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Rampur Bushahar News: रामपुर की नोगवैली में वूली एफिड रोग का प्रकोप, सेब बागवानों की बढ़ी चिंता
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वूली एफिड रोग की चपेट में आए नोग वैली के बगीचे। संवाद
सेब के पेड़ों के बीमों को बढ़ा खतरा, फसल नुकसान का मंडरा रहा खतरा
बागवानों की बढ़ी दुश्वारियां, चौतरफा मार झेल रहे बागवान
संवाद न्यूज एजेंसी
डंसा (रामपुर बुशहर)। उपमंडल रामपुर की नोगवैली और आसपास के सेब बहुल क्षेत्रों में वूली एफिड रोग तेजी से फैल रहा है। इस संक्रमण से सेब के पेड़ों के बीमे कमजोर पड़ जाते हैं, जिससे अगले साल की फसल काफी प्रभावित होती है। इससे बागवानों की परेशानी बढ़ गई है और उनकी आर्थिकी पर बुरा असर पड़ रहा है। बागवानी विशेषज्ञों के अनुसार, गर्मियों और पतझड़ में ये रोग पेड़ के तने पर रूईदार परत के रूप में फैलता है। नाइट्रोजन आधारित खादों का अधिक उपयोग मुलायम पत्तियां पैदा करता है, जो इन कीटों को आकर्षित करती हैं। हिमालय के कम तापमान और उच्च नमी वाले क्षेत्रों में इनकी आबादी अगस्त से अक्तूबर के बीच चरम पर होती है। एपेलिनस माली नामक परजीवी ततैया इन एफिड्स को खाकर नियंत्रित करता है। प्रगतिशील बागवानों ने कहा कि हर साल ऐसी समस्याओं से उनकी सालभर की मेहनत बर्बाद हो जाती है। उन्होंने प्रदेश सरकार और बागवानी विभाग पर केवल कागजी औपचारिकताएं निभाने का आरोप लगाया। विशेषज्ञों ने प्रतिरोधी रूट स्टॉक जैसे एम 111 का उपयोग करने की सलाह दी है। पेड़ों की कटाई-छंटाई के दौरान अत्यधिक पानी वाले अंकुरों को काटना चाहिए। तनों पर कॉलोनियां दिखने पर तेज पानी के बहाव से रुई जैसी परत हटाकर इन्हें नष्ट किया जा सकता है। बागवानी विभाग रामपुर के विषयवाद विशेषज्ञ संजय चौहान ने क्लोरोपा और ईरिफॉस 400 मिलीलीटर को 200 लीटर पानी में मिलाकर उपयोग करने की सलाह दी। यह मिश्रण फल तुड़ान के बाद जड़ों के पास या तनों पर छिड़का जा सकता है। बागवान पवन, प्रेम सिंह और गोविंद सिंह का कहना है कि चौतरफा मार झेलने से उनकी आर्थिकी बुरी तरह प्रभावित हो रही है। वे सरकार और विभाग से ठोस कदम उठाने की मांग कर रहे हैं। बागवानों को लगता है कि विभाग केवल कागजी कार्रवाई तक सीमित है।
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बागवानों की बढ़ी दुश्वारियां, चौतरफा मार झेल रहे बागवान
संवाद न्यूज एजेंसी
डंसा (रामपुर बुशहर)। उपमंडल रामपुर की नोगवैली और आसपास के सेब बहुल क्षेत्रों में वूली एफिड रोग तेजी से फैल रहा है। इस संक्रमण से सेब के पेड़ों के बीमे कमजोर पड़ जाते हैं, जिससे अगले साल की फसल काफी प्रभावित होती है। इससे बागवानों की परेशानी बढ़ गई है और उनकी आर्थिकी पर बुरा असर पड़ रहा है। बागवानी विशेषज्ञों के अनुसार, गर्मियों और पतझड़ में ये रोग पेड़ के तने पर रूईदार परत के रूप में फैलता है। नाइट्रोजन आधारित खादों का अधिक उपयोग मुलायम पत्तियां पैदा करता है, जो इन कीटों को आकर्षित करती हैं। हिमालय के कम तापमान और उच्च नमी वाले क्षेत्रों में इनकी आबादी अगस्त से अक्तूबर के बीच चरम पर होती है। एपेलिनस माली नामक परजीवी ततैया इन एफिड्स को खाकर नियंत्रित करता है। प्रगतिशील बागवानों ने कहा कि हर साल ऐसी समस्याओं से उनकी सालभर की मेहनत बर्बाद हो जाती है। उन्होंने प्रदेश सरकार और बागवानी विभाग पर केवल कागजी औपचारिकताएं निभाने का आरोप लगाया। विशेषज्ञों ने प्रतिरोधी रूट स्टॉक जैसे एम 111 का उपयोग करने की सलाह दी है। पेड़ों की कटाई-छंटाई के दौरान अत्यधिक पानी वाले अंकुरों को काटना चाहिए। तनों पर कॉलोनियां दिखने पर तेज पानी के बहाव से रुई जैसी परत हटाकर इन्हें नष्ट किया जा सकता है। बागवानी विभाग रामपुर के विषयवाद विशेषज्ञ संजय चौहान ने क्लोरोपा और ईरिफॉस 400 मिलीलीटर को 200 लीटर पानी में मिलाकर उपयोग करने की सलाह दी। यह मिश्रण फल तुड़ान के बाद जड़ों के पास या तनों पर छिड़का जा सकता है। बागवान पवन, प्रेम सिंह और गोविंद सिंह का कहना है कि चौतरफा मार झेलने से उनकी आर्थिकी बुरी तरह प्रभावित हो रही है। वे सरकार और विभाग से ठोस कदम उठाने की मांग कर रहे हैं। बागवानों को लगता है कि विभाग केवल कागजी कार्रवाई तक सीमित है।