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शोपियां में स्कूल को क्षतिग्रस्त करने के मामले में प्राथमिकी रद्द करने से इंकार
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श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय ने दक्षिण कश्मीर के शोपियां जिले में वर्ष 2016 में उपद्रव के दौरान भीड़ की ओर से प्राथमिक स्कूल चटावतन की इमारत को क्षतिग्रस्त करने के संबंध में दर्ज प्राथमिकी को रद्द करने से इंकार कर दिया है।
न्यायमूर्ति संजय धर की पीठ ने कहा, यह एक स्थापित कानून है कि किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक मुकदमा तभी रद्द किया जा सकता है जब प्राथमिकी में दर्ज तथ्यों और मामले की जांच के दौरान एकत्र किए गए सबूतों में कोई तालमेल न हो। इस टिप्पणी के साथ ही शब्बीर अहमद मल्ला की याचिका को अदालत ने खारिज कर दिया। याचिकाकार्त ने दावा किया था कि उक्त मामले में उसे अनावश्यक रूप से आरोपी बनाया गया। इसके साथ ही अदालत ने पुलिस को मामले की जांच तेजी से पूरा करने के भी निर्देश दिए ताकि दोषियों को पकड़ा जा सके और वर्षों से लंबित मामले में निर्दोष व्यक्तियों को इसमें अनावश्यक रूप से घसीटा न जाए। याचिकाकर्ता शब्बीर अहमद ने दलील दी थी कि उनका नाम प्राथमिकी में नहीं है और न ही वह कथित अपराधों में शामिल है। पुलिस ने उन्हें द्वेष के कारण कुछ मनगढ़ंत जानकारी के आधार पर झूठा फंसाया है। शब्बीर की दलील थी कि पुलिस ने इस मामले में एक अन्य प्राथमिकी दर्ज की थी जिसमें अन्य लोगों के साथ उसके खिलाफ आरोप पत्र दायर किया गया था, लेकिन शोपियां के प्रधान सत्र न्यायाधीश 28 दिसंबर 2019 को उसे खारिज कर दिया था।
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प्राथमिकी के कारण नहीं मिल रहा वेतन
शब्बीर ने कोर्ट में कहा कि उसे अग्निशमन एवं आपातकालीन सेवा विभाग में फायरमैन के पद पर नियुक्त किया गया है, लेकिन प्राथमिकी लंबित होने के कारण वेतन जारी नहीं किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि जांच एजेंसी ने मामले की ठीक से जांच नहीं की है और यदि ऐसा किया जाता है, तो उसे सभी आरोपों से मुक्त किया जाएगा।
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न्यायमूर्ति संजय धर की पीठ ने कहा, यह एक स्थापित कानून है कि किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक मुकदमा तभी रद्द किया जा सकता है जब प्राथमिकी में दर्ज तथ्यों और मामले की जांच के दौरान एकत्र किए गए सबूतों में कोई तालमेल न हो। इस टिप्पणी के साथ ही शब्बीर अहमद मल्ला की याचिका को अदालत ने खारिज कर दिया। याचिकाकार्त ने दावा किया था कि उक्त मामले में उसे अनावश्यक रूप से आरोपी बनाया गया। इसके साथ ही अदालत ने पुलिस को मामले की जांच तेजी से पूरा करने के भी निर्देश दिए ताकि दोषियों को पकड़ा जा सके और वर्षों से लंबित मामले में निर्दोष व्यक्तियों को इसमें अनावश्यक रूप से घसीटा न जाए। याचिकाकर्ता शब्बीर अहमद ने दलील दी थी कि उनका नाम प्राथमिकी में नहीं है और न ही वह कथित अपराधों में शामिल है। पुलिस ने उन्हें द्वेष के कारण कुछ मनगढ़ंत जानकारी के आधार पर झूठा फंसाया है। शब्बीर की दलील थी कि पुलिस ने इस मामले में एक अन्य प्राथमिकी दर्ज की थी जिसमें अन्य लोगों के साथ उसके खिलाफ आरोप पत्र दायर किया गया था, लेकिन शोपियां के प्रधान सत्र न्यायाधीश 28 दिसंबर 2019 को उसे खारिज कर दिया था।
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प्राथमिकी के कारण नहीं मिल रहा वेतन
शब्बीर ने कोर्ट में कहा कि उसे अग्निशमन एवं आपातकालीन सेवा विभाग में फायरमैन के पद पर नियुक्त किया गया है, लेकिन प्राथमिकी लंबित होने के कारण वेतन जारी नहीं किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि जांच एजेंसी ने मामले की ठीक से जांच नहीं की है और यदि ऐसा किया जाता है, तो उसे सभी आरोपों से मुक्त किया जाएगा।
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