Leh-ladakh: लद्दाख में नई उम्मीद, चंबा एनिमल वेलफेयर सेंटर कर रहा 500 से अधिक लावारिस कुत्तों की देखभाल
लद्दाख के थिकसे में स्थित चंबा एनिमल वेलफेयर सेंटर 500 से अधिक लावारिस और घायल कुत्तों को आश्रय और इलाज दे रहा है, और पिछले दो वर्षों में करीब 1,200 पशुओं को रेस्क्यू कर चुका है।
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थिकसे गांव में स्थित चंबा एनिमल वेलफेयर सेंटर सैकड़ों लावारिस और घायल कुत्तों के लिए नई जिंदगी बनकर उभरा है। वर्तमान में यहां 500 से अधिक कुत्तों को आश्रय दिया गया है। यह शेल्टर लद्दाख में बढ़ते लावारिस पशु संकट से निपटने के लिए क्षेत्र के सबसे महत्वपूर्ण प्रयासों में से एक माना जा रहा है।
7 सितंबर 2024 को स्थापित इस केंद्र की शुरुआत लावारिस पशुओं को सुनियोजित और संवेदनशील देखभाल प्रदान करने के उद्देश्य से की गई थी। दो साल से भी कम समय में टीम ने करीब 1,200 पशुओं को रेस्क्यू किया है जिनमें अधिकांश बीमार या घायल कुत्ते हैं। सेंटर के संस्थापक एवं अध्यक्ष फुंसोग वांग्याल के अनुसार, इस पहल को संभव बनाने में थिकसे रिनपोछे का महत्वपूर्ण सहयोग रहा। उन्होंने शेल्टर के लिए 200 कनाल से अधिक भूमि उपलब्ध कराई।
वांग्याल ने कहा कि केवल शेल्टर उपलब्ध कराना स्थायी समाधान नहीं है। इस समस्या का समाधान सामूहिक जिम्मेदारी और करुणा के साथ ही संभव है। उन्होंने एनजीओ, सरकारी विभागों, स्थानीय समुदायों तथा वन्यजीव विभाग के बीच समन्वित प्रयासों की आवश्यकता पर जोर दिया। हालांकि चुनौतियां अभी भी बहुत हैं। रेस्क्यू किए गए पशुओं के इलाज के लिए अक्सर उन्हें निजी क्लीनिकों में ले जाना पड़ता है क्योंकि सरकारी सुविधाओं में कुत्तों की बीमारियों के लिए पर्याप्त दवाइयां उपलब्ध नहीं होतीं। शेल्टर के संचालन पर हर महीने लगभग चार लाख रुपये का खर्च आता है जो मुख्य रूप से स्वयंसेवकों के सहयोग से चल रहा है।
वांग्याल ने बताया कि सामाजिक बदलाव लावारिस कुत्तों की बढ़ती संख्या का प्रमुख कारण है। पहले लद्दाख में अधिकांश घरों में स्थानीय कुत्तों और अन्य पालतू पशुओं को अपनाया जाता था लेकिन अब कई लोग नस्लीय कुत्तों को प्राथमिकता देते हैं। यदि हर घर एक भी लावारिस कुत्ते को अपना ले तो समस्या काफी हद तक कम हो सकती है। सबसे प्रभावी समाधानों में उन्होंने नसबंदी अभियान को बताया। संगठन ने लद्दाख प्रशासन को एक प्रस्ताव सौंपा है जिसमें विशेष सरकारी फंडिंग के साथ दो वर्षों तक नसबंदी अभियान चलाने की सिफारिश की गई है।
सेना और अर्धसैनिक बलों के सहयोग को भी महत्वपूर्ण बताया गया है, क्योंकि कई लावारिस कुत्ते सैन्य क्षेत्रों में पाए जाते हैं। इसके अलावा, वांग्याल ने वन्यजीव-संवेदनशील इलाकों से आक्रामक कुत्तों को शेल्टर में स्थानांतरित करने के लिए वन्यजीव विभाग से फंड आवंटित करने की अपील की।
उन्होंने कहा कि एक अन्य गंभीर समस्या कुत्तों का अवैध विस्थापन है जिसमें लोग उन्हें अनजान क्षेत्रों में छोड़ देते हैं। इससे स्थानीय कुत्तों के हमले होते हैं और कई मामलों में उनकी मौत भी हो जाती है। वांग्याल ने पशु क्रूरता कानूनों के सख्त पालन और भारी जुर्माने की मांग की। बीमारियों का प्रकोप भी एक बड़ी चुनौती है। हाल ही में जंस्कार में कैनाइन डिस्टेंपर के मामलों में कई कुत्तों की मौत हुई जिसका मुख्य कारण पर्याप्त सुविधाओं का अभाव था। वांग्याल के अनुसार, टीकाकरण ही इसका सबसे प्रभावी बचाव है। चंबा एनिमल वेलफेयर सेंटर ने अपने सभी कुत्तों का टीकाकरण सुनिश्चित किया है और संक्रमित पशुओं के रेस्क्यू व इलाज का कार्य जारी रखा है।
भविष्य की योजना के तहत संगठन ने लद्दाख के हर गांव या ब्लॉक में पशु शेल्टर स्थापित करने का प्रस्ताव रखा है जिन्हें स्थानीय जनप्रतिनिधियों के नेतृत्व में संचालित किया जाए ताकि समस्या का दीर्घकालिक समाधान हो सके। वांग्याल ने कहा, लद्दाख के लोग अपनी करुणा के लिए दुनिया भर में जाने जाते हैं। यदि हम सभी सहानुभूति के साथ मिलकर काम करें तो इंसान और पशु दोनों शांतिपूर्ण सहअस्तित्व में रह सकते हैं।
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