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23 साल पहले सेना की दरियादिली से हमारे परिवार हंस खेल रहे
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मानसबल (गांदरबल)। भारतीय सेना की दरियादिली के चलते मध्य कश्मीर के कई गावों के 23 लोग आज अपना एक खुशहाल जीवन बिता रहे हैं। उनका कहना है कि 23 साल पहले अगर सेना हम पर गोलियां बरसाती तो आज शायद हम जिंदा न होते और ना ही हमारे खुशहाल परिवार होते। वह आज भी सेना का धन्यवाद करते हैं। वहीं उस ऑपरेशन को लीड कर रहे सेना अधिकारी के अनुसार उन्हें अपने उस समय के फैसले पर गर्व महसूस हो रहा है, अगर उस समय गोली चल जाती तो शायद आज उनमें से आज यहां कोई जिंदा नहीं होता। यह शायद उनकी खुशकिस्मती थी।
उन 23 युवकों में से एक उस समय 15 वर्षीय रहे मुजफ्फर ने बताया कि कुछ बन्दे ऐसे होते हैं जो पाकिस्तान के इशारे पर काम करते हैं। उन्होंने कहा कि हमारा भी उस समय दिल चाहता था हम भी जाएं और जिहाद करें क्योंकि हमें उसी तरीके से ब्रेन वाश किया गया था। जब हम वहां आखरी गांव तुलेल तक पहुंचे, हम दो दिन से भूखे प्यासे थे। मुजफ्फर ने कहा कि उस समय हमें यह ख्याल आया कि हम अपनी आराम भरी जिंदगी छोड़कर जा रहे हैं। अभी यह सब देखने को मिल रहा है तो पाकिस्तान जाकर इससे बदतर हो सकता है। इसलिए हमने उनके चंगुल से भागने का फैसला लिया। आज हम सबके करीब 100 से अधिक पारिवारिक सदस्य हैं और सब खुशहाल जिंदगी जी रहे हैं। मुजफ्फर ने जहा कि वो यह संदेश देना चाहते हैं कि युवा गलत रास्ते पर न निकलें, बन्दूक से कोई मसला हल नहीं होता है। अब वह एम-कॉम बीएड हैं।
वहीं एक अन्य शौकत अहमद भट ने कहा कि मैं स्कूल के लिए निकला था घर से अपने एक कजन के साथ। बांदीपोरा के जंगलों में करीब 16 दिनों तक पैदल सफर किया। भूखे प्यासे टूट चुके थे। आखिर में तुलेल पहुंचने पर जो गाइड लोग थे उनसे लड़ने के बाद भाग निकले। वहां फौज ने हमें बचा लिया और परिवार वालों के हवाले कर दिया।
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सेना के तत्कालीन कैप्टेन, ब्रिगेडियर जेएस बुधवार ने बताया कि सबसे पहले यह कहूंगा यह 23 नंबर बहुत लकी नंबर है। 23 अगस्त 1998 में यह बात हुई थी, 23 बच्चे थे। आज 23 साल बाद हम वापस उन परिवारों को 23 अगस्त को ही मिल रहे हैं। हम एलओसी पर हमेशा ऑपरेशन करते रहते हैं और पाकिस्तान शुरू से ही यहां आतंकवाद फैलाता आया है। इन बच्चों को बहला फुसलाकर यहां से एलईटी और हिज्ब के आतंकी पाकिस्तान ले जा रहे थे। पाकिस्तानी आतंकी होने की जानकारी मिलने पर आतंकियों को मारने के लिए निकल पड़े। जवान फायर खोलने वाले थे, किस्मत से मुझे छोटा सा बच्चा वहां पेड़ों में घूमता दिखाई दिया। मैंने जवानों को आदेश दिया कि कोई फायर नहीं खोलेगा। जैसे हम बच्चे के पास गए तो उसकी हालत बहुत खराब थी, उसे पानी पिलाया और बात करनी शुरू की। उसने बताया कि उन्हें कश्मीर से उठाके पाकिस्तान ले जा रहे हैं। इस ऑपरेशन में पूरा एक अलग नजरिया देखने को मिला। इलाके को घेर कर धीरे-धीरे सभी बच्चों को जमा किया। खाना खिलाया। इसके बाद सभी को परिवारों के हवाले किया।
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उन 23 युवकों में से एक उस समय 15 वर्षीय रहे मुजफ्फर ने बताया कि कुछ बन्दे ऐसे होते हैं जो पाकिस्तान के इशारे पर काम करते हैं। उन्होंने कहा कि हमारा भी उस समय दिल चाहता था हम भी जाएं और जिहाद करें क्योंकि हमें उसी तरीके से ब्रेन वाश किया गया था। जब हम वहां आखरी गांव तुलेल तक पहुंचे, हम दो दिन से भूखे प्यासे थे। मुजफ्फर ने कहा कि उस समय हमें यह ख्याल आया कि हम अपनी आराम भरी जिंदगी छोड़कर जा रहे हैं। अभी यह सब देखने को मिल रहा है तो पाकिस्तान जाकर इससे बदतर हो सकता है। इसलिए हमने उनके चंगुल से भागने का फैसला लिया। आज हम सबके करीब 100 से अधिक पारिवारिक सदस्य हैं और सब खुशहाल जिंदगी जी रहे हैं। मुजफ्फर ने जहा कि वो यह संदेश देना चाहते हैं कि युवा गलत रास्ते पर न निकलें, बन्दूक से कोई मसला हल नहीं होता है। अब वह एम-कॉम बीएड हैं।
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वहीं एक अन्य शौकत अहमद भट ने कहा कि मैं स्कूल के लिए निकला था घर से अपने एक कजन के साथ। बांदीपोरा के जंगलों में करीब 16 दिनों तक पैदल सफर किया। भूखे प्यासे टूट चुके थे। आखिर में तुलेल पहुंचने पर जो गाइड लोग थे उनसे लड़ने के बाद भाग निकले। वहां फौज ने हमें बचा लिया और परिवार वालों के हवाले कर दिया।
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सेना के तत्कालीन कैप्टेन, ब्रिगेडियर जेएस बुधवार ने बताया कि सबसे पहले यह कहूंगा यह 23 नंबर बहुत लकी नंबर है। 23 अगस्त 1998 में यह बात हुई थी, 23 बच्चे थे। आज 23 साल बाद हम वापस उन परिवारों को 23 अगस्त को ही मिल रहे हैं। हम एलओसी पर हमेशा ऑपरेशन करते रहते हैं और पाकिस्तान शुरू से ही यहां आतंकवाद फैलाता आया है। इन बच्चों को बहला फुसलाकर यहां से एलईटी और हिज्ब के आतंकी पाकिस्तान ले जा रहे थे। पाकिस्तानी आतंकी होने की जानकारी मिलने पर आतंकियों को मारने के लिए निकल पड़े। जवान फायर खोलने वाले थे, किस्मत से मुझे छोटा सा बच्चा वहां पेड़ों में घूमता दिखाई दिया। मैंने जवानों को आदेश दिया कि कोई फायर नहीं खोलेगा। जैसे हम बच्चे के पास गए तो उसकी हालत बहुत खराब थी, उसे पानी पिलाया और बात करनी शुरू की। उसने बताया कि उन्हें कश्मीर से उठाके पाकिस्तान ले जा रहे हैं। इस ऑपरेशन में पूरा एक अलग नजरिया देखने को मिला। इलाके को घेर कर धीरे-धीरे सभी बच्चों को जमा किया। खाना खिलाया। इसके बाद सभी को परिवारों के हवाले किया।