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मां ने बेटे की प्रतिमा पर बांधा रक्षा सूत्र
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शहीद कैप्टन सुनील चौधरी की मां शहीद की प्रतिमा को रक्षा सूत्र बांधते हुए। संवाद
- फोटो : KATHUA
कठुआ। कठुआ की धरती के सपूत ने देश के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी। देश के लिए वह एक शहीद है, लेकिन मां के सीने में धड़कता दिल आज भी अपने बेटे को उसी तरह से याद करता है, जैसा 14 वर्ष पहले किया करता था।
वीरवार को कैप्टन सुनील चौधरी चौक पर स्थित शहीदी स्मारक पर दृश्य देखकर हर किसी की आंखें भर आई। दरअसल, शहीद कैप्टन सुनील की मां अपने बेटे की प्रतिमा को रक्षा बंधन पर साफ सुथरा कर त्यौहार मनाने में जुटी थी। अंबेडकर पुल के नजदीक बनाए गए शहीदी स्मारक पर मां अपने बेटे की प्रतिमा को इस तरह साफ करती नजर आई जैसे वह अपने आंचल में छिपाए लाडले को दुलार रही हो। शहीद कैप्टन सुनील चौधरी की प्रतिमा और स्थल को रक्षाबंधन के मौके पर उनकी मां सत्या चौधरी ने पहुंचकर जहां बड़े ही चाव से साफ किया वहीं, अपने बेटे की कलाई को रक्षा सूत्र से सजाया। अपनी मां को लौटने का वादा कर गए कैप्टन सुनील चौधरी उस दिन के बाद फिर कभी नहीं लौटे, लेकिन उन हजारों युवाओं को प्रेरणा दे गए जो देश के लिए कुछ कर दिखाने का जज्बा रखते हैं। मरणोपरांत कीर्ति चक्र सम्मानित शहीद कैप्टन सुनील चौधरी को 22 जून को उनके जन्मदिवस और 27 जनवरी को उनके शहीदी दिवस पर याद किया जाता है। लेकिन परिवार के सदस्य हर त्यौहार को अपने बेटे के साथ मनाने के लिए प्रतिमा स्थल पर पहुंचते हैं। वह शहीद जोगिंदर नगर कठुआ के रहने वाले थे।
शहीद के पिता कर्नल प्यारा लाल चौधरी युवाओं को जहां देश के प्रति उनके दायित्व निभाने के लिए प्रेरित करते रहे हैं वहीं सेवानिवृत्त सैनिकों के लिए भी संस्था चला रहे हैं। उन्होंने बताया कि शहीद सुनील के आखिरी शब्द थे कि डैड, क्या मैंने आपको गौरवान्वित किया है? कर्नल प्यारा लाल ने कहा कि उन्हें गर्व है कि उनके बेटे ने न सिर्फ उन्हें गौरवान्वित किया, बल्कि पूरे देश के सामने मिसाल कायम की। शहीद के पिता के काफी जद्दोजहद कर एक स्मारक से उस वीर का नाम अमर कर दिया।
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उल्फा आतंकियों से लोहा लेते शहीद हुए थे कैप्टन सुनील चौधरी
कैप्टन सुनील 27 जनवरी 2008 को असम के तिनसुकिया में उल्फा उग्रवादियों के विरुद्ध छेड़े गए आपरेशन में अपनी टीम के साथ गए थे। एक दिन पहले ही उन्हें 26 जनवरी को सेना मेडल से नवाजा गया था। उग्रवादियों से मुकाबला करते हुए वह घायल हो गए, लेकिन शहीद होने से पहले उन्होंने तीन उग्रवादियों को मौत के घाट उतार दिया। अपने शौर्य का प्रदर्शन करते हुए शहीद हुए कैप्टन सुनील चौधरी को मरणोपरांत कीर्ति चक्र से सम्मानित किया गया।
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वीरवार को कैप्टन सुनील चौधरी चौक पर स्थित शहीदी स्मारक पर दृश्य देखकर हर किसी की आंखें भर आई। दरअसल, शहीद कैप्टन सुनील की मां अपने बेटे की प्रतिमा को रक्षा बंधन पर साफ सुथरा कर त्यौहार मनाने में जुटी थी। अंबेडकर पुल के नजदीक बनाए गए शहीदी स्मारक पर मां अपने बेटे की प्रतिमा को इस तरह साफ करती नजर आई जैसे वह अपने आंचल में छिपाए लाडले को दुलार रही हो। शहीद कैप्टन सुनील चौधरी की प्रतिमा और स्थल को रक्षाबंधन के मौके पर उनकी मां सत्या चौधरी ने पहुंचकर जहां बड़े ही चाव से साफ किया वहीं, अपने बेटे की कलाई को रक्षा सूत्र से सजाया। अपनी मां को लौटने का वादा कर गए कैप्टन सुनील चौधरी उस दिन के बाद फिर कभी नहीं लौटे, लेकिन उन हजारों युवाओं को प्रेरणा दे गए जो देश के लिए कुछ कर दिखाने का जज्बा रखते हैं। मरणोपरांत कीर्ति चक्र सम्मानित शहीद कैप्टन सुनील चौधरी को 22 जून को उनके जन्मदिवस और 27 जनवरी को उनके शहीदी दिवस पर याद किया जाता है। लेकिन परिवार के सदस्य हर त्यौहार को अपने बेटे के साथ मनाने के लिए प्रतिमा स्थल पर पहुंचते हैं। वह शहीद जोगिंदर नगर कठुआ के रहने वाले थे।
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शहीद के पिता कर्नल प्यारा लाल चौधरी युवाओं को जहां देश के प्रति उनके दायित्व निभाने के लिए प्रेरित करते रहे हैं वहीं सेवानिवृत्त सैनिकों के लिए भी संस्था चला रहे हैं। उन्होंने बताया कि शहीद सुनील के आखिरी शब्द थे कि डैड, क्या मैंने आपको गौरवान्वित किया है? कर्नल प्यारा लाल ने कहा कि उन्हें गर्व है कि उनके बेटे ने न सिर्फ उन्हें गौरवान्वित किया, बल्कि पूरे देश के सामने मिसाल कायम की। शहीद के पिता के काफी जद्दोजहद कर एक स्मारक से उस वीर का नाम अमर कर दिया।
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उल्फा आतंकियों से लोहा लेते शहीद हुए थे कैप्टन सुनील चौधरी
कैप्टन सुनील 27 जनवरी 2008 को असम के तिनसुकिया में उल्फा उग्रवादियों के विरुद्ध छेड़े गए आपरेशन में अपनी टीम के साथ गए थे। एक दिन पहले ही उन्हें 26 जनवरी को सेना मेडल से नवाजा गया था। उग्रवादियों से मुकाबला करते हुए वह घायल हो गए, लेकिन शहीद होने से पहले उन्होंने तीन उग्रवादियों को मौत के घाट उतार दिया। अपने शौर्य का प्रदर्शन करते हुए शहीद हुए कैप्टन सुनील चौधरी को मरणोपरांत कीर्ति चक्र से सम्मानित किया गया।