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Srinagar News: नालंदा दुनिया भर में सीखने और ज्ञान प्राप्त करने का एक प्रतिष्ठित केंद्र रहा
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श्रीनगर। डल किनारे स्थित शेर ए कश्मीर इंटरनेशनल कन्वेंशन सेंटर में शनिवार को श्रीनगर-नालंदा संवाद का आयोजन किया गया। इस दौरान वक्ताओं ने कहा कि नालंदा दुनिया भर में सीखने और ज्ञान प्राप्त करने का एक प्रतिष्ठित केंद्र रहा है।
नालंदा साहित्य महोत्सव के एक हिस्से के तौर पर इसका आयोजन पर्यटन मंत्रालय, संस्कृति विभाग, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा और नव नालंदा महाविहार विश्वविद्यालय ने किया था। इस दौरान वक्ताओं ने नालंदा और कश्मीर के ऐतिहासिक महत्व को रेखांकित करते हुए स्पष्ट किया कि कैसे ये दोनों स्थल सदियों से ज्ञान और विचारों के संगम रहे हैं।
कार्यक्रम का उद्घाटन उपराज्यपाल मनोज सिन्हा और अतिथियों ने दीप जलाकर किया। इस दौरान पद्मश्री प्रो. शफी शौक, पर्यटन मंत्रालय के महानिदेशक सुमन बिल्ला, नव नालंदा महाविहार विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सिद्धार्थ सिंह, निदेशक, नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा नई दिल्ली के निदेशक चित्तरंजन त्रिपाठी, नालंदा साहित्य महोत्सव की फेस्टिवल चेयरपर्सन डी. आलिया, फेस्टिवल डायरेक्टर गंगा कुमार, प्रो. ए रविंदर नाथ, प्रो. निलोफर खान, एसएसपी डॉ. जीवी संदीप चक्रवर्ती, उपायुक्त अक्षय लाब्रू व अन्य मौजूद रहे।
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पर्यटन मंत्रालय के महानिदेशक सुमन बिल्ला ने कहा कि नालंदा दुनिया भर में सीखने और ज्ञान प्राप्त करने का एक प्रतिष्ठित केंद्र रहा है। नालंदा में औपचारिक शिक्षा की शुरुआत दुनिया के अन्य हिस्सों से कई सदियों पहले ही हो चुकी थी। नालंदा विचारों के एक ऐसे मिलन स्थल का प्रतिनिधित्व करता है, जहां दुनिया भर के विद्वानों ने आकर अपने ज्ञान और समझ को एक साथ साझा किया और स्थापित विचारों को चुनौती दी। यह केंद्र विचारों की बहुलता और उन्हें परखने का एक बड़ा माध्यम रहा है, जो आज भी पूरे भारत के लिए गर्व का विषय है।
राजनीतिक प्रणालियां बदलती हैं, अर्थव्यवस्थाएं विकसित होती हैं और तकनीक आगे बढ़ती है, लेकिन मानवीय भावनाएं हमेशा एक जैसी रहती हैं। यही कारण है कि आज भी हम हजारों साल पुरानी रामायण, महाभारत और कश्मीर की धरती पर रचित ''''राजतरंगिणी'''' (जिसे सबसे पुराना ऐतिहासिक रिकॉर्ड माना जाता है) का अध्ययन करते हैं। साहित्य हमें उन स्थानों और परिस्थितियों का अनुभव कराता है जहां हम व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं रहे हैं।
ज्ञान और विचारों का संगम है संवाद : पद्मश्री शफी शौक
पद्मश्री शफी शौक ने कहा कि नालंदा विश्वविद्यालय से लेकर मेरी जन्मभूमि अहरबल तक, इतिहास और ज्ञान की एक अटूट कड़ी रही है। अहरबल से लेकर यहां गोपाद्री तक, जिसे हम शंकराचार्य पहाड़ी कहते हैं और कभी इसे ''''कोह-ए-सुलेमान'''' भी कहा जाता था। यहां से आगे परी महल और फिर हारवन जहां कभी महान चीनी यात्री ह्वेनसांग आए थे और यहां से ज्ञान, संस्कृति और बहुत सारी चीजें अपने साथ लेकर गए थे। यह पूरा बेल्ट यहां से लेकर तक्षशिला और गंधार संस्कृति तक, यह पूरा क्षेत्र विचारों का एक बहुत बड़ा वॉटर-शेड था। यहां इतने सारे विचारों को समाहित किया गया, उन्हें मथा गया और नए विचारों को जन्म दिया गया कि पूरी दुनिया का ध्यान नालंदा विश्वविद्यालय की तरफ आकर्षित हुआ। मैंने जहां भी यात्रा की है, मैंने नालंदा विश्वविद्यालय के इन ऐतिहासिक अवशेषों और प्रभावों को देखा है। गंधार संस्कृति, जिसके हम सब अंश हैं... आज भी हम खुद को गंधार कहते हैं। कल्हण ने भी राजतरंगिणी में हमें गंधर्वास ही कहा है। हम जिसे आज गंदर कहते हैं, वह इसी का हिस्सा है। हमारा खानदर और यहां तक कि हमारी प्रसिद्ध वाजवान संस्कृति भी वहीं से आई है। यह सब हमारे सांस्कृतिक आधार की बुनियाद है।
कश्मीर और नाटक का गहरा रिश्ता : चित्तरंजन त्रिपाठी
चित्तरंजन त्रिपाठी ने कहा कि जहां तक नाटक का सवाल है, कश्मीर के साथ हमारा एक बहुत ही पुराना और गहरा रिश्ता है। यह बात हर कोई जानता है और इसे अलग से दोहराने की आवश्यकता नहीं है। नाट्यशास्त्र के प्रणेता, अभिनवगुप्त, कालिदास और पाणिनी जैसे न जाने कितने ही गुणी विद्वान इस पवित्र भूमि पर आए और अपना महान योगदान देकर गए। कुछ वर्ष पहले यहां राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय का एक सेंटर (शाखा) भी शुरू किया गया था। हम राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के कार्यों को यहाँ धीरे-धीरे और अधिक विस्तारित करेंगे। वर्तमान में हम यहां कई तरह की कार्यशालाएं आयोजित कर रहे हैं। भरत मुनि ने अपने ''''नाट्यशास्त्र'''' में स्पष्ट कहा है कि नाटक (या नाट्य विद्या), जिसे ''''पंचम वेद'''' भी माना गया है, उसके अंतर्गत ऐसी कोई विद्या, कला-कौशल या ज्ञान नहीं है जो समाहित न हो। ऐसा कोई ज्ञान, कोई शिल्प, कोई विद्या या कोई कला नहीं है जो नाट्य में प्रदर्शित न की जा सके। इसी माध्यम से हम सब मिलकर कश्मीर में ज्ञान और कला का निरंतर प्रसारण करेंगे और हमारी सांस्कृतिक साझेदारी को और अधिक बढ़ावा देंगे।
श्रीनगर को बनाया गया प्रमुख केंद्र : सिद्धार्थ सिंह
सिद्धार्थ सिंह ने बताया कि भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा और ऐतिहासिक धरोहरों को पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से एक महत्वपूर्ण पहल की शुरुआत की गई है। प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय** की संवाद परंपरा और उसकी महत्ता को याद करते हुए, नालंदा लिटरेचर फेस्टिवल'''' की योजना बनाई गई। दिसंबर 2025 में इस फेस्टिवल का सफल आयोजन किया गया, जिसके बाद एक विजन डॉक्यूमेंट तैयार किया गया है। इस योजना के तहत भविष्य में देश के विभिन्न शहरों में इस तरह के आयोजनों की रूपरेखा तैयार की गई है, जिसमें अगला प्रमुख केंद्र श्रीनगर को बनाने पर विचार किया गया है। नालंदा लिटरेचर फेस्टिवल'''' के माध्यम से संस्कृति मंत्रालय के तहत कार्यरत ''''नव नालंदा महाविहार'''' एक इंस्टीट्यूशनल पार्टनर के तौर पर जुड़ा है। इस पहल का मुख्य उद्देश्य नालंदा की प्राचीन संवाद परंपरा को पुनर्जीवित करना है। भविष्य के विजन में युवाओं के प्रतिनिधित्व को बढ़ावा देने के साथ-साथ दर्शन और साहित्य का आज की आवश्यकता तकनीक और विज्ञान के साथ संवाद स्थापित करना शामिल है।
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नालंदा साहित्य महोत्सव के एक हिस्से के तौर पर इसका आयोजन पर्यटन मंत्रालय, संस्कृति विभाग, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा और नव नालंदा महाविहार विश्वविद्यालय ने किया था। इस दौरान वक्ताओं ने नालंदा और कश्मीर के ऐतिहासिक महत्व को रेखांकित करते हुए स्पष्ट किया कि कैसे ये दोनों स्थल सदियों से ज्ञान और विचारों के संगम रहे हैं।
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कार्यक्रम का उद्घाटन उपराज्यपाल मनोज सिन्हा और अतिथियों ने दीप जलाकर किया। इस दौरान पद्मश्री प्रो. शफी शौक, पर्यटन मंत्रालय के महानिदेशक सुमन बिल्ला, नव नालंदा महाविहार विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सिद्धार्थ सिंह, निदेशक, नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा नई दिल्ली के निदेशक चित्तरंजन त्रिपाठी, नालंदा साहित्य महोत्सव की फेस्टिवल चेयरपर्सन डी. आलिया, फेस्टिवल डायरेक्टर गंगा कुमार, प्रो. ए रविंदर नाथ, प्रो. निलोफर खान, एसएसपी डॉ. जीवी संदीप चक्रवर्ती, उपायुक्त अक्षय लाब्रू व अन्य मौजूद रहे।
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पर्यटन मंत्रालय के महानिदेशक सुमन बिल्ला ने कहा कि नालंदा दुनिया भर में सीखने और ज्ञान प्राप्त करने का एक प्रतिष्ठित केंद्र रहा है। नालंदा में औपचारिक शिक्षा की शुरुआत दुनिया के अन्य हिस्सों से कई सदियों पहले ही हो चुकी थी। नालंदा विचारों के एक ऐसे मिलन स्थल का प्रतिनिधित्व करता है, जहां दुनिया भर के विद्वानों ने आकर अपने ज्ञान और समझ को एक साथ साझा किया और स्थापित विचारों को चुनौती दी। यह केंद्र विचारों की बहुलता और उन्हें परखने का एक बड़ा माध्यम रहा है, जो आज भी पूरे भारत के लिए गर्व का विषय है।
राजनीतिक प्रणालियां बदलती हैं, अर्थव्यवस्थाएं विकसित होती हैं और तकनीक आगे बढ़ती है, लेकिन मानवीय भावनाएं हमेशा एक जैसी रहती हैं। यही कारण है कि आज भी हम हजारों साल पुरानी रामायण, महाभारत और कश्मीर की धरती पर रचित ''''राजतरंगिणी'''' (जिसे सबसे पुराना ऐतिहासिक रिकॉर्ड माना जाता है) का अध्ययन करते हैं। साहित्य हमें उन स्थानों और परिस्थितियों का अनुभव कराता है जहां हम व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं रहे हैं।
ज्ञान और विचारों का संगम है संवाद : पद्मश्री शफी शौक
पद्मश्री शफी शौक ने कहा कि नालंदा विश्वविद्यालय से लेकर मेरी जन्मभूमि अहरबल तक, इतिहास और ज्ञान की एक अटूट कड़ी रही है। अहरबल से लेकर यहां गोपाद्री तक, जिसे हम शंकराचार्य पहाड़ी कहते हैं और कभी इसे ''''कोह-ए-सुलेमान'''' भी कहा जाता था। यहां से आगे परी महल और फिर हारवन जहां कभी महान चीनी यात्री ह्वेनसांग आए थे और यहां से ज्ञान, संस्कृति और बहुत सारी चीजें अपने साथ लेकर गए थे। यह पूरा बेल्ट यहां से लेकर तक्षशिला और गंधार संस्कृति तक, यह पूरा क्षेत्र विचारों का एक बहुत बड़ा वॉटर-शेड था। यहां इतने सारे विचारों को समाहित किया गया, उन्हें मथा गया और नए विचारों को जन्म दिया गया कि पूरी दुनिया का ध्यान नालंदा विश्वविद्यालय की तरफ आकर्षित हुआ। मैंने जहां भी यात्रा की है, मैंने नालंदा विश्वविद्यालय के इन ऐतिहासिक अवशेषों और प्रभावों को देखा है। गंधार संस्कृति, जिसके हम सब अंश हैं... आज भी हम खुद को गंधार कहते हैं। कल्हण ने भी राजतरंगिणी में हमें गंधर्वास ही कहा है। हम जिसे आज गंदर कहते हैं, वह इसी का हिस्सा है। हमारा खानदर और यहां तक कि हमारी प्रसिद्ध वाजवान संस्कृति भी वहीं से आई है। यह सब हमारे सांस्कृतिक आधार की बुनियाद है।
कश्मीर और नाटक का गहरा रिश्ता : चित्तरंजन त्रिपाठी
चित्तरंजन त्रिपाठी ने कहा कि जहां तक नाटक का सवाल है, कश्मीर के साथ हमारा एक बहुत ही पुराना और गहरा रिश्ता है। यह बात हर कोई जानता है और इसे अलग से दोहराने की आवश्यकता नहीं है। नाट्यशास्त्र के प्रणेता, अभिनवगुप्त, कालिदास और पाणिनी जैसे न जाने कितने ही गुणी विद्वान इस पवित्र भूमि पर आए और अपना महान योगदान देकर गए। कुछ वर्ष पहले यहां राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय का एक सेंटर (शाखा) भी शुरू किया गया था। हम राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के कार्यों को यहाँ धीरे-धीरे और अधिक विस्तारित करेंगे। वर्तमान में हम यहां कई तरह की कार्यशालाएं आयोजित कर रहे हैं। भरत मुनि ने अपने ''''नाट्यशास्त्र'''' में स्पष्ट कहा है कि नाटक (या नाट्य विद्या), जिसे ''''पंचम वेद'''' भी माना गया है, उसके अंतर्गत ऐसी कोई विद्या, कला-कौशल या ज्ञान नहीं है जो समाहित न हो। ऐसा कोई ज्ञान, कोई शिल्प, कोई विद्या या कोई कला नहीं है जो नाट्य में प्रदर्शित न की जा सके। इसी माध्यम से हम सब मिलकर कश्मीर में ज्ञान और कला का निरंतर प्रसारण करेंगे और हमारी सांस्कृतिक साझेदारी को और अधिक बढ़ावा देंगे।
श्रीनगर को बनाया गया प्रमुख केंद्र : सिद्धार्थ सिंह
सिद्धार्थ सिंह ने बताया कि भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा और ऐतिहासिक धरोहरों को पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से एक महत्वपूर्ण पहल की शुरुआत की गई है। प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय** की संवाद परंपरा और उसकी महत्ता को याद करते हुए, नालंदा लिटरेचर फेस्टिवल'''' की योजना बनाई गई। दिसंबर 2025 में इस फेस्टिवल का सफल आयोजन किया गया, जिसके बाद एक विजन डॉक्यूमेंट तैयार किया गया है। इस योजना के तहत भविष्य में देश के विभिन्न शहरों में इस तरह के आयोजनों की रूपरेखा तैयार की गई है, जिसमें अगला प्रमुख केंद्र श्रीनगर को बनाने पर विचार किया गया है। नालंदा लिटरेचर फेस्टिवल'''' के माध्यम से संस्कृति मंत्रालय के तहत कार्यरत ''''नव नालंदा महाविहार'''' एक इंस्टीट्यूशनल पार्टनर के तौर पर जुड़ा है। इस पहल का मुख्य उद्देश्य नालंदा की प्राचीन संवाद परंपरा को पुनर्जीवित करना है। भविष्य के विजन में युवाओं के प्रतिनिधित्व को बढ़ावा देने के साथ-साथ दर्शन और साहित्य का आज की आवश्यकता तकनीक और विज्ञान के साथ संवाद स्थापित करना शामिल है।