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आधुनिक तकनीकों से हल होंगी पर्यावरणीय चुनौतियां : विशेषज्ञ
Fri, 06 Nov 2026 07:08 AM IST
शिमला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, सिरमौर
संवाद न्यूज एजेंसी, सिरमौर
Updated Fri, 06 Nov 2026 07:08 AM IST
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पांवटा साहिब कॉलेज में आयोजित कार्यशाला में उपस्थित विशेषज्ञ और अन्य। -स्रोत: आयोजक
पांवटा साहिब (सिरमौर)। श्री गुरु गोबिंद सिंह जी राजकीय महाविद्यालय पांवटा साहिब के भूगोल विभाग द्वारा आयोजित सप्ताहिक राष्ट्रीय बहुविषयक कार्यशाला संपन्न हो गई। सतत विकास के लिए भू-स्थानिक तकनीकें, भौगोलिक चिंतन एवं स्थानिक प्रतिरूपण विषय पर आयोजित कार्यशाला में विशेषज्ञों ने कहा कि आधुनिक तकनीकों और डिजिटल मैपिंग के प्रभावी उपयोग से वर्तमान दौर की पर्यावरणीय चुनौतियों का समाधान निकाला जा सकता है।
कार्यशाला में देश भर से करीब 260 विद्यार्थियों, शोधार्थियों और प्राध्यापकों ने ऑनलाइन एवं ऑफलाइन माध्यम से भाग लिया। तकनीकी सत्रों में विभिन्न राज्यों के भूगोलवेत्ताओं ने प्रतिभागियों के साथ आधुनिक शोध अनुभव साझा किए। विशेषज्ञों ने आधुनिक भू-स्थानिक तकनीकों, सतत विकास, जलागम प्रबंधन, पर्यावरणीय नियतिवाद और समकालीन भौगोलिक चिंतन पर विस्तार से व्याख्यान दिए। साथ ही जल स्रोतों के संरक्षण और प्राकृतिक आपदाओं की रोकथाम में भौगोलिक तकनीकों की उपयोगिता समझाई।
सत्रों में रोहड़ू के भू-सूचना विज्ञान विशेषज्ञ डॉ. अजय चांजटा, रेवेन्शॉ विश्वविद्यालय कटक के डॉ. मल्लिकार्जुन मिश्रा, राजकीय महाविद्यालय अर्की के डॉ. अमित शोष्टा और संगड़ाह कॉलेज के डॉ. धन देव शर्मा ने विचार रखे। इसके अलावा हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शिमला की डॉ. सीमा चौधरी, डॉ. नरेंद्र पंघाल, डॉ. अंजन डेका तथा हिप्पा शिमला के डॉ. ख्याल चंद ने तकनीकी प्रस्तुतियां दीं।
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समापन समारोह में वक्ताओं ने कहा कि वर्तमान दौर में भूगोल केवल भौतिक व मानवीय परिवेश के अध्ययन तक सीमित नहीं है। आधुनिक तकनीकों के समन्वय से सतत विकास, पर्यावरण संरक्षण और संसाधन प्रबंधन में इसका दायरा काफी बढ़ चुका है। कार्यशाला का सफल आयोजन संयोजक प्रो. विम्मी रानी, आयोजक सचिव लेफ्टिनेंट संदीप शर्मा और प्रो. कमलेश शर्मा के समन्वय से पूरा हुआ।
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कार्यशाला में देश भर से करीब 260 विद्यार्थियों, शोधार्थियों और प्राध्यापकों ने ऑनलाइन एवं ऑफलाइन माध्यम से भाग लिया। तकनीकी सत्रों में विभिन्न राज्यों के भूगोलवेत्ताओं ने प्रतिभागियों के साथ आधुनिक शोध अनुभव साझा किए। विशेषज्ञों ने आधुनिक भू-स्थानिक तकनीकों, सतत विकास, जलागम प्रबंधन, पर्यावरणीय नियतिवाद और समकालीन भौगोलिक चिंतन पर विस्तार से व्याख्यान दिए। साथ ही जल स्रोतों के संरक्षण और प्राकृतिक आपदाओं की रोकथाम में भौगोलिक तकनीकों की उपयोगिता समझाई।
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सत्रों में रोहड़ू के भू-सूचना विज्ञान विशेषज्ञ डॉ. अजय चांजटा, रेवेन्शॉ विश्वविद्यालय कटक के डॉ. मल्लिकार्जुन मिश्रा, राजकीय महाविद्यालय अर्की के डॉ. अमित शोष्टा और संगड़ाह कॉलेज के डॉ. धन देव शर्मा ने विचार रखे। इसके अलावा हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शिमला की डॉ. सीमा चौधरी, डॉ. नरेंद्र पंघाल, डॉ. अंजन डेका तथा हिप्पा शिमला के डॉ. ख्याल चंद ने तकनीकी प्रस्तुतियां दीं।
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समापन समारोह में वक्ताओं ने कहा कि वर्तमान दौर में भूगोल केवल भौतिक व मानवीय परिवेश के अध्ययन तक सीमित नहीं है। आधुनिक तकनीकों के समन्वय से सतत विकास, पर्यावरण संरक्षण और संसाधन प्रबंधन में इसका दायरा काफी बढ़ चुका है। कार्यशाला का सफल आयोजन संयोजक प्रो. विम्मी रानी, आयोजक सचिव लेफ्टिनेंट संदीप शर्मा और प्रो. कमलेश शर्मा के समन्वय से पूरा हुआ।