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डीआरडीओ के पास तैयार है ड्रोन हमले की काट
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श्रीनगर। जम्मू एयरबेस पर दोहरे ड्रोन हमले जैसी चुनौती से निपटने के लिए रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) के पास पहले से तकनीक मौजूद है। डीआरडीओ ने इस तकनीक को पिछले 18 माह के दौरान तैयार किया है। जल्द ही इस तकनीक को सुरक्षा ग्रिड के उपकरणों का हिस्सा बनाया जाएगा।
एक अधिकारी ने बताया कि यह इलेक्ट्रो ऑप्टिकल इंफ्रारेड सेंसर तकनीक है। यह तकनीक चार किलोमीटर की दूरी से ही छोटे ड्रोन का भी पता लगा सकती है। काउंटर ड्रोन सॉल्यूशन के तहत इस तकनीक का वायुसेना के हिंडन स्टेशन और एनएसजी मानेसर में प्रदर्शन किया जा चुका है। अधिकारी के अनुसार काउंटर ड्रोन सॉल्यूशन में एक रडार शामिल है, जो 360 डिग्री में निगरानी करता है। चार किलोमीटर तक के दायरे में माइक्रो ड्रोन का पता लगाने में सक्षम रडार इलेक्ट्रो ऑप्टिकल इंफ्रारेड सेंसर के जरिए सटीक जानकारी देता है। 150 मीटर से एक किलोमीटर के दायरे में यह सिस्टम माइक्रो ड्रोन को हार्डकिल प्रणाली से ध्वस्त कर सकता है।
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वाहन और जमीन आधारित सेटअप
ड्रोन हमले को नाकाम करने के लिए डीआरडीओ ने वाहन और जमीन दोनों पर ही सेटअप तैयार किया है। इसके प्रोटोटाइप का मूल्यांकन करने के बाद प्रणाली को तैयार करने के लिए संबंधी एजेंसी को तकनीक सौंप दी गई है।
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एक अधिकारी ने बताया कि यह इलेक्ट्रो ऑप्टिकल इंफ्रारेड सेंसर तकनीक है। यह तकनीक चार किलोमीटर की दूरी से ही छोटे ड्रोन का भी पता लगा सकती है। काउंटर ड्रोन सॉल्यूशन के तहत इस तकनीक का वायुसेना के हिंडन स्टेशन और एनएसजी मानेसर में प्रदर्शन किया जा चुका है। अधिकारी के अनुसार काउंटर ड्रोन सॉल्यूशन में एक रडार शामिल है, जो 360 डिग्री में निगरानी करता है। चार किलोमीटर तक के दायरे में माइक्रो ड्रोन का पता लगाने में सक्षम रडार इलेक्ट्रो ऑप्टिकल इंफ्रारेड सेंसर के जरिए सटीक जानकारी देता है। 150 मीटर से एक किलोमीटर के दायरे में यह सिस्टम माइक्रो ड्रोन को हार्डकिल प्रणाली से ध्वस्त कर सकता है।
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वाहन और जमीन आधारित सेटअप
ड्रोन हमले को नाकाम करने के लिए डीआरडीओ ने वाहन और जमीन दोनों पर ही सेटअप तैयार किया है। इसके प्रोटोटाइप का मूल्यांकन करने के बाद प्रणाली को तैयार करने के लिए संबंधी एजेंसी को तकनीक सौंप दी गई है।
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