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निवारक हिरासत का मकसद समाज की सुरक्षा करना है : हाईकोर्ट
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- उच्च न्यायालय ने पब्लिक सेफ्टी एक्ट आदेश को सही ठहराया
संवाद न्यूज एजेंसी
श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के हाईकोर्ट ने कहा है कि निवारक हिरासत का मकसद समाज को सुरक्षा देना है। हाईकोर्ट ने नवंबर 2024 में बडगाम के जिला मजिस्ट्रेट की ओर से पब्लिक सेफ्टी एक्ट के तहत जारी हिरासत आदेश को सही ठहराते हुए यह बात कही।
कावूसा खलीसा नारबल के रहने वाले मोहम्मद अशरफ शेख की याचिका को खारिज करते हुए जस्टिस एमए चौधरी की बेंच ने फैसला सुनाया कि निवारक हिरासत कानून इसलिए बनाए गए हैं ताकि किसी व्यक्ति को राज्य की सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था के लिए नुकसानदेह गतिविधियों में शामिल होने से पहले ही रोका जा सके।
कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि राष्ट्रीय सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था के लिए जिम्मेदार अधिकारी ही इस बात के एकमात्र निर्णायक होते हैं कि ऐसी सुरक्षा के लिए क्या जरूरी है और उनके फैसले उपलब्ध सामग्री से मिली अपनी संतुष्टि पर आधारित होते हैं। निवारक हिरासत का मकसद समाज को सुरक्षा देना है। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति को कुछ करने के लिए सजा देना नहीं है बल्कि उसे कुछ करने से पहले ही रोकना और उसे ऐसा करने से मना करना है। ऐसी हिरासत को शक या उचित संभावना के आधार पर सही ठहराया जा सकता है न कि आपराधिक दोषसिद्धि के लिए जरूरी सबूतों के आधार पर।
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अपनी याचिका में शेख ने जम्मू-कश्मीर पब्लिक सेफ्टी एक्ट, 1978 की धारा 8 के तहत जारी हिरासत आदेश को चुनौती दी थी। उन्होंने तर्क दिया था कि यह आदेश अस्पष्ट और पुरानी बातों पर आधारित था, और उन्हें अपनी बात प्रभावी ढंग से रखने के लिए जरूरी सामग्री उपलब्ध नहीं कराई गई थी।
हालांकि हिरासत के रिकॉर्ड की जांच करने के बाद कोर्ट ने पाया कि सभी प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों का पालन किया गया था। कोर्ट ने पाया कि शेख को हिरासत वारंट, हिरासत के आधार, डॉसियर और संबंधित दस्तावेज उपलब्ध कराए गए थे और उन्हें उनकी समझ में आने वाली भाषा में समझाया भी गया था।
कोर्ट ने शेख के कई मामलों में कथित संलिप्तता पर भी संज्ञान लिया, जिनमें गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम और आईपीसी के तहत अपराध शामिल हैं, साथ ही पिछले कुछ सालों में उनके खिलाफ बार-बार की गई निवारक कार्रवाइयां भी शामिल हैं।
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संवाद न्यूज एजेंसी
श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के हाईकोर्ट ने कहा है कि निवारक हिरासत का मकसद समाज को सुरक्षा देना है। हाईकोर्ट ने नवंबर 2024 में बडगाम के जिला मजिस्ट्रेट की ओर से पब्लिक सेफ्टी एक्ट के तहत जारी हिरासत आदेश को सही ठहराते हुए यह बात कही।
कावूसा खलीसा नारबल के रहने वाले मोहम्मद अशरफ शेख की याचिका को खारिज करते हुए जस्टिस एमए चौधरी की बेंच ने फैसला सुनाया कि निवारक हिरासत कानून इसलिए बनाए गए हैं ताकि किसी व्यक्ति को राज्य की सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था के लिए नुकसानदेह गतिविधियों में शामिल होने से पहले ही रोका जा सके।
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कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि राष्ट्रीय सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था के लिए जिम्मेदार अधिकारी ही इस बात के एकमात्र निर्णायक होते हैं कि ऐसी सुरक्षा के लिए क्या जरूरी है और उनके फैसले उपलब्ध सामग्री से मिली अपनी संतुष्टि पर आधारित होते हैं। निवारक हिरासत का मकसद समाज को सुरक्षा देना है। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति को कुछ करने के लिए सजा देना नहीं है बल्कि उसे कुछ करने से पहले ही रोकना और उसे ऐसा करने से मना करना है। ऐसी हिरासत को शक या उचित संभावना के आधार पर सही ठहराया जा सकता है न कि आपराधिक दोषसिद्धि के लिए जरूरी सबूतों के आधार पर।
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अपनी याचिका में शेख ने जम्मू-कश्मीर पब्लिक सेफ्टी एक्ट, 1978 की धारा 8 के तहत जारी हिरासत आदेश को चुनौती दी थी। उन्होंने तर्क दिया था कि यह आदेश अस्पष्ट और पुरानी बातों पर आधारित था, और उन्हें अपनी बात प्रभावी ढंग से रखने के लिए जरूरी सामग्री उपलब्ध नहीं कराई गई थी।
हालांकि हिरासत के रिकॉर्ड की जांच करने के बाद कोर्ट ने पाया कि सभी प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों का पालन किया गया था। कोर्ट ने पाया कि शेख को हिरासत वारंट, हिरासत के आधार, डॉसियर और संबंधित दस्तावेज उपलब्ध कराए गए थे और उन्हें उनकी समझ में आने वाली भाषा में समझाया भी गया था।
कोर्ट ने शेख के कई मामलों में कथित संलिप्तता पर भी संज्ञान लिया, जिनमें गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम और आईपीसी के तहत अपराध शामिल हैं, साथ ही पिछले कुछ सालों में उनके खिलाफ बार-बार की गई निवारक कार्रवाइयां भी शामिल हैं।