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Srinagar News: डल की लहरों पर लौटा 60 का हसीन दौर, दीवाना हुआ बादल गूंजा तो साथ गुनगुनाए लोग
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श्रीनगर के एसकेआईसीसी के पीछे डल झील में तैरती स्क्रीन में दिखाई गई फिल्म कश्मीर की कली। संवाद
- इंटरनेशनल फिल्म महोत्सव में डल झील में तैरती स्क्रीन पर हुआ कश्मीर की कली फिल्म का प्रदर्शन
अजीम यूसुफ
श्रीनगर। डल झील के शांत पानी पर जब चिनार के पत्तों को छूकर आती शाम की ठंडी हवाएं तैर रही थीं, तब वहां इतिहास और सिनेमा का एक बेहद भावुक संगम देखने को मिला। इंटरनेशनल फिल्म महोत्सव के तहत बुधवार शाम डल किनारे एक विशाल फ्लोटिंग स्क्रीन लगाई गई, जहां 1964 की सदाबहार क्लासिक फिल्म कश्मीर की कली दिखाई गई। झील के पानी में सज-धज कर खड़े शिकारों, हाउस बोटों की बालकनियों और डलगेट के घाटों पर बैठे सैकड़ों लोग इस ऐतिहासिक शाम के गवाह बने।
फिल्म की शुरुआत होते ही जब स्क्रीन पर शम्मी कपूर का वही चिर-परिचित बेपरवाह अंदाज दिखा, तो डल किनारे बैठी भीड़ सीटियों और तालियों से गूंज उठी। फिल्म का वह मशहूर दृश्य, जहां शर्मिला टैगोर (चंपा) पारंपरिक कश्मीरी पोशाक (फेरन और तरंगा) पहने डल झील में फूलों से भरा शिकारा चलाती नजर आती हैं, स्क्रीन पर आते ही बुजुर्ग दर्शक पुरानी यादों में खो गए। जैसे ही मोहम्मद रफी और आशा भोसले की आवाज में दीवाना हुआ बादल, सावन की घटा छाई... गाना शुरू हुआ और शम्मी कपूर अपने शिकारे से झुककर शर्मिला के शिकारे के इर्द-गिर्द चक्कर काटने लगे, सामने डल में मौजूद असली शिकारों पर बैठे लोग भी खुद को गुनगुनाने से नहीं रोक सके। तारीफ करूं क्या उसकी जिसने तुम्हें बनाया...के सुरों पर शम्मी कपूर का झील के किनारे उछल-कूद कर नाचना और उनका चंचल अंदाज दर्शकों के चेहरों पर वही पुरानी मुस्कान ले आया।
इस खास स्क्रीनिंग की सबसे खूबसूरत तस्वीर यह थी कि यहां 70 पार कर चुके बुजुर्गों के साथ कॉलेज जाने वाले युवा भी बराबर की संख्या में मौजूद थे। कई बुजुर्ग अपने पोते-पोतियों को उंगली से इशारा करके दिखा रहे थे कि उनके जमाने में डल झील, डलगेट और नेहरू पार्क के आसपास का इलाका कैसा दिखता था।
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फिल्म खत्म होने के बाद भी लोग देर तक घाटों और शिकारों पर जमे रहे। बुजुर्ग जहां उस दौर की शूटिंग और शम्मी कपूर के श्रीनगर दौरों के किस्से नई पीढ़ी को सुना रहे थे, वहीं युवा इन पलों को अपने कैमरों में कैद कर रहे थे। आयोजकों की यह पहल केवल एक फिल्म की स्क्रीनिंग नहीं थी, बल्कि सिनेमा के उस सुनहरे दौर का उत्सव थी जिसने कश्मीर को भारतीय सिनेमा के दिल में हमेशा के लिए अमर कर दिया।
फिल्म देख भावुक हुए लोग
- जब 1964 में यह फिल्म आई थी, तब दिल्ली में इसे देखने गया था। आज पूरे 62 साल बाद उसी फिल्म को, अपने ही शिकारे में बैठकर डल की लहरों के बीच देखना एक रूहानी तजुर्बा है। शम्मी साहब का वो अंदाज और हमारी वादियों का वो पुराना दौर देखकर आंखें नम हो गईं। - गुलाम रसूल डार (74) वरिष्ठ नागरिक डलगेट
- शक्ति सामंत की यह फिल्म सिर्फ एक प्रेम कहानी नहीं थी, यह कश्मीर की आबोहवा, तहजीब और अमन का वो आईना थी जिसने पूरी दुनिया को घाटी का दीवाना बना दिया था। आज जब स्क्रीन पर उस पुराने कश्मीर को देखा, तो लगा जैसे वक्त का पहिया पीछे घूम गया हो। - प्रोफेसर गुलाम अहमद (68) सेवानिवृत्त शिक्षक
- हम आज की आधुनिक फिल्में देखते हैं, लेकिन जो सादगी और संगीत इस दौर में था, वह बेजोड़ है। गाने के साथ जब बैकग्राउंड में हमारी डल झील और जबरवान की पहाड़ियां दिखीं, तो अपनी विरासत पर फख्र हुआ। दादाजी के चेहरे पर जो चमक थी, उसने इस शाम को यादगार बना दिया। - आलिया मीर (22) कश्मीर विश्वविद्यालय की छात्रा
- हम कश्मीर घूमने आए थे और हमें यह तोहफा मिल गया। झील के बीच शिकारे पर बैठकर ‘कश्मीर की कली’ देखना जिंदगी के सबसे खूबसूरत अनुभवों में से एक रहेगा। - रंजीत सिंह, पर्यटक, पंजाब
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अजीम यूसुफ
श्रीनगर। डल झील के शांत पानी पर जब चिनार के पत्तों को छूकर आती शाम की ठंडी हवाएं तैर रही थीं, तब वहां इतिहास और सिनेमा का एक बेहद भावुक संगम देखने को मिला। इंटरनेशनल फिल्म महोत्सव के तहत बुधवार शाम डल किनारे एक विशाल फ्लोटिंग स्क्रीन लगाई गई, जहां 1964 की सदाबहार क्लासिक फिल्म कश्मीर की कली दिखाई गई। झील के पानी में सज-धज कर खड़े शिकारों, हाउस बोटों की बालकनियों और डलगेट के घाटों पर बैठे सैकड़ों लोग इस ऐतिहासिक शाम के गवाह बने।
फिल्म की शुरुआत होते ही जब स्क्रीन पर शम्मी कपूर का वही चिर-परिचित बेपरवाह अंदाज दिखा, तो डल किनारे बैठी भीड़ सीटियों और तालियों से गूंज उठी। फिल्म का वह मशहूर दृश्य, जहां शर्मिला टैगोर (चंपा) पारंपरिक कश्मीरी पोशाक (फेरन और तरंगा) पहने डल झील में फूलों से भरा शिकारा चलाती नजर आती हैं, स्क्रीन पर आते ही बुजुर्ग दर्शक पुरानी यादों में खो गए। जैसे ही मोहम्मद रफी और आशा भोसले की आवाज में दीवाना हुआ बादल, सावन की घटा छाई... गाना शुरू हुआ और शम्मी कपूर अपने शिकारे से झुककर शर्मिला के शिकारे के इर्द-गिर्द चक्कर काटने लगे, सामने डल में मौजूद असली शिकारों पर बैठे लोग भी खुद को गुनगुनाने से नहीं रोक सके। तारीफ करूं क्या उसकी जिसने तुम्हें बनाया...के सुरों पर शम्मी कपूर का झील के किनारे उछल-कूद कर नाचना और उनका चंचल अंदाज दर्शकों के चेहरों पर वही पुरानी मुस्कान ले आया।
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इस खास स्क्रीनिंग की सबसे खूबसूरत तस्वीर यह थी कि यहां 70 पार कर चुके बुजुर्गों के साथ कॉलेज जाने वाले युवा भी बराबर की संख्या में मौजूद थे। कई बुजुर्ग अपने पोते-पोतियों को उंगली से इशारा करके दिखा रहे थे कि उनके जमाने में डल झील, डलगेट और नेहरू पार्क के आसपास का इलाका कैसा दिखता था।
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फिल्म खत्म होने के बाद भी लोग देर तक घाटों और शिकारों पर जमे रहे। बुजुर्ग जहां उस दौर की शूटिंग और शम्मी कपूर के श्रीनगर दौरों के किस्से नई पीढ़ी को सुना रहे थे, वहीं युवा इन पलों को अपने कैमरों में कैद कर रहे थे। आयोजकों की यह पहल केवल एक फिल्म की स्क्रीनिंग नहीं थी, बल्कि सिनेमा के उस सुनहरे दौर का उत्सव थी जिसने कश्मीर को भारतीय सिनेमा के दिल में हमेशा के लिए अमर कर दिया।
फिल्म देख भावुक हुए लोग
- जब 1964 में यह फिल्म आई थी, तब दिल्ली में इसे देखने गया था। आज पूरे 62 साल बाद उसी फिल्म को, अपने ही शिकारे में बैठकर डल की लहरों के बीच देखना एक रूहानी तजुर्बा है। शम्मी साहब का वो अंदाज और हमारी वादियों का वो पुराना दौर देखकर आंखें नम हो गईं। - गुलाम रसूल डार (74) वरिष्ठ नागरिक डलगेट
- शक्ति सामंत की यह फिल्म सिर्फ एक प्रेम कहानी नहीं थी, यह कश्मीर की आबोहवा, तहजीब और अमन का वो आईना थी जिसने पूरी दुनिया को घाटी का दीवाना बना दिया था। आज जब स्क्रीन पर उस पुराने कश्मीर को देखा, तो लगा जैसे वक्त का पहिया पीछे घूम गया हो। - प्रोफेसर गुलाम अहमद (68) सेवानिवृत्त शिक्षक
- हम आज की आधुनिक फिल्में देखते हैं, लेकिन जो सादगी और संगीत इस दौर में था, वह बेजोड़ है। गाने के साथ जब बैकग्राउंड में हमारी डल झील और जबरवान की पहाड़ियां दिखीं, तो अपनी विरासत पर फख्र हुआ। दादाजी के चेहरे पर जो चमक थी, उसने इस शाम को यादगार बना दिया। - आलिया मीर (22) कश्मीर विश्वविद्यालय की छात्रा
- हम कश्मीर घूमने आए थे और हमें यह तोहफा मिल गया। झील के बीच शिकारे पर बैठकर ‘कश्मीर की कली’ देखना जिंदगी के सबसे खूबसूरत अनुभवों में से एक रहेगा। - रंजीत सिंह, पर्यटक, पंजाब