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धर्म के अनुसरण से ही प्राप्त होगी शांति
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हीरानगर के गांव देबोचक में श्रीमद भगवत कथा के दौरान प्रवचन करते संत सुभाष शास्त्री। संवाद
- फोटो : KATHUA
हीरानगर। गांव देवा चक में श्रीमद् भागवत कथा ज्ञान यज्ञ का आयोजन जारी है। शुक्रवार को कथा के दूसरे दिन भारी ठंड के बावजूद भारी संख्या में पहुंचे भक्तों ने कथावाचक सुभाष शास्त्री द्वारा किए जा रहे प्रवचनों का श्रवण किया। इस मौके कथावाचक शास्त्री ने उपस्थित श्रद्धालुओं को शांति की प्राप्ति के लिए धर्म का अनुसरण करने की शिक्षा दी। उन्होंने कहा कि यदि हम धर्म वर्ग का अनुसरण करते हुए रहेंगे। तो हमारे आसपास का वातावरण शांति में हो जाएगा। समाज में जब सत्य स्थापित होता है तो शांति और आनंद संहिष्णुता, प्रेम, समरसता, बंधुत्व, न्याय, समानता आदि गुण स्वयं बढ़ने लगते हैं।
शास्त्री जी ने कहा कि अध्यात्म के लिए सेवा समर्पण और शुद्ध आचरण अनिवार्य है। अध्यात्म के माध्यम से ही परमार्थ का मार्ग प्रशस्त होता है। इससे स्वयं का नहीं बल्कि दूसरों का दुख दर्द समझने की भावना जागृत होती है। अध्यात्म व प्रक्रिया है जो हमें संतुष्ट करती है और बाहरी तथा आंतरिक कर्म करने के लिए प्रेरित करती है।
उन्होंने कहा कि जब हम आग में हाथ डालते हैं तो हाथ जल जाता है। यहां हमारे कर्म की सजा अगले जन्म में नहीं बल्कि तत्काल मिलती है। अगर कोई जहर खाता है तो हमें अगले जन्म में नहीं बल्कि इसी जन्म में मरना पड़ता है। जब एक व्यक्ति बेईमानी से मकान बनाता है तो जिस तरह उसका मकान ऊंचा होता जाता है उसी अनुपात में उसकी आत्मा नीचे होती जाती है अर्थात दीनता उसे पकड़ती जाती है। इसी तरह जब हम दया करते हैं किसी भूखे को खाना खिलाते हैं तो तत्काल फल के रूप में हमारे प्राण सुगंध से भर जाते हैं।
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शास्त्री जी ने कहा कि अगर हम कर्म में ही फल को देख सके तो हम बुरे आदमी से सबक ले सकते हैं। तब उसका कोई कितना भी बड़ा मकान हो हम उसे के धोखे में नहीं आएंगे जब हम बुरे आदमी के अंतर में झांक कर उसकी विपन्नता को देख सकेंगे। इसी तरह भले आदमी की जिंदगी भी बड़ा सबक हो सकती है। बस उसे उधेड़ना पड़ेगा। लेकिन किसी की जिंदगी को उधेड़ने के बजाय हम अपनी जिंदगी को बेहतर बनाएं। इससे हमें आंतरिक शांति मिलेगी। जो हमारे शुभकर्म के द्वारा ही संभव हो सकती है। लिहाजा हमें संतो द्वारा दिखाए गए रास्ते पर चलकर अपने कर्मों को करना होगा। जिससे हमें सुख और शांति की प्राप्ति होगी।
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शास्त्री जी ने कहा कि अध्यात्म के लिए सेवा समर्पण और शुद्ध आचरण अनिवार्य है। अध्यात्म के माध्यम से ही परमार्थ का मार्ग प्रशस्त होता है। इससे स्वयं का नहीं बल्कि दूसरों का दुख दर्द समझने की भावना जागृत होती है। अध्यात्म व प्रक्रिया है जो हमें संतुष्ट करती है और बाहरी तथा आंतरिक कर्म करने के लिए प्रेरित करती है।
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उन्होंने कहा कि जब हम आग में हाथ डालते हैं तो हाथ जल जाता है। यहां हमारे कर्म की सजा अगले जन्म में नहीं बल्कि तत्काल मिलती है। अगर कोई जहर खाता है तो हमें अगले जन्म में नहीं बल्कि इसी जन्म में मरना पड़ता है। जब एक व्यक्ति बेईमानी से मकान बनाता है तो जिस तरह उसका मकान ऊंचा होता जाता है उसी अनुपात में उसकी आत्मा नीचे होती जाती है अर्थात दीनता उसे पकड़ती जाती है। इसी तरह जब हम दया करते हैं किसी भूखे को खाना खिलाते हैं तो तत्काल फल के रूप में हमारे प्राण सुगंध से भर जाते हैं।
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शास्त्री जी ने कहा कि अगर हम कर्म में ही फल को देख सके तो हम बुरे आदमी से सबक ले सकते हैं। तब उसका कोई कितना भी बड़ा मकान हो हम उसे के धोखे में नहीं आएंगे जब हम बुरे आदमी के अंतर में झांक कर उसकी विपन्नता को देख सकेंगे। इसी तरह भले आदमी की जिंदगी भी बड़ा सबक हो सकती है। बस उसे उधेड़ना पड़ेगा। लेकिन किसी की जिंदगी को उधेड़ने के बजाय हम अपनी जिंदगी को बेहतर बनाएं। इससे हमें आंतरिक शांति मिलेगी। जो हमारे शुभकर्म के द्वारा ही संभव हो सकती है। लिहाजा हमें संतो द्वारा दिखाए गए रास्ते पर चलकर अपने कर्मों को करना होगा। जिससे हमें सुख और शांति की प्राप्ति होगी।

प्रवचन का श्रवण करते श्रद्धालु। संवाद- फोटो : KATHUA