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गोदामों में सड़ने लगा लहसुन, नहीं मिल रहे खरीदार
Updated Thu, 12 Jul 2018 10:19 PM IST
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संगड़ाह (सिरमौर)। दशकों तक अदरक ने किसानों की कमर तोड़ी। अदरक के अज्ञात बीमारी की चपेट में आने से किसानों ने लहसुन को एक विकल्प के तौर पर चुना। इसमें कामयाबी भी मिली। एक तरह से लहसुन अच्छी खासी आमदनी का जरिया भी बन गया। लेकिन, एकाएक मंदी के कारण अब लहसुन ने भी उत्पादकों का गणित बिगाड़ कर रख दिया है। करीब नौ माह में तैयार होने वाली इस फसल को इस बार खरीदार ही नहीं मिल पाए हैं। हजारों क्विंटल लहसुन को उत्पादकों ने स्टॉक कर दिया। हालत यह है कि गोदामों और घरों में स्टॉक करके रखा लहसुन सड़ने के कगार पर पहुंच गया है। इस बार किसानों को दोहरी मार झेलनी पड़ रही है। किसानों ने पांच से छह हजार प्रति क्विंटल के हिसाब से महंगे दामों पर बीज के लिए लहसुन खरीदा था। दिन-रात मेहनत करने के बावजूद मौजूदा समय में लहसुन को महज 1000 से 2500 रुपयेे प्रति क्विंटल बेचना पड़ रहा है। लिहाजा, किसान चिंतित हैं और परेशान भी।
क्या कहते हैं उत्पादक
संगड़ाह निवासी कमलदेव शर्मा ने बताया कि मौसम की बेरुखी से उत्पादन में आई भारी गिरवाट के बावजूद किसानों को भरोसा था कि कम उत्पाद होने से इस बार फसल के दामों में भारी उछाल आएगा। मगर किसानों के मंसूबे पर पानी फिर गया है। इस बार लहसुन के दामों में आई मंदी ने पिछले 20 वर्षों के रिकार्ड तोड़ दिए हैं।
भावण निवासी रणदीप और सुरेंद्र ने बताया कि किसानों ने खेतों से फसल तो निकाल दी है, लेकिन खरीदार नहीं मिल रहे हैं। पिछले वर्ष तक लहसुन को खरीदने के लिए तमिलनाडु और महाराष्ट्र के व्यापारी सीधे किसानों के खेतों में ही पहुंच रहे थे। स्थानीय व्यापारियों में भी फसल की खरीद को लेकर कड़ी स्पर्धा रहती थी। इसका किसानों को काफी फायदा होता था।
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सैनधार के बानाकोटी के संतराम शर्मा ने बताया कि इस बार न तो बाहरी राज्यों से कोई व्यापारी लहसुन की खरीदारी के लिए यहां पहुंचा है और न ही स्थानीय व्यापारी लहसुन की खरीदारी में दिलचस्पी दिखा रहे हैं। किसानों के सामने सबसे बड़ी समस्या यह है कि वे फसल को लंबे समय तक गोदामों में भी नहीं रख सकते। जैसे-जैसे समय बीतता जा रहा है, गोदामों में फसल खराब होने की संभावना बढ़ती जा रही है।
नौहराधार के कपिल शर्मा ने बताया कि पिछले वर्ष किसानों का लहसुन मंडियों में पांच से आठ हजार रुपये प्रति क्विंटल तक बिका था। इस बार मंडियों में लहसुन के दाम 800 से 2500 रुपये क्विंटल हैं जो किसान अपना माल मंडियों में बेच रहे हैं, उन्हें बीज खर्चा तो दूर, भाड़े के पैसे भी वसूल नहीं हो रहे हैं।
सुनील कुमार ने बताया कि लहसुन की फसल से किसानों का साल भर का खर्चा चलता है। किसान इस फसल के दम पर 6-7 महीने पहले से ही दुकानदारों से उधार लेना शुरू कर देते हैं। इस बार फसल न बिकने से किसान दुकानदारों का ऋण भी नहीं चुका पा रहे हैं।
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क्या कहते हैं उत्पादक
संगड़ाह निवासी कमलदेव शर्मा ने बताया कि मौसम की बेरुखी से उत्पादन में आई भारी गिरवाट के बावजूद किसानों को भरोसा था कि कम उत्पाद होने से इस बार फसल के दामों में भारी उछाल आएगा। मगर किसानों के मंसूबे पर पानी फिर गया है। इस बार लहसुन के दामों में आई मंदी ने पिछले 20 वर्षों के रिकार्ड तोड़ दिए हैं।
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भावण निवासी रणदीप और सुरेंद्र ने बताया कि किसानों ने खेतों से फसल तो निकाल दी है, लेकिन खरीदार नहीं मिल रहे हैं। पिछले वर्ष तक लहसुन को खरीदने के लिए तमिलनाडु और महाराष्ट्र के व्यापारी सीधे किसानों के खेतों में ही पहुंच रहे थे। स्थानीय व्यापारियों में भी फसल की खरीद को लेकर कड़ी स्पर्धा रहती थी। इसका किसानों को काफी फायदा होता था।
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सैनधार के बानाकोटी के संतराम शर्मा ने बताया कि इस बार न तो बाहरी राज्यों से कोई व्यापारी लहसुन की खरीदारी के लिए यहां पहुंचा है और न ही स्थानीय व्यापारी लहसुन की खरीदारी में दिलचस्पी दिखा रहे हैं। किसानों के सामने सबसे बड़ी समस्या यह है कि वे फसल को लंबे समय तक गोदामों में भी नहीं रख सकते। जैसे-जैसे समय बीतता जा रहा है, गोदामों में फसल खराब होने की संभावना बढ़ती जा रही है।
नौहराधार के कपिल शर्मा ने बताया कि पिछले वर्ष किसानों का लहसुन मंडियों में पांच से आठ हजार रुपये प्रति क्विंटल तक बिका था। इस बार मंडियों में लहसुन के दाम 800 से 2500 रुपये क्विंटल हैं जो किसान अपना माल मंडियों में बेच रहे हैं, उन्हें बीज खर्चा तो दूर, भाड़े के पैसे भी वसूल नहीं हो रहे हैं।
सुनील कुमार ने बताया कि लहसुन की फसल से किसानों का साल भर का खर्चा चलता है। किसान इस फसल के दम पर 6-7 महीने पहले से ही दुकानदारों से उधार लेना शुरू कर देते हैं। इस बार फसल न बिकने से किसान दुकानदारों का ऋण भी नहीं चुका पा रहे हैं।