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तरफ तजवाल में किराये के एक कमरे में चल रहा स्कूल
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कठुआ। शहर से सटे तरफ तजवाल क्षेत्र में सरकारी एमपी स्कूल ऐसा स्कूल है जो शिक्षा विभाग द्वारा ढांचागत सुविधाओं को बेहतर करने की योजनाओं का आइना दिखाता है। खानाबदोश समुदाय के लिए शुरू हुए मोबाइल स्कूलों में से एक यह स्कूल भी था, लेकिन 1994 में इन स्कूलों को स्थायी कर दिया गया। लेकिन इसके बाद शिक्षा विभाग इसकी सुध लेना भूल गया। दिक्कत यह भी है कि स्कूल का एकमात्र कमरा भी किराए पर है। जिसका मालिक न तो दीवार पर कील ठोकने की इजाजत देता है और न ही इमारत को ठीक करने की। इमारत का किराया कोरोना से पहले विद्यार्थी जुटाकर देते थे और कोरोना के दौरान स्कूल के मास्टर ने किराया चुकाया है।
यूं तो यह स्कूल पहली से पांचवीं कक्षा तक है, लेकिन विद्यार्थी 24 हैं, दो शिक्षक ही पांच कक्षाओं को पढ़ाते हैं। ऐसे में पहली से पांचवीं तक की कक्षाएं एक साथ और एक ही जगह खुले में लगती हैं। विद्यार्थी बस यही दुआ करते हैं कि बारिश न हो, नहीं तो एक ही कमरे में बैठने को उन्हें विवश होना पड़ता है। खास बात यह है कि मिड-डे मील भी इन बच्चों के लिए खुले में बनता है। बारिश हुई तो वो भी उसे कमरे में तैयार किया जाता है।
स्कूल के मास्टर खादिम हुसैन ने बताया कि कठुआ जोन के अधीन आते सरकारी मोबाइल प्राइमरी स्कूल तरफ तजवाल के लिए जमीन कहीं नहीं मिली। ऐसे में इमारत नहीं बन पाई। अक्टूबर 2020 में अभिभावकों और कमेटी ने शिक्षा विभाग के निदेशालय तक तक एक प्रस्ताव दिया है कि नजदीकी स्कूल के साथ इसे विलय किया जाए। 21 फरवरी 2021 में निदेशालय की ओर से दोबारा प्रस्ताव मंगवाया गया लेकिन अभी तक कुछ भी समाधान नहीं किया गया है।
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बताया कि एक कमरे का किराया छह सौ रुपये है, जो कोरोना से पहले विद्यार्थियों द्वारा चुकाया जाता था और अब शिक्षक चुका रहे हैं। दस बाई दस के कमरे में मुश्किल से कक्षाएं लगाई जाती हैं। मकान मालिक भी स्कूल की इमारत में सुधार करने की इजाजत नहीं देते हैं।
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अधिकारी बोले, स्कूल को मर्ज
करने के लिए फाइल भेजी है
जोनल शिक्षा अधिकारी कठुआ ने बताया कि खानाबदोश परिवारों के लिए ये मोबाइल स्कूल थे। कोरोना महामारी के चलते पिछले दो साल से स्कूल बंद रहे हैं। सरकारी मोबाइल स्कूल तरफ तजवाल के संबंध में फाइल बनाकर भेजी गई है कि नजदीकी स्कूल के साथ इसे मर्ज किया जाए, लेकिन अभी कोई आदेश नहीं आया है। आदेश मिलते ही इसे क्लब कर दिया जाएगा। निदेशालय की ओर से आदेश दिया गया है कि किराए पर चलने वाले स्कूलों का किराया नहीं दिया जाएगा।
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18 स्कूल हुए स्टेशनरी
गुज्जर समुदाय के लिए विशेष रूप से बनाए गए मोबाइल प्राइमरी स्कूलों के अस्तित्व पर लगे ग्रहण के कारण इस समुदाय के लोगों की शिक्षा भी बुरी तरह से प्रभावित हुई है। आतंकवाद की दस्तक के बाद जिले के 18 मोबाइल प्राइमरी स्कूल को स्टेशनरी बना दिया गया। इन स्कूलों के मूवमेंट बंद होने के कारण इस समुदाय के अधिकतर बच्चे शिक्षा से वंचित रह जाते हैं। हालांकि समुदाय का पेशा नहीं बदला है और उन्हें पहले की ही तरह वर्तमान में भी खानाबदोशों का जीवन व्यतीत कर साल में दो बार पहाड़ों से आने और जाने का सिलसिला जारी रखना पड़ रहा है। लेकिन स्कूलों को स्टेशनरी किए जाने से इस समुदाय के बच्चों के अशिक्षित रह जाने की संभावनाएं बढ़नी शुरू हो गई हैं। एक समय पर कठुआ के एमपीएस तरफ सांजी, एमपीएस कुमरी, लखनपुर से बठिंडी, दन्ना-धनोड़, बरनोटी से फलोट, बस्ती नंगल, जोध जुथाना, बाख्ता, मढ़ीन से खानपुर, बिलावर से सारंगला, वैली, धराल्ता, मल्हार से कुपवाड़ा, सरिया, थमाल, महानपुर से नंड, भड्डू से गौड़, बिजानी मोबाइल प्राइमरी स्कूल स्टेशनरी हो चुके हैं। आतंकवाद के चरम पर होने के दौरान समुदाय की असुरक्षा को ध्यान में रखते हुए तत्कालीन राज्यपाल ने एक बैठक में इन स्कूलों को स्टेशनरी करने के निर्देश जारी किए थे। वर्तमान में समुदाय ने एक बार फिर मौसम के अनुरूप पलायन शुुरू कर दिया है। साल के दस महीने तक वे खानाबदोश का जीवन अपने मवेशियों के साथ ही व्यतीत करते हैं।
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यूं तो यह स्कूल पहली से पांचवीं कक्षा तक है, लेकिन विद्यार्थी 24 हैं, दो शिक्षक ही पांच कक्षाओं को पढ़ाते हैं। ऐसे में पहली से पांचवीं तक की कक्षाएं एक साथ और एक ही जगह खुले में लगती हैं। विद्यार्थी बस यही दुआ करते हैं कि बारिश न हो, नहीं तो एक ही कमरे में बैठने को उन्हें विवश होना पड़ता है। खास बात यह है कि मिड-डे मील भी इन बच्चों के लिए खुले में बनता है। बारिश हुई तो वो भी उसे कमरे में तैयार किया जाता है।
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स्कूल के मास्टर खादिम हुसैन ने बताया कि कठुआ जोन के अधीन आते सरकारी मोबाइल प्राइमरी स्कूल तरफ तजवाल के लिए जमीन कहीं नहीं मिली। ऐसे में इमारत नहीं बन पाई। अक्टूबर 2020 में अभिभावकों और कमेटी ने शिक्षा विभाग के निदेशालय तक तक एक प्रस्ताव दिया है कि नजदीकी स्कूल के साथ इसे विलय किया जाए। 21 फरवरी 2021 में निदेशालय की ओर से दोबारा प्रस्ताव मंगवाया गया लेकिन अभी तक कुछ भी समाधान नहीं किया गया है।
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बताया कि एक कमरे का किराया छह सौ रुपये है, जो कोरोना से पहले विद्यार्थियों द्वारा चुकाया जाता था और अब शिक्षक चुका रहे हैं। दस बाई दस के कमरे में मुश्किल से कक्षाएं लगाई जाती हैं। मकान मालिक भी स्कूल की इमारत में सुधार करने की इजाजत नहीं देते हैं।
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अधिकारी बोले, स्कूल को मर्ज
करने के लिए फाइल भेजी है
जोनल शिक्षा अधिकारी कठुआ ने बताया कि खानाबदोश परिवारों के लिए ये मोबाइल स्कूल थे। कोरोना महामारी के चलते पिछले दो साल से स्कूल बंद रहे हैं। सरकारी मोबाइल स्कूल तरफ तजवाल के संबंध में फाइल बनाकर भेजी गई है कि नजदीकी स्कूल के साथ इसे मर्ज किया जाए, लेकिन अभी कोई आदेश नहीं आया है। आदेश मिलते ही इसे क्लब कर दिया जाएगा। निदेशालय की ओर से आदेश दिया गया है कि किराए पर चलने वाले स्कूलों का किराया नहीं दिया जाएगा।
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18 स्कूल हुए स्टेशनरी
गुज्जर समुदाय के लिए विशेष रूप से बनाए गए मोबाइल प्राइमरी स्कूलों के अस्तित्व पर लगे ग्रहण के कारण इस समुदाय के लोगों की शिक्षा भी बुरी तरह से प्रभावित हुई है। आतंकवाद की दस्तक के बाद जिले के 18 मोबाइल प्राइमरी स्कूल को स्टेशनरी बना दिया गया। इन स्कूलों के मूवमेंट बंद होने के कारण इस समुदाय के अधिकतर बच्चे शिक्षा से वंचित रह जाते हैं। हालांकि समुदाय का पेशा नहीं बदला है और उन्हें पहले की ही तरह वर्तमान में भी खानाबदोशों का जीवन व्यतीत कर साल में दो बार पहाड़ों से आने और जाने का सिलसिला जारी रखना पड़ रहा है। लेकिन स्कूलों को स्टेशनरी किए जाने से इस समुदाय के बच्चों के अशिक्षित रह जाने की संभावनाएं बढ़नी शुरू हो गई हैं। एक समय पर कठुआ के एमपीएस तरफ सांजी, एमपीएस कुमरी, लखनपुर से बठिंडी, दन्ना-धनोड़, बरनोटी से फलोट, बस्ती नंगल, जोध जुथाना, बाख्ता, मढ़ीन से खानपुर, बिलावर से सारंगला, वैली, धराल्ता, मल्हार से कुपवाड़ा, सरिया, थमाल, महानपुर से नंड, भड्डू से गौड़, बिजानी मोबाइल प्राइमरी स्कूल स्टेशनरी हो चुके हैं। आतंकवाद के चरम पर होने के दौरान समुदाय की असुरक्षा को ध्यान में रखते हुए तत्कालीन राज्यपाल ने एक बैठक में इन स्कूलों को स्टेशनरी करने के निर्देश जारी किए थे। वर्तमान में समुदाय ने एक बार फिर मौसम के अनुरूप पलायन शुुरू कर दिया है। साल के दस महीने तक वे खानाबदोश का जीवन अपने मवेशियों के साथ ही व्यतीत करते हैं।