कठुआ। बनी और भद्रवाह की सीमा पर दूर दराज पहाड़ों पर बसी मां चंडी नुकनाली वाली के दर्शन के लिए भक्तों का जोश सोमवार को देखते ही बना। भुलड़ी से माता के दर्शनों के लिए हजारों की तादाद में भक्तों का जत्था चंडी माता के जयघोष के साथ रवाना हुआ। बिलावर, बसोहली, बनी और डुग्गन के विभिन्न इलाकों में माता के भक्त रविवार शाम और सोमवार सुबह भुलड़ी गांव में पहुंचे। जहां से पारंपरिक वाद्य यंत्रों की तान के बीच यात्रा अनहोर के जंगलों की ओर चढ़ाई चढ़ती चली गई।
नुकनाली के लिए वार्षिक यात्रा रवाना हुई तो आसपास के पहाड़ भी जयकारों से गूंज उठे। विभिन्न इलाकों से पैदल चलकर चंडी माता के भक्त नुकनाली मंदिर में मंगलवार को पहुंचेंगे। डुग्गन से भद्रवाह की ओर रिहाइशी इलाकों से दूर बर्फ से लकदक पहाड़ों की दुर्गम यात्रा कई सदियों से जारी है। ढोल की थाप के बीच झूमते भक्तों ने बगलू में विश्राम के बाद अनहोर के जंगलों की ओर प्रस्थान किया। यहां भक्त रात बिताकर सुबह चोटी पर महामाई के मंदिर की ओर रवाना होंगे। बनी, बिलावर, बसोहली और डुग्गन के विभिन्न इलाकों से हजारों श्रद्धालु एक साथ हर साल नुकनाली के लिए रवाना होते हैं। प्रशासन की ओर से इंतजाम के अभाव में स्थानीय लोग यात्रा मार्ग पर कई जगह लंगर लगाते हैं। अनहोर, लंबी तलाई और नुकनाली में लंगर लगाया जाता है। श्रद्धालुओं का पहला पड़ाव अनहोर है, जहां स्थानीय लोगों के सहयोग से लंगर की व्यवस्था की जाती है। गर्मियों में खानाबदोशों के निवास स्थान अनहोर में महिलाओं और बच्चों के लिए स्थानीय लोगों के सहयोग से एक सराय बनाई गई है। वहीं, हजारों भक्त जंगल के घने पेड़ों की ओट में ही रात गुजारते हैं। भक्त रात को महामाई का गुणगान करते हैं। इसके बाद सुबह यह यात्रा नुकनाली के लिए रवाना होती है। नुकनाली में सभी यात्राओं का मिलन होता है और माता के दर्शन करने के बाद दोपहर बारह बजे से पहले सभी यात्राएं वापस रवाना हो जाती हैं। यात्रा मार्ग पर बर्फ के दर्रों और धुंध के दिलकश नजारों के बीच यात्रा यादगार हो जाती है।