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Mandi News: मशीनीकरण से धीमी पड़ी बैलों के घुंघरुओं की झंकार

Sun, 20 Sep 2026 12:11 AM IST
Shimla Bureau शिमला ब्यूरो
Updated Sun, 20 Sep 2026 12:11 AM IST
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TheJingling of Bullocks' Bells Faded Due to Mechanization
आधुनिकता की भेंट चढ़ा ख्योड़ का ऐतिहासिक नलवाड़ मेला
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कभी लाखों के पशुधन कारोबार से जगमगाता था मेला
ट्रैक्टर-पावर टिलर के आगमन से सिमटी पंचायत की आय

संवाद न्यूज एजेंसी

गोहर (मंडी)। गोहर का प्रसिद्ध सात दिवसीय ख्योड़ नलवाड़ मेला कभी महज मनोरंजन का जरिया नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था और पशुधन व्यापार का प्रमुख केंद्र हुआ करता था। मेले में सजी बैलों की जोड़ियां, किसानों की चहल-पहल और उनके गले में बंधे घुंघरुओं की खनक इस आयोजन की खास पहचान थी। हालांकि, आधुनिकता और खेती में बढ़ते मशीनीकरण के चलते अब बैलों की खरीद-फरोख्त का यह कारोबार सिमट गया है। पहले मेले में पड़ोसी राज्यों से बड़े व्यापारी पहुंचते थे और लाखों रुपये का पशुधन कारोबार होता था। पंचायत को भी पशु बिक्री से हर साल राजस्व प्राप्त होता था। बासा पंचायत के पूर्व प्रधान टैहल दास और हल्लायुद्ध ने बाहरी राज्यों से व्यापारियों को बुलाकर मेले को भव्य रूप देने में अहम भूमिका निभाई थी लेकिन खेतों में ट्रैक्टर, पावर टिलर और आधुनिक कृषि उपकरणों के बढ़ते इस्तेमाल ने बैलों पर किसानों की निर्भरता को लगभग समाप्त कर दिया है। करीब ढाई दशक पहले कॉलेज की स्थापना और बाद में क्लस्टर यूनिवर्सिटी की गतिविधियों से क्षेत्र का सामाजिक और आर्थिक ढांचा भी बदला। हालांकि, आज भी मेले में पशुधन की मौजूदगी ग्रामीण संस्कृति की उस पुरानी कड़ी को जीवित रखे हुए हैं।

पहले मेले में बैलों की जोड़ियां देखने और खरीदने के लिए किसान दूर-दूर से आते थे। बैलों के गले में बंधे घुंघरुओं की आवाज मेले के पशुधन बाजार की पहचान हुआ करती थी। -हेम सिंह सैनी, ग्रामीण
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दशकों पहले नलवाड़ मेला ग्रामीणों की जरूरतों से गहराई से जुड़ा हुआ था। पशु खरीदने-बेचने के साथ किसान मेले को सामाजिक मेलजोल और ग्रामीण व्यापार के बड़े अवसर के रूप में देखते थे। -नानक चंद, पूर्व प्रधान
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खेती का तरीका बदलने के साथ किसानों की प्राथमिकताएं भी बदली हैं। पहले बैल किसान की खेती का आधार थे, लेकिन अब मशीनें कम समय में अधिक काम कर देती हैं।
-हरीश कुमार, स्थानीय निवासी
आने वाली पीढ़ी को यह पता होना चाहिए कि कभी खेती बैलों के सहारे चलती थी और मेले में बैलों की खरीद-फरोख्त एक बड़ा कारोबार हुआ करती थी। -रमेश कुमार, स्थानीय निवासी
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