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Kashmir: लश्कर और जैश का काल सेना के खोजी कुत्ते, कैमरे से लैस, विस्फोटक खोजने मे सक्षम

Mon, 19 Sep 2022 10:19 AM IST
kumar गुलशन कुमार अमृतपाल सिंह बाली, श्रीनगर
अमृतपाल सिंह बाली, श्रीनगर Published by: kumar गुलशन कुमार Updated Mon, 19 Sep 2022 10:19 AM IST
सार

आतंकवादी विरोधी ऑपरेशन के दौरान यूनिट के कुत्तों को सबसे पहले आतंकी ठिकाने का पता लगाने के लिए भेजा जाता है। यह कुत्ते छिपे आतंकवादियों की संख्या, हथियार और गोला-बारूद का पता लगाने के लिए ठिकानों में चुपचाप पहुंचते हैं।

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Army sniffer dogs equipped with cameras capable of finding explosives counter terrorism operations
Army Sniffer Dogs (File) - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद निरोधी अभियानों में जहां ड्रोन और पीटीजेड कैमरा व अन्य उच्च तकनीक वाले उपकरणों का इस्तेमाल हो रहा है, वहीं सेना के खोजी कुत्ते (डॉग स्क्वायड टीम) लश्कर और जैश के सफाए में अहम भूमिका निभा रही है। आतंकियों को उनके आखिरी अंजाम तक पहुंचा रहे हैं। ये कुत्ते आतंकी ठिकाने का पता लगाने से लेकर विस्फोटक को खोजने में भी सक्षम हैं। अभियान के दौरान इन खोजी कुत्तों को गोप्रो कैमरों से लैस किया जाता और उन्हें वॉकी टॉकी से कमांड दी जाती है।

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आतंकवादी विरोधी ऑपरेशन के दौरान यूनिट के कुत्तों को सबसे पहले आतंकी ठिकाने का पता लगाने के लिए भेजा जाता है। यह कुत्ते छिपे आतंकवादियों की संख्या, हथियार और गोला-बारूद का पता लगाने के लिए ठिकानों में चुपचाप पहुंचते हैं। इन पर लगे कैमरों की निगरानी एक नियंत्रण कक्ष के माध्यम से की जाती है जहां आतंकी ठिकाने की सब हरकत पता चलती है। इन कुत्तों को आतंकी ठिकाने में प्रवेश के लिए इस तरह प्रशिक्षित किया जाता है कि आतंकी इन्हें देख न सकें।
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डॉग स्क्वायड इंचार्ज लेफ्टिनेंट कर्नल अभय खोखर ने कहा कि कैमरे से लैस कुत्ते का ज्यादातर इस्तेमाल हमले और कई अन्य ऑपरेशनों के लिए किया जाता है। आम तौर पर इंसानों के लिए जहां पहुंचना मुश्किल होता है वहां कुत्तों को कैमरे से लैस कर भेजते हैं, ताकि सुरक्षा बलों की उस जगह तक पहुंच बने। अगर इन कुत्तों को छिपे हुए आतंकी देख लेते हैं तो ये उन पर हमला कर देते हैं। इसके लिए भी इन कुत्तों को प्रशिक्षित किया जाता है। ये कुत्ते सेना के साथ-साथ शहर के आबादी वाले क्षेत्रों में लोगों की सेवा भी कर रहे हैं। वे बड़े पैमाने पर खोजी कुत्ते आरओपी (रोड ओपनिंग पार्टी) के समय विस्फोटक की पहचान के लिए उपयोग में लाए जाते हैं। वे सक्रिय रूप से ऑपरेशन में फर्स्ट रिस्पांडर होते हैं।
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सेना के पास इन नस्लों के कुत्ते  

सेना के पास पूरे भारत में विभिन्न नस्ल के कुत्ते हैं, इनमें लैब्राडोर, जर्मन शेफर्ड, बेल्जियम मेलिनोइस और ग्रेट माउंटेन स्विस डॉग शामिल हैं। भारतीय नस्लों में मुधोल हाउंड भी हिस्सा हैं। सेना के कुत्तों की 8 प्रमुख विशेषताएं हैं। इनका इस्तेमाल विस्फोटक की पहचान, विस्फोटक का पता लगाने, ट्रैकिंग और बचाव कार्यों, हिमस्खलन बचाव मिशन और कई अन्य कार्यों के लिए किया जाता है।

एक साल से अधिक होता है प्रशिक्षण

सेना के कुत्तों को प्रशिक्षित करने के लिए एक हैंडलर रहता है। इनका मुख्य प्रशिक्षण मेरठ में स्थित रिमाउंट और वेटरनरी कॉर्प्स सेंटर और स्कूल में होता है। इनको ट्रेनिंग सेंटर में 9 माह से अधिक और बाद में आउटडोर में तीन महीने तक प्रशिक्षण दिया जाता है।

विशेष बहादुरी पुरस्कार से सम्मानित

सेना के पास कुत्तों की बहादुरी के लिए विशेष पुरस्कार हैं। इनमें चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ कमेंडेशन कार्ड, वाइस चीफ ऑफ स्टाफ कमेंडेशन कार्ड और जीओसी इन चीफ कमेंडेशन कार्ड शामिल हैं। सेना ने हाल ही में जम्मू और कश्मीर में एक ऑपरेशन में एक्सेल नामक एक कुत्ते को खो दिया था। स्वतंत्रता दिवस पर सरकार ने दो वर्षीय एक्सेल को वीरता पुरस्कार से नवाजा था।  


सेना में 27 से अधिक हैं डॉग यूनिट

भारतीय सेना की देशभर में 27 से अधिक डॉग यूनिट हैं। लगभग 24 कुत्ते एक इकाई का हिस्सा हैं। कुछ कुत्ते आरवीसी केंद्र में पैदा होते हैं और कुछ बाहर से लाए जाते हैं। सेना सबसे अच्छे का चयन करती है और कई मापदंडों पर जांच के बाद प्रशिक्षित करती है।

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