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Hindi News ›   Jammu and Kashmir ›   Kathua News ›   Nomadic families from the Gujjar-Bakarwal community have begun their seasonal migration from the uplands to the plains.

Kathua News: ऊपरी इलाकों से गुज्जर-बकरवाल समुदाय के खानाबदोश परिवारों का मैदानों की ओर मौसमी पलायन शुरू

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Nomadic families from the Gujjar-Bakarwal community have begun their seasonal migration from the uplands to the plains.
सरथल में खुले आसमान तले अपने परिवार के लिए रोटी तैयार करतीं गुज्जर परिवार की महिलाएं, यह महिलाए
कठुआ। जिले के ऊपरी इलाकों से इन दिनों गुज्जर-बकरवाल समुदाय के खानाबदोश परिवारों का मैदानों की ओर मौसमी पलायन शुरू हो गया है। यह सिलसिला हर साल सितंबर-अक्तूबर में देखा जाता है। जब पहाड़ी क्षेत्रों में ठंड बढ़ने लगती है और पशुधन के लिए चारा की उपलब्धता कम हो जाती है। लेकिन इस पारंपरिक यात्रा के पीछे एक गहरी सामाजिक और मानवीय कहानी भी छिपी है जिसमें महिलाओं का जीवन ज्यादा चुनौतियों से भरा है।
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इन महिलाओं की सुबह सूरज से पहले शुरू होती है। खुले आसमान के नीचे, बिना पक्की छत के तंबुओं में रहकर वे बच्चों को संभालती हैं, पशुओं को चराने ले जाती हैं, खाना पकाती हैं और रास्ते की हर चुनौती से जूझती हैं। उनके चेहरे पर थकान की लकीरें होती हैं, लेकिन आंखों में उम्मीद की चमक भी। वे जानती हैं कि यह जीवन आसान नहीं है, फिर भी वे मुस्कुराती हैं क्योंकि उनके लिए यह मुस्कान ही हौसला है।
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गुज्जर-बकरवाल समुदाय की महिलाएं न केवल घर की देखभाल करती हैं, बल्कि पशुओं की निगरानी, बच्चों की परवरिश और खान-पान की व्यवस्था भी उनके ही कंधों पर होती है। खुले आसमान के नीचे, अस्थायी तंबुओं में रहकर, ये महिलाएं हर मौसम की मार सहती हैं। रास्ते में बीमारियों, सुरक्षा की कमी और बुनियादी सुविधाओं का अभाव उनके जीवन को और कठिन बना देता है। पलायन के कारण बच्चों की शिक्षा नियमित नहीं रह पाती। खासकर लड़कियों को स्कूल छोड़ना पड़ता है या वे कभी स्कूल तक पहुंच ही नहीं पातीं। स्वास्थ्य सेवाओं की अनुपलब्धता के कारण प्रसव, टीकाकरण और अन्य जरूरी देखभाल भी प्रभावित होती है। महिलाओं को अक्सर पारंपरिक उपचारों पर निर्भर रहना पड़ता है।
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हालांकि सरकार द्वारा कई योजनाएं चलाई जा रही हैं, लेकिन खानाबदोश जीवनशैली के कारण इन परिवारों तक उनका लाभ पहुंचना मुश्किल होता है। आधार कार्ड, राशन कार्ड, स्वास्थ्य बीमा जैसी सुविधाएं अक्सर इनके पास नहीं होतीं, जिससे वे सामाजिक सुरक्षा से वंचित रह जाते हैं। इन तमाम चुनौतियों के बावजूद गुज्जर-बकरवाल महिलाएं अपनी संस्कृति, परंपराओं और आत्मसम्मान को जीवित रखे हुए हैं। लोकगीत, पारंपरिक वेशभूषा और पशुपालन की कला में उनकी गहरी भागीदारी है। वे न केवल अपने समुदाय की रीढ़ हैं, बल्कि पहाड़ी जीवन की पहचान भी।

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