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विपक्ष में नहीं बैठता नूरपुर का विधायक 7777777
Updated Thu, 12 Oct 2017 11:23 PM IST
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नूरपुर (कांगड़ा)। प्रदेश के सबसे बड़े जिला कांगड़ा की नूरपुर विधानसभा सीट पर न तो जातीय समीकरण कोई मायने रखते हैं और न ही चुनावी संग्राम में क्षेत्रवाद के तीर से नूरपुर के सियासी किले को भेद पाया है। यहां कोई भी राजनीतिक दल क्षेत्रवाद और जातिवाद का नारा देकर वोटों की फसल काटने में आज दिन तक सफल नहीं हो पाया है। उम्मीदवार को अपनी कसौटी पर परखने का नूरपुर विस क्षेत्र की जनता का अपना अलग ही नजरिया है। इसमें राजनीतिक दलों की प्रदेशव्यापी लहर के अलावा उम्मीदवार का व्यक्तित्व भी शामिल रहता है। नूरपुर विस क्षेत्र के इमरजेंसी के बाद के इतिहास पर नजर डालें तो पता चलता है कि प्रदेश में सत्ता परिवर्तन के साथ ही नूरपुर से विधायक बदलते रहे हैं। 1977 में जनता पार्टी की लहर के बावजूद पहली बार कांग्रेस की टिकट पर विधानसभा पहुंचे सत महाजन को करीब ढाई साल के लिए विपक्ष में बैठना पड़ा। लेकिन, 1980 में शांता कुमार की सरकार टूटने के बाद आज तक नूरपुर का कोई भी विधायक विपक्ष में नहीं बैठा है। ठाकुर रामलाल की सरकार में सत महाजन को पहली मर्तबा राजस्व और पर्यटन मंत्री के पद से नवाजा गया। इससे पहले 1972 के चुनाव में बतौर आजाद उम्मीदवार केवल सिंह पठानिया ने सत महाजन को हराया। इस चुनाव में कांग्रेस ने केवल सिंह का टिकट काटकर सत महाजन को थमा दिया था। जबकि, उससे पहले 1967 के चुनाव में यहां से केवल सिंह पठानिया के पिता वजीर करतार सिंह पठानिया ने कांग्रेस की टिकट पर जीत का परचम लहराया था। इसके बाद राजपूत बाहुल्य नूरपुर विधानसभा क्षेत्र में 1977, 1982 व 1985 में जीत की हैट्रिक बनाने वाले कांग्रेस के फील्ड मार्शल कहे जाने वाले स्व. सत महाजन की जीत में जातीय समीकरणों की बजाय दलीय राजनीति हावी रही। 1990 में एक बार फिर से केवल सिंह पठानिया जनता दल की टिकट पर कांग्रेस प्रत्याशी सत महाजन को हराकर शांता कुमार की सरकार में विधायक बने। इसके बाद 1993 के मध्यावधि चुनाव में एक समझौते के तहत केवल सिंह पठानिया कांग्रेस में शामिल हो गए और ज्वालामुखी हलके से चुनाव जीतकर वीरभद्र सरकार में परिवहन मंत्री का पद हासिल किया। जबकि, नूरपुर सीट से कांग्रेस टिकट पर सत महाजन भाजपा के मेघराज अवस्थी को हराकर वीरभद्र सरकार में विधायक चुने गए। 1998 के चुनाव में भाजपा का कमल खिलाने वाले राकेश पठानिया को पर्यटन निगम के चेयरमैन पद का तोहफा मिला। तो वहीं, 2003 में नूरपुर सीट से पांचवीं बार जीते सत महाजन को ग्रामीण विकास एवं राजस्व मंत्री बनने का मौका मिला। 2007 के चुनाव में भाजपा की लहर में बतौर आजाद उम्मीदवार राकेश पठानिया ने एसोसिएट विधायक बनने के बाद सत्ता का सुख भोगा। जबकि पिछले 2012 के विस चुनाव में प्रदेश में सत्ता परिवर्तन के साथ ही कांग्रेस टिकट पर पहली मर्तबा विधायक बनने वाले अजय महाजन वर्तमान में नूरपुर हलके की नुमाइंदगी कर रहे हैं।
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