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प्रेम प्रसंग यौन हमला नहीं : हाईकोर्ट
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हाईकोर्ट ने दुष्कर्म के मामले में कुलगाम के व्यक्ति को बरी किया
संवाद न्यूज एजेंसी
श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने शुक्रवार को दुष्कर्म के मामले में कुलगाम के एक व्यक्ति की सजा रद्द कर दी। कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में नाकाम रहा कि घटना के समय पीड़िता नाबालिग थी। हाईकोर्ट ने कहा, प्रेम प्रसंग यौन हमला नहीं है।
जस्टिस संजय धर की बेंच ने यावर अहमद भगत की ओर से दायर अपील को स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट के उस फैसले और सजा के आदेश को रद्द कर दिया जो पिछले साल मार्च में सुनाया गया था। उस आदेश में 2018 में दर्ज एक एफआईआर में आठ साल की कैद की सजा सुनाई गई थी।
ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को अपहरण के आरोपों से तो बरी कर दिया था लेकिन दुष्कर्म के आरोप में दोषी ठहराया था। इसका आधार यह था कि पीड़िता की उम्र 18 साल से कम थी इसलिए उसकी सहमति का कोई महत्व नहीं था। हालांकि हाईकोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष पीड़िता की उम्र को निर्णायक रूप से साबित करने में विफल रहा था।
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कोर्ट ने टिप्पणी की कि ट्रायल कोर्ट ने जिस स्कूल सर्टिफिकेट पर भरोसा किया था उसकी कोई प्रमाणिक कीमत नहीं थी क्योंकि उसमें दर्ज जन्मतिथि का आधार साबित नहीं हो पाया था। कोर्ट ने आगे यह भी पाया कि न तो पीड़िता के पिता और न ही अन्य गवाह पीड़िता की सही उम्र के बारे में कोई विश्वसनीय सबूत दे पाए।
पीड़िता के बयानों की जांच करने पर, कोर्ट ने पाया कि वह अपनी मर्जी से आरोपी के साथ गई थी और उसने आरोपी के साथ आपसी सहमति से शारीरिक संबंध बनाने की बात स्वीकार की थी। कोर्ट ने इस मामले को दो युवा लोगों के बीच प्रेम प्रसंग बताया।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणियों का भी जिक्र किया जिनमें युवाओं के बीच आपसी सहमति से बने संबंधों से जुड़े मामलों में सख्त कानूनों के दुरुपयोग के प्रति आगाह किया गया था। कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि अदालतों को ऐसे मामलों में संदर्भ का सावधानीपूर्वक आकलन करना चाहिए।
यह मानते हुए कि आरोपी को दोषी ठहराना सही नहीं था, कोर्ट ने अपील स्वीकार कर ली और निर्देश दिया कि अगर आरोपी किसी अन्य मामले में वांछित नहीं है, तो उसे तत्काल हिरासत से रिहा कर दिया जाए।
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संवाद न्यूज एजेंसी
श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने शुक्रवार को दुष्कर्म के मामले में कुलगाम के एक व्यक्ति की सजा रद्द कर दी। कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में नाकाम रहा कि घटना के समय पीड़िता नाबालिग थी। हाईकोर्ट ने कहा, प्रेम प्रसंग यौन हमला नहीं है।
जस्टिस संजय धर की बेंच ने यावर अहमद भगत की ओर से दायर अपील को स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट के उस फैसले और सजा के आदेश को रद्द कर दिया जो पिछले साल मार्च में सुनाया गया था। उस आदेश में 2018 में दर्ज एक एफआईआर में आठ साल की कैद की सजा सुनाई गई थी।
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ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को अपहरण के आरोपों से तो बरी कर दिया था लेकिन दुष्कर्म के आरोप में दोषी ठहराया था। इसका आधार यह था कि पीड़िता की उम्र 18 साल से कम थी इसलिए उसकी सहमति का कोई महत्व नहीं था। हालांकि हाईकोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष पीड़िता की उम्र को निर्णायक रूप से साबित करने में विफल रहा था।
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कोर्ट ने टिप्पणी की कि ट्रायल कोर्ट ने जिस स्कूल सर्टिफिकेट पर भरोसा किया था उसकी कोई प्रमाणिक कीमत नहीं थी क्योंकि उसमें दर्ज जन्मतिथि का आधार साबित नहीं हो पाया था। कोर्ट ने आगे यह भी पाया कि न तो पीड़िता के पिता और न ही अन्य गवाह पीड़िता की सही उम्र के बारे में कोई विश्वसनीय सबूत दे पाए।
पीड़िता के बयानों की जांच करने पर, कोर्ट ने पाया कि वह अपनी मर्जी से आरोपी के साथ गई थी और उसने आरोपी के साथ आपसी सहमति से शारीरिक संबंध बनाने की बात स्वीकार की थी। कोर्ट ने इस मामले को दो युवा लोगों के बीच प्रेम प्रसंग बताया।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणियों का भी जिक्र किया जिनमें युवाओं के बीच आपसी सहमति से बने संबंधों से जुड़े मामलों में सख्त कानूनों के दुरुपयोग के प्रति आगाह किया गया था। कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि अदालतों को ऐसे मामलों में संदर्भ का सावधानीपूर्वक आकलन करना चाहिए।
यह मानते हुए कि आरोपी को दोषी ठहराना सही नहीं था, कोर्ट ने अपील स्वीकार कर ली और निर्देश दिया कि अगर आरोपी किसी अन्य मामले में वांछित नहीं है, तो उसे तत्काल हिरासत से रिहा कर दिया जाए।