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कांग्रेस सरकार का दोहरा चेहरा उजागर : चेतन बरागटा
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रोहड़ू ।
भाजपा प्रदेश प्रवक्ता चेतन बरागटा ने कहा कि कांग्रेस सरकार का बागवानों के साथ छल और धोखा उजागर हो चुका है। सरकार ने सार्वजनिक मंचों पर जो वादे किए, वे सब अदालत के अंदर जाकर नकार दिए गए। बरागटा ने कहा कि जब भी किसान-बागवान से जुड़ी समस्याओं को लेकर कांग्रेस सरकार के मंत्रियों और मुख्यमंत्री से मिले, तो हर बार उन्हें आश्वासन दिया गया। इसके विपरीत, सरकार ने हाईकोर्ट में स्पष्ट रूप से कह दिया कि ऐसी कोई नीति नहीं बनाई जा रही। हाईकोर्ट में सरकार ने यह भी कहा कि वह सेब के पौधों का रखरखाव नहीं कर सकती, क्योंकि उसके पास न तो मैनपावर है और न ही संसाधन। हैरानी की बात यह है कि सरकार ने कोर्ट में यह तक कह दिया कि सेब के पौधे फॉरेस्ट स्पीशीज नहीं हैं, इसलिए इन्हें काट दिया जाना चाहिए। बरागटा ने कांग्रेस सरकार को याद दिलाया कि जब शराब बेचने की बात आई थी, तब सरकार के पास मैनपावर भी था और संसाधन भी। लेकिन जब सेब जो प्रदेश की आर्थिकी की रीढ़ है की बात आई, तो इन्हीं सेब के पेड़ों को काटने की बात कर दी गई। उन्होंने कहा कि यदि सरकार बागवानों के प्रति ईमानदार होती, तो कोर्ट से आग्रह कर सकती थी कि पेड़ों को काटने की प्रक्रिया कुछ समय के लिए टाल दी जाए, ताकि उन पर लगे फल बेचे जा सकें और सरकार का राजस्व भी बढ़े।
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भाजपा प्रदेश प्रवक्ता चेतन बरागटा ने कहा कि कांग्रेस सरकार का बागवानों के साथ छल और धोखा उजागर हो चुका है। सरकार ने सार्वजनिक मंचों पर जो वादे किए, वे सब अदालत के अंदर जाकर नकार दिए गए। बरागटा ने कहा कि जब भी किसान-बागवान से जुड़ी समस्याओं को लेकर कांग्रेस सरकार के मंत्रियों और मुख्यमंत्री से मिले, तो हर बार उन्हें आश्वासन दिया गया। इसके विपरीत, सरकार ने हाईकोर्ट में स्पष्ट रूप से कह दिया कि ऐसी कोई नीति नहीं बनाई जा रही। हाईकोर्ट में सरकार ने यह भी कहा कि वह सेब के पौधों का रखरखाव नहीं कर सकती, क्योंकि उसके पास न तो मैनपावर है और न ही संसाधन। हैरानी की बात यह है कि सरकार ने कोर्ट में यह तक कह दिया कि सेब के पौधे फॉरेस्ट स्पीशीज नहीं हैं, इसलिए इन्हें काट दिया जाना चाहिए। बरागटा ने कांग्रेस सरकार को याद दिलाया कि जब शराब बेचने की बात आई थी, तब सरकार के पास मैनपावर भी था और संसाधन भी। लेकिन जब सेब जो प्रदेश की आर्थिकी की रीढ़ है की बात आई, तो इन्हीं सेब के पेड़ों को काटने की बात कर दी गई। उन्होंने कहा कि यदि सरकार बागवानों के प्रति ईमानदार होती, तो कोर्ट से आग्रह कर सकती थी कि पेड़ों को काटने की प्रक्रिया कुछ समय के लिए टाल दी जाए, ताकि उन पर लगे फल बेचे जा सकें और सरकार का राजस्व भी बढ़े।