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शिव नगरी शिवबाड़ी में भोले के जयघोष से श्रावण माह का आगाज
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संवाद न्यूज एजेंसी
गगरेट (ऊना)। हिमाचल के प्रवेश द्वार कहे जाने वाले गगरेट क्षेत्र में सोमभद्रा नदी के किनारे बसी शिव की नगरी शिवबाड़ी उत्तर भारत के प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों में से एक है। शनिवार को संक्रांति के साथ सावन माह का आरंभ हुआ।
मान्यता के अनुसार इस माह को भगवान शिव का माह भी कहा जाता है। सावन माह में शिव भक्त भगवान शिव का जलाभिषेक करने के साथ बेल पत्र अर्पित कर मनोकामना मांगते हैं। पिछले दो वर्ष कोरोना की काली छाया के चलते मंदिर या तो बंद रहे या शिव भक्त दूर से ही शिव पिंडी के दर्शन कर खुद को धन्य समझते रहे। लगभग दो वर्षों बाद सावन के महीने में भक्त शिवलिंग पर जलाभिषेक कर रहे हैं।
किंवदंती के अनुसार शिवबाड़ी में शिवलिंग पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य की बेटी ययाति ने स्थापित किया था। द्रोणाचार्य इस स्थान पर अपने गृहस्थ आश्रम के दौरान रहे हैं। प्राचीन मान्यता के अनुसार पांडव काल में गुरु द्रोण ने पांडवों को इस स्थान पर धनुर्विद्या भी सिखाई थी। लगभग पांच हजार वर्ग मीटर में फैला शिवबाड़ी का जंगल अपने आप मे ही कई रहस्य समेटे हुए है। लोग जंगल की लकड़ी को सिर्फ शव जलाने या फिर मंदिर में स्थित धूने में जलाने के लिए प्रयोग करते हैं। माना जाता है कि शिवबाड़ी के जंगल की लकड़ी को निजी प्रयोग में लाना शिव की नजरों में भारी अपराध है। इस आलौकिक मंदिर के तीन ओर श्मशान और उत्तर की तरफ पवित्र सोमभद्रा नदी बहती है।
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मंदिर के पुजारी अजय शर्मा ने बताया कि पिछले दो वर्ष सावन माह में शिव भक्तों को कोरोना के चलते परेशानी हुई थी। कहा कि इस बार बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने के उम्मीद है। वहीं, शिव भक्तों विकास, उदय, संजीव, तुषार, धैर्य, इंदरजीत, अभिषेक, अरविंद, राजेंद्र, अभिषेक के अनुसार सावन माह में शिव का जलाभिषेक करने से आत्म शांति मिलती है। इसके साथ ही शिवबाड़ी में श्रद्धालुओं की हर मनोकामना भी पूरी होती है।
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गगरेट (ऊना)। हिमाचल के प्रवेश द्वार कहे जाने वाले गगरेट क्षेत्र में सोमभद्रा नदी के किनारे बसी शिव की नगरी शिवबाड़ी उत्तर भारत के प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों में से एक है। शनिवार को संक्रांति के साथ सावन माह का आरंभ हुआ।
मान्यता के अनुसार इस माह को भगवान शिव का माह भी कहा जाता है। सावन माह में शिव भक्त भगवान शिव का जलाभिषेक करने के साथ बेल पत्र अर्पित कर मनोकामना मांगते हैं। पिछले दो वर्ष कोरोना की काली छाया के चलते मंदिर या तो बंद रहे या शिव भक्त दूर से ही शिव पिंडी के दर्शन कर खुद को धन्य समझते रहे। लगभग दो वर्षों बाद सावन के महीने में भक्त शिवलिंग पर जलाभिषेक कर रहे हैं।
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किंवदंती के अनुसार शिवबाड़ी में शिवलिंग पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य की बेटी ययाति ने स्थापित किया था। द्रोणाचार्य इस स्थान पर अपने गृहस्थ आश्रम के दौरान रहे हैं। प्राचीन मान्यता के अनुसार पांडव काल में गुरु द्रोण ने पांडवों को इस स्थान पर धनुर्विद्या भी सिखाई थी। लगभग पांच हजार वर्ग मीटर में फैला शिवबाड़ी का जंगल अपने आप मे ही कई रहस्य समेटे हुए है। लोग जंगल की लकड़ी को सिर्फ शव जलाने या फिर मंदिर में स्थित धूने में जलाने के लिए प्रयोग करते हैं। माना जाता है कि शिवबाड़ी के जंगल की लकड़ी को निजी प्रयोग में लाना शिव की नजरों में भारी अपराध है। इस आलौकिक मंदिर के तीन ओर श्मशान और उत्तर की तरफ पवित्र सोमभद्रा नदी बहती है।
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मंदिर के पुजारी अजय शर्मा ने बताया कि पिछले दो वर्ष सावन माह में शिव भक्तों को कोरोना के चलते परेशानी हुई थी। कहा कि इस बार बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने के उम्मीद है। वहीं, शिव भक्तों विकास, उदय, संजीव, तुषार, धैर्य, इंदरजीत, अभिषेक, अरविंद, राजेंद्र, अभिषेक के अनुसार सावन माह में शिव का जलाभिषेक करने से आत्म शांति मिलती है। इसके साथ ही शिवबाड़ी में श्रद्धालुओं की हर मनोकामना भी पूरी होती है।