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Una News: गीता ने कलीरे बना संवारी जिंदगी

Mon, 31 Aug 2026 11:17 AM IST
Shimla Bureau शिमला ब्यूरो
Updated Mon, 31 Aug 2026 11:17 AM IST
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Geeta transformed her life by making kaleeras
हाथों से तैयार किए गए कलीरों के साथ सलोई गांव की गीता। संवाद
ऊना। सीखने की लगन हो तो घर की चहारदीवारी भी हुनर की पाठशाला बन सकती है। उपमंडल अंब के सलोई गांव की गीता देवी पत्नी बाल कृष्ण ने कुछ ऐसा ही कर दिखाया है।
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उन्होंने यूट्यूब वीडियो देखकर हाथ से कलीरे तैयार करना सीखा और इसी हुनर को रोजगार का जरिया बना लिया। अब उनके बनाए कलीरे स्थानीय स्तर पर पसंद किए जा रहे हैं और लोग अपनी पसंद के डिजाइन के लिए उन्हें ऑर्डर भी दे रहे हैं।
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गीता ने बताया कि करीब चार साल पहले उन्होंने कलीरे बनाने का काम वीडियो देखकर सीखना शुरू किया था। शुरुआत में इसे केवल हुनर के तौर पर अपनाया, लेकिन जब तैयार किए गए कलीरों को लोगों की सराहना मिलने लगी तो उन्होंने इसे कमाई से जोड़ने का फैसला किया।
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इसी दौरान वह महालक्ष्मी स्वयं सहायता समूह से जुड़ीं। समूह की महिलाओं ने उनके काम को सराहा और प्रोत्साहित किया। शुरुआत में समूह के माध्यम से बिक्री हुई, जिसके बाद स्थानीय स्तर पर भी उनके काम की पहचान बनने लगी।
कलीरे तैयार करने के लिए गीता नारियल के गोले, मखाने, फुलियां, ऊन से तैयार पॉपकॉर्न, डोरी, गोटा और शनील के कपड़े का इस्तेमाल करती हैं। डिजाइन और काम की बारीकी के अनुसार एक जोड़ी तैयार करने में दो दिन से लेकर एक सप्ताह तक लग जाता है। वह दुल्हनों के लिए साधारण कलीरों के अलावा जयमाला के समय पहनाए जाने वाले विशेष कलीरे भी तैयार करती हैं।
डिजाइन के हिसाब से कीमत
गीता के अनुसार साधारण चार नारियल गोलों वाले कलीरे 300 से 500 रुपये और जयमाला वाले कलीरे 500 से 1000 रुपये तक में बिकते हैं। इनकी बिक्री पर उन्हें करीब 50 प्रतिशत मुनाफा होता है। शादी के सीजन में मांग बढ़ने के कारण वह प्रतिमाह करीब आठ हजार रुपये तक कमा लेती हैं। खास बात यह है कि उन्हें सीजन शुरू होने से पहले ही ऑर्डर मिलने लगते हैं।

गीता का कहना है कि घर से काम करने से वह अपनी सुविधा के अनुसार समय निकाल पाती हैं। उनका लक्ष्य भविष्य में कलीरों के साथ अन्य हस्तनिर्मित उत्पाद तैयार कर इस काम को और विस्तार देना है।
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