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Sirmour News: विरासत संभाल 23 साल से हाथों से चरखियां बना रहे राजेश

Wed, 26 Aug 2026 11:01 PM IST
Shimla Bureau शिमला ब्यूरो
Updated Wed, 26 Aug 2026 11:01 PM IST
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Rajesh has been crafting *charkhis* (kite-flying reels) by hand for 23 years, carrying forward a family legacy.
नाहन में हाथों से लकड़ी की चरखियां बनाते राजेश कुमार। संवाद
रानीताल निवासी राजेश कुमार हर साल रक्षाबंधन पर तैयार करते हैं हाथ से बनी चरखियां
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पिता किशनचंद से विरासत में मिला काम, 23 वर्षों से जारी रखे हैं पुश्तैनी हुनर
लकड़ी, बांस और वायरिंग से चरखी बनाने में लगते हैं दो से ढाई घंटे
पहले रक्षाबंधन से दो माह पहले शुरू हो जाती थी पतंगबाजी, अब शौक कम

पंकज तन्हा

नाहन (सिरमौर)। रक्षाबंधन पर्व पर रियासतकाल से चली आ रही पतंगबाजी की परंपरा नाहन में आज भी जिंदा है। हालांकि पहले के मुकाबले पतंगबाजी का शौक काफी कम हुआ है, लेकिन शौकीन लोग रक्षाबंधन पर आज भी पतंग जरूर उड़ाते हैं। शहर में इस पुरानी परंपरा को जिंदा रखने में वार्ड नंबर आठ के रानीताल निवासी राजेश कुमार अहम भूमिका निभा रहे हैं।
राजेश कुमार 23 वर्षों से चरखियां बनाने का पुश्तैनी काम कर रहे हैं। उनसे पहले उनके पिता किशनचंद चरखियां बनाया करते थे। पिता के निधन के बाद राजेश ने पतंगबाजी के शौकीनों के लिए इस काम को जारी रखा। हालांकि अब इस व्यवसाय में पहले जैसी कमाई नहीं रही है। इसके बावजूद वह हर साल रक्षाबंधन के आसपास हाथों से चरखियां बनाते हैं, ताकि शहर की पुरानी परंपरा कायम रह सके।
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राजेश लकड़ी, बांस और वायरिंग का इस्तेमाल कर चरखियां तैयार करते हैं। उनका कहना है कि मजबूत और टिकाऊ चरखी तैयार करने के लिए वह गुणवत्ता का विशेष ध्यान रखते हैं। एक चरखी बनाने में करीब दो से ढाई घंटे का समय लगता है। बिक्री कम होने के बावजूद वह इस काम को आत्मसंतुष्टि के लिए जारी रखे हुए हैं।
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राजेश ने बताया कि पहले नाहन में रक्षाबंधन से करीब दो महीने पहले ही पतंगबाजी शुरू हो जाती थी। रोजाना सैकड़ों पतंगें उड़ाई जाती थीं और रक्षाबंधन के बाद भी कई दिनों तक यह सिलसिला जारी रहता था। शहर की शायद ही कोई छत ऐसी होती थी, जहां युवाओं की टोलियां पतंग उड़ाती नजर न आती हों। उन्होंने कहा कि इंटरनेट के दौर में पतंगबाजी का यह शौक धीरे-धीरे कम हो गया है। रक्षाबंधन को कुछ ही दिन शेष हैं, लेकिन शहर में पहले जैसी पतंगबाजी नजर नहीं आ रही। उन्होंने उम्मीद जताई कि रक्षाबंधन पर लोग कुछ समय मोबाइल और इंटरनेट से दूर होकर पतंगबाजी करेंगे और नाहन की इस पुरानी रिवायत को आगे बढ़ाएंगे।
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