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लिमिटेशन कानून का मकसद मूल अधिकारों को खत्म करना नहीं: हाईकोर्ट
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श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने कहा है कि लिमिटेशन के नियम मुकद्दमा लड़ने वालों के अधिकारों को खत्म करने के लिए नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने के लिए हैं कि पक्ष देरी करने की चालें न चलें और एक सही समय के अंदर अपने कानूनी उपायों का इस्तेमाल करें।
जस्टिस संजीव कुमार की बेंच ने यह बात तब कही जब उन्होंने 2013 से लंबित एक सिविल दूसरी अपील के खत्म होने के आदेश को रद्द कर दिया। बेंच ने एक मर चुके प्रतिवादी के कानूनी वारिसों को रिकॉर्ड पर लाने की इजाजत दी। यह फैसला दिया कि प्रक्रिया से जुड़े नियमों को मूल न्याय को आगे बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किया जाना चाहिए न कि तकनीकी आधार पर उसे खत्म करने के लिए।
यह आदेश ''''मकबूल बुहरू और अन्य बनाम अहद बुहरू और अन्य'''' मामले में दिया गया था। यह फैसला अपील के लंबित रहने के दौरान प्रतिवादी मोहम्मद अशरफ की मौत के बाद सामने आई कई अर्जियों पर सुनवाई करते हुए दिया गया। कोर्ट ने पाया कि प्रतिवादी नंबर 7, मोहम्मद अशरफ की मौत 21 मार्च, 2020 को हो गई थी। उनके कानूनी वारिसों को उनकी जगह लाने के लिए तय समय के अंदर कोई अर्जी दाखिल नहीं की गई थी। इसके चलते उनके खिलाफ अपील अपने आप खत्म हो गई थी। हालांकि अपील करने वालों ने दलील दी कि उन्हें उनकी मौत के बारे में तब पता चला जब अक्तूबर 2025 में बाकी बचे प्रतिवादियों ने एक अर्जी दाखिल करके अपील को खत्म मानकर खारिज करने की मांग की।
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कोर्ट ने कहा कि प्रतिवादियों के वकील सिविल प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) के आदेश 22 के नियम 10-ए का पालन करने में नाकाम रहे। इस नियम के तहत वकील को उस पक्ष की मौत के बारे में कोर्ट को जानकारी देना जरूरी होता है, जिसकी वह पैरवी कर रहा होता है। कोर्ट ने फैसला दिया कि पिछली अर्जी में प्रतिवादी के नाम के आगे छोटे अक्षरों में सिर्फ मृत शब्द लिख देना कानूनी जिम्मेदारी का पालन नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने माना कि अपील के खत्म होने के आदेश को रद्द करवाने में हुई 12 दिन की देरी की वजह संतोषजनक ढंग से बताई गई है। इसलिए कोर्ट ने एक उदार रवैया अपनाया और इस बात पर जोर दिया कि लिमिटेशन एक्ट की धारा 5 के तहत इस्तेमाल किए गए शब्द पर्याप्त कारण की व्याख्या न्याय को बढ़ावा देने के मकसद से की जानी चाहिए।
कोर्ट ने कहा कि कोर्ट का मुख्य काम विवादों का फैसला उनके गुण-दोष के आधार पर करना और मूल न्याय को बढ़ावा देना है। कोर्ट ने आगे कहा कि लिमिटेशन के नियमों का मकसद देरी करने की चालों को रोकना है, न कि मूल अधिकारों को खत्म करना। अदालत ने आगे यह भी कहा कि अपील के खत्म होने से जुड़े मामलों में अदालतों को देरी को माफ करने में ज्यादा उदार होना चाहिए, खासकर तब जब जान-बूझकर कोई कार्रवाई न करने, नेकनीयती की कमी या लापरवाही का कोई सबूत न हो। नतीजतन अदालत ने देरी को माफ कर दिया, अपील के खत्म होने के आदेश को रद्द कर दिया। निर्देश दिया कि मृतक प्रतिवादी के कानूनी वारिसों को रिकॉर्ड में शामिल किया जाए। अपीलकर्ताओं से कहा गया है कि वे पक्षों की एक नई सूची दाखिल करें जबकि उनकी जगह आए प्रतिवादियों को नोटिस जारी किए जाएंगे।
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जस्टिस संजीव कुमार की बेंच ने यह बात तब कही जब उन्होंने 2013 से लंबित एक सिविल दूसरी अपील के खत्म होने के आदेश को रद्द कर दिया। बेंच ने एक मर चुके प्रतिवादी के कानूनी वारिसों को रिकॉर्ड पर लाने की इजाजत दी। यह फैसला दिया कि प्रक्रिया से जुड़े नियमों को मूल न्याय को आगे बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किया जाना चाहिए न कि तकनीकी आधार पर उसे खत्म करने के लिए।
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यह आदेश ''''मकबूल बुहरू और अन्य बनाम अहद बुहरू और अन्य'''' मामले में दिया गया था। यह फैसला अपील के लंबित रहने के दौरान प्रतिवादी मोहम्मद अशरफ की मौत के बाद सामने आई कई अर्जियों पर सुनवाई करते हुए दिया गया। कोर्ट ने पाया कि प्रतिवादी नंबर 7, मोहम्मद अशरफ की मौत 21 मार्च, 2020 को हो गई थी। उनके कानूनी वारिसों को उनकी जगह लाने के लिए तय समय के अंदर कोई अर्जी दाखिल नहीं की गई थी। इसके चलते उनके खिलाफ अपील अपने आप खत्म हो गई थी। हालांकि अपील करने वालों ने दलील दी कि उन्हें उनकी मौत के बारे में तब पता चला जब अक्तूबर 2025 में बाकी बचे प्रतिवादियों ने एक अर्जी दाखिल करके अपील को खत्म मानकर खारिज करने की मांग की।
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कोर्ट ने कहा कि प्रतिवादियों के वकील सिविल प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) के आदेश 22 के नियम 10-ए का पालन करने में नाकाम रहे। इस नियम के तहत वकील को उस पक्ष की मौत के बारे में कोर्ट को जानकारी देना जरूरी होता है, जिसकी वह पैरवी कर रहा होता है। कोर्ट ने फैसला दिया कि पिछली अर्जी में प्रतिवादी के नाम के आगे छोटे अक्षरों में सिर्फ मृत शब्द लिख देना कानूनी जिम्मेदारी का पालन नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने माना कि अपील के खत्म होने के आदेश को रद्द करवाने में हुई 12 दिन की देरी की वजह संतोषजनक ढंग से बताई गई है। इसलिए कोर्ट ने एक उदार रवैया अपनाया और इस बात पर जोर दिया कि लिमिटेशन एक्ट की धारा 5 के तहत इस्तेमाल किए गए शब्द पर्याप्त कारण की व्याख्या न्याय को बढ़ावा देने के मकसद से की जानी चाहिए।
कोर्ट ने कहा कि कोर्ट का मुख्य काम विवादों का फैसला उनके गुण-दोष के आधार पर करना और मूल न्याय को बढ़ावा देना है। कोर्ट ने आगे कहा कि लिमिटेशन के नियमों का मकसद देरी करने की चालों को रोकना है, न कि मूल अधिकारों को खत्म करना। अदालत ने आगे यह भी कहा कि अपील के खत्म होने से जुड़े मामलों में अदालतों को देरी को माफ करने में ज्यादा उदार होना चाहिए, खासकर तब जब जान-बूझकर कोई कार्रवाई न करने, नेकनीयती की कमी या लापरवाही का कोई सबूत न हो। नतीजतन अदालत ने देरी को माफ कर दिया, अपील के खत्म होने के आदेश को रद्द कर दिया। निर्देश दिया कि मृतक प्रतिवादी के कानूनी वारिसों को रिकॉर्ड में शामिल किया जाए। अपीलकर्ताओं से कहा गया है कि वे पक्षों की एक नई सूची दाखिल करें जबकि उनकी जगह आए प्रतिवादियों को नोटिस जारी किए जाएंगे।