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बढ़ रहे फ्लू के मामले: पल्मोनोलॉजिस्ट ने दी मास्क पहनने और वैक्सीनेशन की सलाह
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श्रीनगर। देशभर में इन्फ्लूएंजा (फ्लू) के बढ़ते मामलों के बीच वरिष्ठ पल्मोनोलॉजिस्ट (फेफड़ा रोग विशेषज्ञ) डॉ. नवीद ने लोगों से रोकथाम और सतर्कता बरतने की पुरजोर अपील की है। उन्होंने कहा कि मौसम में बदलाव और संक्रमण के प्रसार को देखते हुए आम जनता को बुनियादी स्वास्थ्य नियमों का कड़ाई से पालन करना चाहिए।
डॉ. नावीद ने बताया कि इन्फ्लूएंजा के सामान्य लक्षणों में तेज बुखार, ठंड लगना, सूखी खांसी, गले में खराश, बहती या बंद नाक, सिरदर्द, बदन दर्द और अत्यधिक थकान शामिल हैं। इसके अलावा, वयस्कों की तुलना में बच्चों में उल्टी और दस्त की समस्या अधिक देखी जा रही है।
डॉ. नवीद ने संक्रमण की रोकथाम के लिए प्रमुख उपायों पर जोर देते हुए कहा कि सांस से जुड़े लक्षण महसूस होने पर या भीड़भाड़ वाली जगहों पर जाते समय मास्क अनिवार्य रूप से पहनें। इसके अलावा साबुन और पानी से बार-बार हाथ धोएं या हैंड सैनिटाइज़र का उपयोग करें। खांसते या छींकते समय मुंह और नाक को ढकना, कमरों और बंद स्थानों में हवा की उचित निकासी रखना और अस्वस्थ होने पर घर पर ही आराम करना बेहद जरूरी है। उन्होंने विशेष रूप से सुझाव दिया कि उच्च जोखिम वाले समूहों को वार्षिक इन्फ्लूएंजा का टीका जरूर लगवाना चाहिए। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि लक्षण दिखने पर मरीज को तुरंत आइसोलेट हो जाना चाहिए और बीमार बच्चों को किसी भी सूरत में स्कूल न भेजें।
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विशेषज्ञ ने लोगों को पर्याप्त आराम करने, भरपूर मात्रा में तरल पदार्थ पीने और केवल डॉक्टर की सलाह पर ही दवाएं लेने का निर्देश दिया। उन्होंने कहा कि इन्फ्लूएंजा एक वायरल संक्रमण है, इसलिए बिना चिकित्सीय परामर्श के एंटीबायोटिक्स, स्टेरॉयड या एंटीवायरल दवाओं का सेवन बिल्कुल न करें। बीमार व्यक्ति अपने बर्तन, तौलिया और व्यक्तिगत सामान दूसरों के साथ साझा न करें और धूम्रपान से पूरी तरह दूरी बनाकर रखें।
डॉ. नवीद ने चेतावनी दी कि यदि सांस लेने में कठिनाई, सीने में दर्द, भ्रम या अत्यधिक बेचैनी, होंठ या चेहरे का नीला पड़ना, गंभीर डिहाइड्रेशन, ऑक्सीजन स्तर का गिरना या शुरुआती सुधार के बाद हालत फिर से बिगड़ने जैसे लक्षण दिखें तो तुरंत आपातकालीन चिकित्सा सहायता लेनी चाहिए। उन्होंने बताया कि गर्भवती महिलाएं, बुजुर्ग, छोटे बच्चे, पुरानी फेफड़ों या दिल की बीमारियों से पीड़ित मरीज और कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता वाले लोग उच्च जोखिम वर्ग में आते हैं, जिन्हें अतिरिक्त देखभाल की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि फ्लू को लेकर घबराने की कोई बात नहीं है, केवल सतर्कता और समय पर चिकित्सीय सलाह ही बचाव का सबसे बेहतर उपाय है।
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डॉ. नावीद ने बताया कि इन्फ्लूएंजा के सामान्य लक्षणों में तेज बुखार, ठंड लगना, सूखी खांसी, गले में खराश, बहती या बंद नाक, सिरदर्द, बदन दर्द और अत्यधिक थकान शामिल हैं। इसके अलावा, वयस्कों की तुलना में बच्चों में उल्टी और दस्त की समस्या अधिक देखी जा रही है।
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डॉ. नवीद ने संक्रमण की रोकथाम के लिए प्रमुख उपायों पर जोर देते हुए कहा कि सांस से जुड़े लक्षण महसूस होने पर या भीड़भाड़ वाली जगहों पर जाते समय मास्क अनिवार्य रूप से पहनें। इसके अलावा साबुन और पानी से बार-बार हाथ धोएं या हैंड सैनिटाइज़र का उपयोग करें। खांसते या छींकते समय मुंह और नाक को ढकना, कमरों और बंद स्थानों में हवा की उचित निकासी रखना और अस्वस्थ होने पर घर पर ही आराम करना बेहद जरूरी है। उन्होंने विशेष रूप से सुझाव दिया कि उच्च जोखिम वाले समूहों को वार्षिक इन्फ्लूएंजा का टीका जरूर लगवाना चाहिए। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि लक्षण दिखने पर मरीज को तुरंत आइसोलेट हो जाना चाहिए और बीमार बच्चों को किसी भी सूरत में स्कूल न भेजें।
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विशेषज्ञ ने लोगों को पर्याप्त आराम करने, भरपूर मात्रा में तरल पदार्थ पीने और केवल डॉक्टर की सलाह पर ही दवाएं लेने का निर्देश दिया। उन्होंने कहा कि इन्फ्लूएंजा एक वायरल संक्रमण है, इसलिए बिना चिकित्सीय परामर्श के एंटीबायोटिक्स, स्टेरॉयड या एंटीवायरल दवाओं का सेवन बिल्कुल न करें। बीमार व्यक्ति अपने बर्तन, तौलिया और व्यक्तिगत सामान दूसरों के साथ साझा न करें और धूम्रपान से पूरी तरह दूरी बनाकर रखें।
डॉ. नवीद ने चेतावनी दी कि यदि सांस लेने में कठिनाई, सीने में दर्द, भ्रम या अत्यधिक बेचैनी, होंठ या चेहरे का नीला पड़ना, गंभीर डिहाइड्रेशन, ऑक्सीजन स्तर का गिरना या शुरुआती सुधार के बाद हालत फिर से बिगड़ने जैसे लक्षण दिखें तो तुरंत आपातकालीन चिकित्सा सहायता लेनी चाहिए। उन्होंने बताया कि गर्भवती महिलाएं, बुजुर्ग, छोटे बच्चे, पुरानी फेफड़ों या दिल की बीमारियों से पीड़ित मरीज और कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता वाले लोग उच्च जोखिम वर्ग में आते हैं, जिन्हें अतिरिक्त देखभाल की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि फ्लू को लेकर घबराने की कोई बात नहीं है, केवल सतर्कता और समय पर चिकित्सीय सलाह ही बचाव का सबसे बेहतर उपाय है।