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Kathua News: जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश की सरहद पर गूंजे चामुंडा मां के जयघोष
Wed, 17 Sep 2025 02:44 AM IST
जम्मू और कश्मीर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कठुआ
संवाद न्यूज एजेंसी, कठुआ
Updated Wed, 17 Sep 2025 02:44 AM IST
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गढ़ मेले में उमड़े भक्त
गढ़ माता मेले में उमड़ा भक्तों का सैलाब
कठुआ/बनी। जम्मू-कश्मीर और हिमाचल की सरहद पर माता चंडी का प्राचीन मंदिर स्थित है। बनी और हिमाचल के चंबा की सीमा पर इस मंदिर में दो दिवसीय वार्षिक गढ़ मेले का आयोजन किया गया। गढ़ मेला दोनों राज्यों की संस्कृति के अनूठे मिलन का प्रतीक है। गढ़ माता के नाम से प्रसिद्ध इस ऐतिहासिक मंदिर में हर साल हिमाचल और पंजाब से लगभग 30 हजार श्रद्धालु पहुंचे। इस दौरान पूरा इलाका मां चामुंडा के जयघोष से गूंज उठा।
पौराणिक मान्यताओं और इतिहास का गवाह यह मंदिर इसलिए भी खास है, क्योंकि इस मंदिर का आधा हिस्सा, जम्मू-कश्मीर में और आधा हिमाचल प्रदेश में पड़ता है। मंदिर की देखरेख के लिए बाकायदा दोनों ओर से कमेटियां काम करती हैं। हर साल यहां लगने वाला गढ़ माता मेला देखने और मंदिर में माथा टेकने के लिए दूरदराज से लोग पहुंचते हैं। जम्मू-कश्मीर की बनी तहसील में भंडार से लगभग तीन घंटे की पैदल दूरी पर माता गढ़ का प्राचीन मंदिर है। स्थानीय लोग बताते हैं कि पूर्व काल में चंबा और भद्रवाह के राजा साल में एक बार यहां मंदिर में माथा टेकने जरूर पहुंचते थे। मंगलवार को मंदिर परिसर में बड़ा मेला आयोजित हुआ जहां खानपान की वस्तुओं के साथ ही लोगों ने सर्दियों से पहले कपड़ों और अन्य सामान की भी जमकर खरीदारी की।
मेले में सांस्कृतिक कार्यक्रमों के तहत चुराह नाटी नृत्य, भजन संकीर्तन, रस्साकशी और मटका फोड़ प्रतियोगिता आयोजित की गईं। इस अवसर पर रणबीर सिंह समिति के सदस्य ने भी कार्यक्रम में भाग लेकर श्रद्धालुओं को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि गढ़ माता जातर मेला धार्मिक आस्था के साथ-साथ हिमाचल और जम्मू-कश्मीर की जनता के बीच सांस्कृतिक एकता का प्रतीक भी है। पीढ़ियों से चली आ रही यह परंपरा हर वर्ष फसल सीजन की शुरुआत का प्रतीक रही है। इससे पहले रातभर मंदिर में जागरण हुआ जबकि सुबह यज्ञ का आयोजन किया गया। बनी के विधायक डॉ. रामेश्वर सिंह ने भी मंदिर में पहुंचकर महामाई का आशीर्वाद लिया।
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आपसी भाईचारे और एकता का है प्रतीक
आपसी भाईचारे और एकता का प्रतीक माने जाने वाले गढ़ माता मंदिर में एक ओर जम्मू-कश्मीर के बनी से सटे इलाकों के साथ-साथ भद्रवाह, बसोहली और कठुआ से लोग पहुंचते हैं। दूसरी ओर हिमाचल में बनीखेत, डलहौजी, चंबा और पंजाब के पठानकोट से भी श्रद्धालु माथा टेकने के लिए आते हैं। स्थानीय लोगों की मानें तो यह मंदिर दोनों राज्यों को एक दूसरे की संस्कृतियों से जोड़ने का बेमिसाल काम करता है। प्रकृति की गोद में बसे गढ़ माता मंदिर में हर साल पहुंचने वाले हजारों श्रद्धालुओं की मान्यता है कि यहां मांगी गई सभी मुराद पूरी होती है।
दोनों राज्यों की कमेटियां करती हैं आयोजन
मां चामुंडा के दर पर आयोजित मेले में हाजिरी देने के लिए हिमाचल के चंबा जिला और जम्मू-कश्मीर के कठुआ जिले से लोग कई-कई घंटे का पैदल सफर तय कर पहुंचे। मंगलवार मंदिर में सुबह से ही भक्तों का तांता लगना शुरू हो गया। दोपहर होने तक मंदिर प्रांगण में पहुंचे भक्तों की संख्या 30 हजार के लगभग पहुंच गई। उधर, दोनों राज्यों की ओर से मेले का आयोजन करने वाली कमेटी ने भी भक्तों के लिए इंतजाम किए थे। दूरदराज के इलाकों से पैदल चलकर आए भक्तों के लिए लंगर की भी व्यवस्था की गई। माता के दरबार पर पहुंचे भक्त नाचते गाते हुए पारंपरिक ढोल और बांसुरी की ताल पर पहुंचे। मंदिर प्रांगण में दर्शनों को पहुंचे भक्तों ने गद्दी कुड नृत्य कर परंपरा को निभाया।
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कठुआ/बनी। जम्मू-कश्मीर और हिमाचल की सरहद पर माता चंडी का प्राचीन मंदिर स्थित है। बनी और हिमाचल के चंबा की सीमा पर इस मंदिर में दो दिवसीय वार्षिक गढ़ मेले का आयोजन किया गया। गढ़ मेला दोनों राज्यों की संस्कृति के अनूठे मिलन का प्रतीक है। गढ़ माता के नाम से प्रसिद्ध इस ऐतिहासिक मंदिर में हर साल हिमाचल और पंजाब से लगभग 30 हजार श्रद्धालु पहुंचे। इस दौरान पूरा इलाका मां चामुंडा के जयघोष से गूंज उठा।
पौराणिक मान्यताओं और इतिहास का गवाह यह मंदिर इसलिए भी खास है, क्योंकि इस मंदिर का आधा हिस्सा, जम्मू-कश्मीर में और आधा हिमाचल प्रदेश में पड़ता है। मंदिर की देखरेख के लिए बाकायदा दोनों ओर से कमेटियां काम करती हैं। हर साल यहां लगने वाला गढ़ माता मेला देखने और मंदिर में माथा टेकने के लिए दूरदराज से लोग पहुंचते हैं। जम्मू-कश्मीर की बनी तहसील में भंडार से लगभग तीन घंटे की पैदल दूरी पर माता गढ़ का प्राचीन मंदिर है। स्थानीय लोग बताते हैं कि पूर्व काल में चंबा और भद्रवाह के राजा साल में एक बार यहां मंदिर में माथा टेकने जरूर पहुंचते थे। मंगलवार को मंदिर परिसर में बड़ा मेला आयोजित हुआ जहां खानपान की वस्तुओं के साथ ही लोगों ने सर्दियों से पहले कपड़ों और अन्य सामान की भी जमकर खरीदारी की।
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मेले में सांस्कृतिक कार्यक्रमों के तहत चुराह नाटी नृत्य, भजन संकीर्तन, रस्साकशी और मटका फोड़ प्रतियोगिता आयोजित की गईं। इस अवसर पर रणबीर सिंह समिति के सदस्य ने भी कार्यक्रम में भाग लेकर श्रद्धालुओं को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि गढ़ माता जातर मेला धार्मिक आस्था के साथ-साथ हिमाचल और जम्मू-कश्मीर की जनता के बीच सांस्कृतिक एकता का प्रतीक भी है। पीढ़ियों से चली आ रही यह परंपरा हर वर्ष फसल सीजन की शुरुआत का प्रतीक रही है। इससे पहले रातभर मंदिर में जागरण हुआ जबकि सुबह यज्ञ का आयोजन किया गया। बनी के विधायक डॉ. रामेश्वर सिंह ने भी मंदिर में पहुंचकर महामाई का आशीर्वाद लिया।
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आपसी भाईचारे और एकता का है प्रतीक
आपसी भाईचारे और एकता का प्रतीक माने जाने वाले गढ़ माता मंदिर में एक ओर जम्मू-कश्मीर के बनी से सटे इलाकों के साथ-साथ भद्रवाह, बसोहली और कठुआ से लोग पहुंचते हैं। दूसरी ओर हिमाचल में बनीखेत, डलहौजी, चंबा और पंजाब के पठानकोट से भी श्रद्धालु माथा टेकने के लिए आते हैं। स्थानीय लोगों की मानें तो यह मंदिर दोनों राज्यों को एक दूसरे की संस्कृतियों से जोड़ने का बेमिसाल काम करता है। प्रकृति की गोद में बसे गढ़ माता मंदिर में हर साल पहुंचने वाले हजारों श्रद्धालुओं की मान्यता है कि यहां मांगी गई सभी मुराद पूरी होती है।
दोनों राज्यों की कमेटियां करती हैं आयोजन
मां चामुंडा के दर पर आयोजित मेले में हाजिरी देने के लिए हिमाचल के चंबा जिला और जम्मू-कश्मीर के कठुआ जिले से लोग कई-कई घंटे का पैदल सफर तय कर पहुंचे। मंगलवार मंदिर में सुबह से ही भक्तों का तांता लगना शुरू हो गया। दोपहर होने तक मंदिर प्रांगण में पहुंचे भक्तों की संख्या 30 हजार के लगभग पहुंच गई। उधर, दोनों राज्यों की ओर से मेले का आयोजन करने वाली कमेटी ने भी भक्तों के लिए इंतजाम किए थे। दूरदराज के इलाकों से पैदल चलकर आए भक्तों के लिए लंगर की भी व्यवस्था की गई। माता के दरबार पर पहुंचे भक्त नाचते गाते हुए पारंपरिक ढोल और बांसुरी की ताल पर पहुंचे। मंदिर प्रांगण में दर्शनों को पहुंचे भक्तों ने गद्दी कुड नृत्य कर परंपरा को निभाया।