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गेहूं को पीला रतुआ और करनाल बंट का खतरा
Updated Mon, 05 Feb 2018 10:27 PM IST
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गरुड़ के छटिया गांव में पावर टिलर से खेत जोतता एक कृषक।
- फोटो : amar ujala
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आदेश शर्मा
राजपुर (सिरमौर)।
सूखे की चपेट में आई गेहूं की फसल पर अब पीला रतुआ का खतरा मंडराने लगा है। लिहाजा, कृषि विभाग ने गेहूं को पीला रतुआ और करनाल बंट से बचाने के लिए प्रबंध कर लिए हैं। किसानों को इन बीमारियों की रोकथाम के लिए कृषि विभाग ने दवाइयों का आवंटन शुरू कर दिया है। वहीं, किसानों को इन बीमारियों की रोकथाम के प्रति जागरूक किया जा रहा है।
सिरमौर में इस साल सूखे की मार पड़ी है। सूखे की वजह से गेहूं की करीब 50 फीसदी फसल तबाह हो गई जिससे किसानों को करीब 20 करोड़ रुपये की चपत लग गई। सूखे के बाद अब फसल पीला रतुआ की चपेट में आने लगी है।
भगाणी, फूूलपुर, कोटड़ी, रामनगर, धौलाकुआं के समीप चांदपुर इलाके में गेहूं की फसल में पीला रतुआ और करनाल बंट के लक्षण दिख रहे हैं। किसानों के आग्रह पर कृषि विभाग की टीम ने खेतों का निरीक्षण कर किसानों को इस रोग की रोकथाम के उपाय बताए हैं। गौैरतलब है कि सिरमौर में इस साल लगभग 23 हजार हेक्टेयर में गेहूं की बिजाई की गई है। अकेले पांवटा क्षेत्र में लगभग 12 हजार हेक्टेयर में गेहूं बीजा गया है।
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कृषि अनुसंधान धौलाकुआं के वैज्ञानिक डॉ. सुखदेव सिंह पलयाल ने कहा कि पीला रतुआ एवं बंट रोग से छुटकारा पाने के लिए फरवरी महीने में दो छिड़काव करना आवश्यक है। कुछ गांवों में पीला रतुआ की शिकायत आई थी। वहां पर किसानों को इसकी रोकथाम के उपाय बताए गए हैं। विभिन्न केंद्रों में यह दवाई किसानों को मुफ्त दी जा रही है।
बॉक्स के लिए---
पीला रतुआ रोग के लक्षण
विशेषज्ञों के अनुसार पीला रतुआ रोग हल्दी के चूपण जैसा पीले रंग की धारियों के रूप में गेहूं की पत्तियों पर दिखाई देता है। ये धारियां मुख्यता पत्तियों पर ही पाई जाती है। रोग की व्यापक दशा में पत्तियों के आवरण, तनों एवं बालियों पर भी पीली धारियां देखी जा सकती है।
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पीला रतुआ रोग से बचाव के उपाय
कृषि वैज्ञानिकों की सलाह है कि फसल पर पीला रतुआ रोग के लक्षण दिखते की प्रोपीकोनाजोल घोल बना कर फसल पर छिड़काव करें। दूसरा छिड़काव 15-20 दिन के बाद करना जरूरी है। एक कनाल के लिए 30 मिली. दवा 30 लीटर पानी में या एक बीघे के लिए 60 मिली. दवा 60 लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करें। विशेषकर पेड़ों एवं छायादार स्थानों पर फसलों का अधिक ध्यान रखें।
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राजपुर (सिरमौर)।
सूखे की चपेट में आई गेहूं की फसल पर अब पीला रतुआ का खतरा मंडराने लगा है। लिहाजा, कृषि विभाग ने गेहूं को पीला रतुआ और करनाल बंट से बचाने के लिए प्रबंध कर लिए हैं। किसानों को इन बीमारियों की रोकथाम के लिए कृषि विभाग ने दवाइयों का आवंटन शुरू कर दिया है। वहीं, किसानों को इन बीमारियों की रोकथाम के प्रति जागरूक किया जा रहा है।
सिरमौर में इस साल सूखे की मार पड़ी है। सूखे की वजह से गेहूं की करीब 50 फीसदी फसल तबाह हो गई जिससे किसानों को करीब 20 करोड़ रुपये की चपत लग गई। सूखे के बाद अब फसल पीला रतुआ की चपेट में आने लगी है।
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भगाणी, फूूलपुर, कोटड़ी, रामनगर, धौलाकुआं के समीप चांदपुर इलाके में गेहूं की फसल में पीला रतुआ और करनाल बंट के लक्षण दिख रहे हैं। किसानों के आग्रह पर कृषि विभाग की टीम ने खेतों का निरीक्षण कर किसानों को इस रोग की रोकथाम के उपाय बताए हैं। गौैरतलब है कि सिरमौर में इस साल लगभग 23 हजार हेक्टेयर में गेहूं की बिजाई की गई है। अकेले पांवटा क्षेत्र में लगभग 12 हजार हेक्टेयर में गेहूं बीजा गया है।
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कृषि अनुसंधान धौलाकुआं के वैज्ञानिक डॉ. सुखदेव सिंह पलयाल ने कहा कि पीला रतुआ एवं बंट रोग से छुटकारा पाने के लिए फरवरी महीने में दो छिड़काव करना आवश्यक है। कुछ गांवों में पीला रतुआ की शिकायत आई थी। वहां पर किसानों को इसकी रोकथाम के उपाय बताए गए हैं। विभिन्न केंद्रों में यह दवाई किसानों को मुफ्त दी जा रही है।
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पीला रतुआ रोग के लक्षण
विशेषज्ञों के अनुसार पीला रतुआ रोग हल्दी के चूपण जैसा पीले रंग की धारियों के रूप में गेहूं की पत्तियों पर दिखाई देता है। ये धारियां मुख्यता पत्तियों पर ही पाई जाती है। रोग की व्यापक दशा में पत्तियों के आवरण, तनों एवं बालियों पर भी पीली धारियां देखी जा सकती है।
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पीला रतुआ रोग से बचाव के उपाय
कृषि वैज्ञानिकों की सलाह है कि फसल पर पीला रतुआ रोग के लक्षण दिखते की प्रोपीकोनाजोल घोल बना कर फसल पर छिड़काव करें। दूसरा छिड़काव 15-20 दिन के बाद करना जरूरी है। एक कनाल के लिए 30 मिली. दवा 30 लीटर पानी में या एक बीघे के लिए 60 मिली. दवा 60 लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करें। विशेषकर पेड़ों एवं छायादार स्थानों पर फसलों का अधिक ध्यान रखें।