम बढ़ाएं क्योंकि जो काम आज संभव है, उसे कल पर टालना अवसरों को खोने जैसा है।
बेटियों के सपनों का गला नहीं घोंटना चाहिए
अभिभावकों से भावुक अपील करते हुए सादिया कहती हैं कि परिवारों को अपनी बेटियों के सपनों का गला नहीं घोंटना चाहिए। यदि बेटियों को भी बेटों की तरह समान अवसर और समर्थन मिले तो वे न केवल परिवार बल्कि पूरे समाज का नाम रोशन कर सकती हैं। आज कश्मीर की यह बेटी साबित कर चुकी है कि अगर हौसलों में जान हो तो घाटी की दुर्गम राहें भी कामयाबी का रास्ता बन जाती हैं।
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अमृतपाल सिंह बाली
श्रीनगर। कश्मीर घाटी के पुरुष प्रधान परिवहन क्षेत्र में कुपवाड़ा की सादिया ने अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति से एक ऐसी मिसाल पेश की है, जो न केवल महिला सशक्तीकरण का प्रतीक है बल्कि बेरोजगारी के विरुद्ध एक ठोस प्रहार भी है। सीमांत जिले लोलाब से निकलकर श्रीनगर में शिक्षा प्राप्त करने वाली सादिया ने ''बुराक कैब्स'' के माध्यम से ऑनलाइन परिवहन सेवा शुरू की है जिसका उद्देश्य दूर-दराज के इलाकों में आवाजाही को सुलभ बनाना और युवाओं के लिए रोजगार के अवसर पैदा करना है।
सादिया के इस सफर की नींव उनके पिता द्वारा दिए गए सेवा और परोपकार के संस्कारों पर टिकी है जिन्होंने बचपन में ही उन्हें सिखाया था कि वह जिंदगी ही क्या जो केवल अपने लिए जी जाए। इसी प्रेरणा को ध्येय बनाकर उन्होंने एक ऐसा बिजनेस मॉडल तैयार किया जो समाज की बुनियादी समस्या का समाधान कर सके। घाटी की भौगोलिक चुनौतियों और परिवहन की कमी को देखते हुए उन्होंने परिवार के सामने ऑनलाइन कैब सर्विस का प्रस्ताव रखा जिसे उनके अपनों का भरपूर समर्थन मिला।
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वर्तमान में सादिया की इस मुहिम से 1000 से अधिक ड्राइवर जुड़ चुके हैं और 20,000 से ज्यादा ग्राहक उनकी सेवाओं का लाभ उठा रहे हैं। एंड्राइड और एप्पल स्टोर पर उपलब्ध उनके ऐप के जरिए कश्मीर के उत्तरी से लेकर दक्षिणी छोर तक परिवहन सुविधाएं मुहैया कराई जा रही हैं। यह पहल उन क्षेत्रों के लिए वरदान साबित हो रही है जहां शाम ढलते ही सार्वजनिक परिवहन के साधन सिमट जाते थे।
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सादिया अपनी इस सफलता का श्रेय अपने पति को देती हैं और उस धारणा को चुनौती देती हैं जिसमें शादी के बाद महिलाओं के सपनों को घर की चहारदीवारी तक सीमित कर दिया जाता है। उनके अनुसार अक्सर एक सफल पुरुष के पीछे महिला का हाथ बताया जाता है लेकिन उनके मामले में पति उनके सबसे बड़े मार्गदर्शक और स्तंभ रहे हैं। विषम परिस्थितियों और देर रात की इमरजेंसी कॉल्स के दौरान ग्राहकों से मिलने वाला सकारात्मक फीडबैक उनके परिवार के गर्व को और बढ़ा देता है।
अटूट इच्छाशक्ति ने हर बाधा को पार किया
संघर्ष के दिनों को याद करते हुए सादिया बताती हैं कि एक महिला के तौर पर इस क्षेत्र में नेतृत्व करना चुनौतीपूर्ण था लेकिन उनकी अटूट इच्छाशक्ति ने हर बाधा को पार कर लिया। उनका मानना है कि कोई भी काम छोटा नहीं होता और कर्म ही पूजा है। वह अन्य महिलाओं को संदेश देती हैं कि समय की कीमत पहचानें और झिझक त्याग कर आत्मनिर्भर बनने की दिशा में कदम बढ़ाएं क्योंकि जो काम आज संभव है, उसे कल पर टालना अवसरों को खोने जैसा है।
बेटियों के सपनों का गला नहीं घोंटना चाहिए
अभिभावकों से भावुक अपील करते हुए सादिया कहती हैं कि परिवारों को अपनी बेटियों के सपनों का गला नहीं घोंटना चाहिए। यदि बेटियों को भी बेटों की तरह समान अवसर और समर्थन मिले तो वे न केवल परिवार बल्कि पूरे समाज का नाम रोशन कर सकती हैं। आज कश्मीर की यह बेटी साबित कर चुकी है कि अगर हौसलों में जान हो तो घाटी की दुर्गम राहें भी कामयाबी का रास्ता बन जाती हैं।