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...जीवन से शगुन चला गया, सवाय की रौनक चली गई

Mon, 29 Nov 2021 10:27 PM IST
Shimla	 Bureau शिमला ब्यूरो
Updated Mon, 29 Nov 2021 10:27 PM IST
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Poets comment on social issues and present predicaments in a literary conclave in Solan
सोलन के मिनी सचिवालय में आयोजित कवि सम्मेलन में मौजूद मुख्यतिथि। संवाद - फोटो : SOLAN
सोलन। ...जीवन से शगुन चला गया, सवाय की रौनक चली गई। कोरे-करारे नोटों को अकेला कर चवन्नी चली गई। बदलते समाज और रिश्तों की अहमियत बतातीं कवयित्री कौमुदी ढल्ल की इस कविता से सभागार में कुछ देर के लिए सन्नाटा पसरा, फिर तालियों की गड़गड़ाहट गूंज उठी।
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डीसी ऑफिस के सभागार में साहित्यिक संगम सोलन और हिमालय साहित्य संस्कृति एवं पर्यावरण मंच शिमला के संयुक्त तत्वावधान में साहित्यिक गोष्ठी का आयोजन किया गया।
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इस मौके पर निदेशक भाषा एवं संस्कृति विभाग डॉ. पंकज ललित ने बतौर मुख्यातिथि शिरकत की जबकि कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रोफेसर आचार्य केशव शर्मा ने की। लेखक व पूर्व आईएएस अधिकारी शरभ नेगी ने विशेष अतिथि के रूप में शिरकत की।
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इस मौके पर डीआरओ सोलन केशव राम, डॉ. शंकर वसिष्ठ और हिमालय साहित्य, संस्कृति एवं पर्यावरण मंच शिमला के अध्यक्ष एसआर हरनोट भी मौजूद रहे। पहले सत्र में चार कहानियों पर चर्चा की गई।
दूसरे सत्र में 40 से अधिक कवियों ने कविता पाठ किया। इसकी अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार जोगराज जोग ने की। अतुल कुमार ने बात ये तब की है मैया, जब गर्भ में तेरे रहती थी...तरन्नुम में बंधी कविता से समा बांधा। सुनीता शर्मा ने खबर सच्ची है, खबर पक्की है से मीडिया जगत में अवमूल्यन पर ध्यान आकर्षित किया।
सुरेश शुक्ला ने ये केहड़ा न्हेरा, ये केहड़ा प्रयाशा..पहाड़ी कविता पेश की। सीता राम ने आज फिर दिल की हलचल बदलती है। सेवानिवृत्त एसपी सतीश रत्न ने सोचा था कैसा होगा, हुआ कैसा ये मेरा घर गजल प्रस्तुत की।
मधु शर्मा कात्यायनी ने नए जमाने का प्रेम और सतीश चंद्र पाल ने तिब्बत के संघर्ष पर कविता पढ़ी। कुल राजीव पंत ने स्मार्ट जंगल शीर्षक से कविता पेश कर पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया। शशिभूषण पुरोहित ने स्वां के तट पर प्रवासी परिंदे का गीत से अवैध खनन से नदियों को हो रही क्षति का वर्णन किया।
राधा चौहान ने कोरोना काल को चित्रित करती मैं और मेरी तन्हाई कविता पढ़ी। रमेश डडवाल ने वो आज, आज भी है जबकि कांगड़ा से आईं वंदना राणा ने फूल्ला साहीं तू खिल्लया कर, रंगड़ा साहीं मत सच्या कर कविता पेश की। यशपाल कपूर ने तकनीक की अद्भुत माया कविता पेश की। सविता ठाकुर की बारी-बारी भेज, सबका सामान समेटती अम्मा...कविता से एक मां की व्यथा का वर्णन सुन सभागार में कइयों की आंखे नम हो गईं।
रोशन जसवाल विक्षिप्त ने फरमाया अजब कमाल करता है यार तू, सवाल दर सवाल करता है यार तू। मदन हिमाचली ने बघाटी कविता गरीबों रे खिंदड़ू बिकणे खे तैयार एत्थी, सिसकियां देखी तेरा जिऊ क्यों नी डोलदा पेश की।
गुलपाल वर्मा ने कवि जब भी कुछ कहता है, मीलों विचरे मन का सार उसके कथन में रहता है तथा सीताराम शर्मा सिद्धार्थ ने अच्छी सूरत पर अच्छा दिल भी हो कविता पढ़ी। संजीव अरोड़ा ने हर सुबह होती है खाली स्लेट सी.. और हेमंत्र अत्रि ने बघाटी गीत ओ दादुआ प्रस्तुत किया। रत्न चंद रत्नेश ने इत्मिनान से सो लेने दो सुबह देर तक छह दिनों के थके लोगों को कविता पेश की।

रमेश डढवाल ने कहा कि वक्त के साथ बदल गया, बिन बदला कुछ आज भी। कुलदीप गर्ग तरुण ने अगर हल चाहिए तो लडना पड़ेगा, कथा वांचना मेरा काम नहीं। डॉ. शंकर वासिष्ट की कविता के बोल थे धुआं धुआं अंदर और बाहर भी। डॉ. प्रेम लाल गौतम ने कविता के बारे में तरन्नुम में कुछ यूं कहा कविता अति कोमल...इसके अलावा केआर कश्यप, अशोक गौतम, सचपाल, रामपाल वर्मा, भारती कुठियाला, स्नेह नेगी, नरेश वियोग, दीप्ति सारस्वत, वंदना राणा समेत अन्य कवियों ने कविता पाठ किया।
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