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कई दिनों से थे अस्वस्थ, पांवटा में ली अंतिम सांस
Updated Mon, 24 Sep 2018 10:29 PM IST
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118 वर्षीय पूर्णानंद महाराज धौलीढांग का देहांत
राजपुर (सिरमौर)। गुरु श्री पूर्णानंद महाराज1008 धौलीढांग का निधन हो गया है। पांवटा साहिब स्थित आश्रम में उन्होंने अंतिम सांस ली। वह कई दिन से अस्वस्थ चल रहे थे। एक सप्ताह से सांस लेने की समस्या थी, जिसके बाद उनको जीवन रक्षक प्रणाली पर रखा गया था। वह 118 साल के थे। पूर्णानंद महाराज करीब 50 साल से धौलीढांग आश्रम में तपस्यारत थे। उनका गिरिपार क्षेत्र में आध्यात्मिक प्रभाव रहा। बताया जाता है कि गुरु जी ने कम उम्र में अपना सांसारिक जीवन काल घेवा (चायल), आठ वर्ष पंजाब, दो वर्ष हरिद्वार, चार वर्ष बिजनौर के रहनपुर, चार-चार वर्ष नीलधारा शुक्रताल और सहारनपुर के फैजाबाद, कुछ दिन कपालमोचन, फिर सिरमौर के श्री रेणुका जी, सिंघपुरा, सहस्रधारा और अंतिम पड़ाव आंजभोज क्षेत्र की ऊंची चोटी धौलीढांग में बिताया। पांवटा साहिब, शिलाई, कफोटा, सहस्रधारा, गिनल, शिलाई, उत्तराखंड, हरिद्वार, हरियाणा, यूपी आदि में कई आश्रम हैं। उनके देहांत की खबर से उनके अनुयायियों में शोक की लहर दौड़ गई है।
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राजपुर (सिरमौर)। गुरु श्री पूर्णानंद महाराज1008 धौलीढांग का निधन हो गया है। पांवटा साहिब स्थित आश्रम में उन्होंने अंतिम सांस ली। वह कई दिन से अस्वस्थ चल रहे थे। एक सप्ताह से सांस लेने की समस्या थी, जिसके बाद उनको जीवन रक्षक प्रणाली पर रखा गया था। वह 118 साल के थे। पूर्णानंद महाराज करीब 50 साल से धौलीढांग आश्रम में तपस्यारत थे। उनका गिरिपार क्षेत्र में आध्यात्मिक प्रभाव रहा। बताया जाता है कि गुरु जी ने कम उम्र में अपना सांसारिक जीवन काल घेवा (चायल), आठ वर्ष पंजाब, दो वर्ष हरिद्वार, चार वर्ष बिजनौर के रहनपुर, चार-चार वर्ष नीलधारा शुक्रताल और सहारनपुर के फैजाबाद, कुछ दिन कपालमोचन, फिर सिरमौर के श्री रेणुका जी, सिंघपुरा, सहस्रधारा और अंतिम पड़ाव आंजभोज क्षेत्र की ऊंची चोटी धौलीढांग में बिताया। पांवटा साहिब, शिलाई, कफोटा, सहस्रधारा, गिनल, शिलाई, उत्तराखंड, हरिद्वार, हरियाणा, यूपी आदि में कई आश्रम हैं। उनके देहांत की खबर से उनके अनुयायियों में शोक की लहर दौड़ गई है।