अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा: 200 किलोमीटर दूरी से आएंगे कई देवी-देवता, 376 साल पहले ऐसे हुई थी शुरुआत
कुल्लू में भगवान रघुनाथ के सम्मान में दशहरा मनाने की परंपरा वर्ष 1660 से जुड़ी है। उत्सव में शामिल होने के लिए बाह्य सराज के आनी-निरमंड क्षेत्र से देवी-देवता 150 से 200 किलोमीटर तक की दूरी पैदल तय कर कुल्लू पहुंचेंगे।
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भगवान रघुनाथ की नगरी कुल्लू में अंतरराष्ट्रीय दशहरा उत्सव की तैयारियां तेज हो गई हैं। 21 से 27 अक्तूबर तक ऐतिहासिक ढालपुर मैदान में देव आस्था, संस्कृति और व्यापार का अनूठा संगम देखने को मिलेगा। उत्सव में शामिल होने के लिए बाह्य सराज के आनी-निरमंड क्षेत्र से देवी-देवता 150 से 200 किलोमीटर तक की दूरी पैदल तय कर कुल्लू पहुंचेंगे। सात दिन तक चलने वाले देव महाकुंभ में देवलू और कारकून अपने आराध्य के साथ टेंटों में रहकर परंपराओं का निर्वहन करेंगे।
इस बार रिकॉर्ड 347 देवी-देवताओं को निमंत्रण
दशहरा उत्सव समिति ने इस बार रिकॉर्ड 347 देवी-देवताओं को निमंत्रण भेजा है, जबकि वर्ष 2025 में 332 देवी-देवताओं को आमंत्रित किया गया था। इनमें आनी-निरमंड क्षेत्र के 15 से 20 देवी-देवता शामिल हैं। उत्सव में पहुंचने वाले करीब 25 से 30 फीसदी देवी-देवता लगभग 100 किलोमीटर या इससे अधिक दूरी तय करेंगे। 20 अक्तूबर से देवी-देवताओं का आगमन शुरू होने के साथ ढालपुर में अस्थायी शिविर सजने लगेंगे। सात दिन तक देवलू और कारकून टेंटों में रहेंगे तथा सुबह-शाम अपने देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना करेंगे।
2,500 दुकानें, 300 करोड़ के कारोबार की उम्मीद
कुल्लू दशहरा धार्मिक आयोजन के साथ बड़े व्यापारिक मेले के रूप में भी पहचान रखता है। उत्सव में 2,500 से अधिक दुकानें सजने और करीब 300 करोड़ रुपये के कारोबार की उम्मीद है। देश के विभिन्न हिस्सों से व्यापारी यहां पहुंचते हैं। मेले में सुई से लेकर कपड़े, बर्तन, घरेलू सामान और वाहनों तक की खरीदारी होती है। पर्यटकों की आवाजाही से पर्यटन कारोबार और स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी बढ़ावा मिलता है। भगवान रघुनाथ की रथयात्रा और सैकड़ों देवी-देवताओं का एक साथ जुटना देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों के लिए खास आकर्षण रहता है।
376 साल पहले अयोध्या से लाए थे भगवान रघुनाथ की मूर्ति
कुल्लू में भगवान रघुनाथ के सम्मान में दशहरा मनाने की परंपरा वर्ष 1660 से जुड़ी है। मान्यता के अनुसार वर्ष 1650 में राजा जगत सिंह के शासनकाल में ब्राह्मण दुर्गा दत्त की दुखद मृत्यु के बाद राजा प्रायश्चित के लिए सिद्धगुरु कृष्णदास पयहारी की शरण में गए। उनके निर्देश पर शिष्य दामोदर दास गोसाईं अयोध्या से भगवान राम-सीता की मूर्तियां लेकर कुल्लू पहुंचे। आश्विन की दशमी को भगवान रघुनाथ की अध्यक्षता में यज्ञ हुआ और इसी परंपरा से कुल्लू दशहरा की शुरुआत मानी जाती है। सन 1650 को भगवान रघुनाथ की मूर्ति को अयोध्या से पहुंचाया गया था लेकिन ढालपुर में रघुनाथ की मूर्ति को सन 1660 को लाया गया। ऐसे में 366 साल से भगवान रघुनाथ के सम्मान में मनाया जा रहा अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा केवल धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि कुल्लू की देव संस्कृति, लोक परंपराओं और सामाजिक जीवन का भी अहम हिस्सा है। भगवान रघुनाथ के कारदार भगवान रघुनाथ के कारदार दानवेंद्र सिंह ने कहा कि कुल्लू का दशहरा सन 1660 से मनाया जा रहा है।