हिमाचल हाईकोर्ट बड़े फैसले: शिक्षकों से उनकी पसंद के सीबीएसई स्कूलों में नियुक्ति के फैसले को वापस ले सरकार
सीबीएसई स्कूलों में शिक्षकों की नियुक्ति को लेकर सरकार की नई नीति पर हाईकोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई है। अदालत ने मेरिट के आधार पर नियुक्ति की मौजूदा व्यवस्था में बदलाव कर शिक्षकों को उनकी पसंद के स्कूलों में तैनाती देने के फैसले पर सवाल उठाते हुए सरकार से इसे वापस लेने को कहा है। जानिए हाईकोर्ट के बड़े फैसले
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हिमाचल प्रदेश के सीबीएसई स्कूलों में शिक्षकों की नियुक्ति को लेकर सरकार की नई नीति पर हाईकोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई है। अदालत ने मेरिट के आधार पर नियुक्ति की मौजूदा व्यवस्था में बदलाव कर शिक्षकों को उनकी पसंद के स्कूलों में तैनाती देने के फैसले पर सवाल उठाते हुए सरकार से इसे वापस लेने को कहा है। मामले की सुनवाई अब 9 अक्तूबर को होगी। सुनवाई के दौरान न्यायाधीश अजय मोहन गोयल और न्यायाधीश योगेश जसवाल की खंडपीठ ने शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। सरकार ने प्रदेश के करीब नौ हजार सेवारत शिक्षकों की परीक्षा लेकर मेरिट तैयार की थी।
मेरिट के आधार पर सीबीएसई स्कूलों में नियुक्तियां देने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जानी थी: कोर्ट
इसी मेरिट के आधार पर सीबीएसई स्कूलों में नियुक्तियां देने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जानी थी। इसके विपरीत अब विभाग शिक्षकों से उनकी पसंद के स्कूलों में नियुक्ति के लिए आवेदन लेने की तैयारी कर रहा है। सरकार ने शिक्षकों की योग्यता और मेरिट तय करने के लिए परीक्षा आयोजित की थी। ऐसे में हाईकोर्ट ने यह सवाल उठाया कि जब नियुक्तियों के लिए मेरिट तैयार की गई है तो उसके स्थान पर शिक्षकों की पसंद को आधार बनाकर स्कूल आवंटित करने की नीति क्यों बदली जा रही है। नई व्यवस्था में शिक्षकों से उनके पसंदीदा स्कूलों के विकल्प मांगे जाने हैं। इसके बाद उपलब्ध पदों और शिक्षकों की पसंद के आधार पर तैनाती किए जाने की योजना है। इस बदलाव को लेकर अदालत ने सरकार की नीति पर गंभीर आपत्ति जताई है।
भुंतर गुरुद्वारा विवाद : हाईकोर्ट ने डीसी कुल्लू को बनाया केयरटेकर
प्रदेश हाईकोर्ट ने कुल्लू के भुंतर स्थित श्री गुरु ग्रंथ साहिब गुरुद्वारा संपत्ति से जुड़े दशकों पुराने विवाद में अहम फैसला सुनाया है। न्यायाधीश सुरेश्वर ठाकुर की एकल पीठ ने नियमित द्वितीय अपील पर सुनवाई करते हुए अतिरिक्त जिला जज कुल्लू के फैसले और डिक्री को रद्द कर दिया। अदालत ने उपायुक्त कुल्लू को पूरी संपत्ति का रिसीवर और केयरटेकर नियुक्त किया है। हाईकोर्ट ने सभी संबंधित पक्षों को निर्देश दिया कि वे दो सप्ताह के भीतर संबंधित खसरा नंबरों की जमीन और परिसर का कब्जा हस्ताक्षरित इन्वेंटरी के साथ डीसी कुल्लू को सौंपें। डीसी कुल्लू सिख विद्वानों और सेवादारों की सहायता से गुरुद्वारा परिसर के रखरखाव, मरम्मत और धार्मिक रीति-रिवाजों का सुचारू संचालन सुनिश्चित करेंगे। संपत्ति से होने वाली आय, किराए और खर्चों का नियमित ऑडिट भी कराया जाएगा।
मामले की शुरुआत वर्ष 1989 में सिविल जज की अदालत में दायर मुकदमे से हुई थी। वादी पक्ष ने उत्तम सिंह को गुरु ग्रंथ साहिब भुंतर का वैध कारदार मानने से इन्कार करते हुए उनके द्वारा किए गए भूमि हस्तांतरण को अवैध घोषित करने की मांग की थी। ट्रायल कोर्ट ने 1993 में मुकदमा खारिज कर दिया था। हालांकि, प्रथम अपीलीय अदालत यानी एडीजे कुल्लू ने 1997 में अपील स्वीकार कर वादी के पक्ष में डिक्री पारित की, जिसके खिलाफ हाईकोर्ट में अपील हुई। हाईकोर्ट ने राजस्व रिकॉर्ड में संपत्ति का मालिकाना हक सीधे श्री गुरु ग्रंथ साहिब के नाम दर्ज पाया। अदालत ने गवाहियों और रिकॉर्ड के आधार पर माना कि यहां लंबे समय से भजन-कीर्तन, ग्रंथी की उपस्थिति और सामूहिक पूजा होती रही है। ऐसे में यह स्पष्ट है कि यह स्थान शुरुआत से ही सार्वजनिक पूजा के उद्देश्य से समर्पित था न कि किसी व्यक्ति विशेष की निजी पूजा के लिए था। अदालत ने सिख गुरुद्वारा एक्ट, 1925 की धारा 38 का हवाला देते हुए कहा कि ऐसे मुकदमे से पहले संबंधित जिले के डिप्टी कमिश्नर की पूर्व अनुमति आवश्यक थी। अनुमति न होने के कारण सिविल अदालत के पास मामले की सुनवाई का अधिकार क्षेत्र नहीं था। हाईकोर्ट ने कहा कि धार्मिक संस्थाओं की संपत्तियों को अनुचित दावों से बचाना अदालतों का कानूनी दायित्व है।
न्यायिक ढांचे के लिए फंड पर हाईकोर्ट सख्त, केंद्र सरकार को बनाया पक्षकार
प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य में न्यायिक बुनियादी ढांचे के विकास के लिए फंड जारी करने के मामले में कड़ा रुख अपनाया है। खासकर मंडी के कांगनीधार में नवनिर्मित न्यायिक अदालत परिसर के लिए अतिरिक्त राशि उपलब्ध करवाने के मामले में कोर्ट ने केंद्रीय कानून एवं न्याय मंत्रालय को पक्षकार बनाया है। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने केंद्र सरकार को निर्देश दिए हैं कि मंडी कोर्ट परिसर के लिए अतिरिक्त फंड उपलब्ध करवाने की दिशा में अगली सुनवाई से पहले उचित कदम उठाए जाएं। अदालत के समक्ष पेश रिकॉर्ड के अनुसार कांगनीधार में निर्मित नए न्यायिक परिसर की अनुमानित लागत 152.59 करोड़ रुपये है।
इसका शिलान्यास भारत के मुख्य न्यायाधीश ने किया था। राज्य सरकार ने इस परियोजना सहित अन्य अधीनस्थ अदालतों के बुनियादी ढांचे के विकास के लिए केंद्र की सेंट्रली स्पॉन्सर्ड स्कीम के तहत 50 करोड़ रुपये की अतिरिक्त सहायता मांगी है। राज्य सरकार के अनुसार उसने अप्रैल, मई और सितंबर 2026 में केंद्र को फंड के लिए पत्र भेजे, लेकिन कोई सीधा जवाब नहीं मिला। वहीं, केंद्रीय कानून मंत्री के पत्र के अनुसार वित्त वर्ष 2026-27 में हिमाचल को इस योजना के तहत केवल 5.195 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। केंद्र का कहना है कि पहले आवंटित राशि का उपयोग किया जाए। राज्य में नाहन, सराहन, बंजार, मंडी, नालागढ़, करसोग, कांगनीधार और रामपुर समेत 10 न्यायिक ढांचा परियोजनाएं हैं। कोर्ट ने राज्य से 623.71 करोड़ रुपये के रखरखाव बजट के उपयोग पर भी हलफनामा मांगा है। मामले की अगली सुनवाई 30 नवंबर 2026 को होगी।